ग्वालियर:जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में स्टूडेंट्स ऑफ हॉलिस्टिक डेवलपमेंट ऑफ ह्यूमैनिटी फाउंडेशन और भारतीय ज्ञान परंपरा नोडल केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में शोध मार्गदर्शकों की भूमिका’ विषय पर अकादमिक कार्यशाला ‘शोधदृष्टि’ का आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने की। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय प्रमुख शोध फाउंडेशन के डॉ. आलोक कुमार सिंह, अभाविप के विषय विशेषज्ञ एवं विमर्श संयोजक डॉ. अर्जुन आनंद, महारानी लक्ष्मीबाई उत्कृष्ट महाविद्यालय के प्रो. अरविंद कुमार शर्मा, रोहित दुबे, आईआईटीटीएम के निदेशक प्रो. प्रशांत कुमार गौतम, कुलसचिव डॉ. राजीव कुमार मिश्रा तथा आयोजन सचिव एवं भारतीय ज्ञान परंपरा नोडल केंद्र के अधिकारी प्रो. शांतिदेव सिसोदिया उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत में अनुप्रिया ने कार्यशाला के विषय पर प्रकाश डालते हुए ऐसे आयोजनों की उपादेयता और प्रासंगिकता बताई। मुख्य वक्ता डॉ. आलोक कुमार सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा में ग्वालियर के ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने ग्वालियर की स्थापना से जुड़ी राजा सूरज सेन और ग्वालिपा ऋषि की प्रसिद्ध लोककिंवदंती के साथ ग्वालियर दुर्ग स्थित चतुर्भुज मंदिर के अभिलेख में अंकित शून्य के प्राचीनतम उल्लेखों में से एक की जानकारी दी। उन्होंने प्राचीन भारत में गणित, खगोल विद्या और नैतिक शिक्षा की समृद्ध परंपरा पर चर्चा करते हुए पंचतंत्र की कथाओं का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि शोध मार्गदर्शकों को शोधार्थियों को ऐसे विषयों के चयन के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिनके निष्कर्षों से आमजन के जीवन में सकारात्मक बदलाव आए। जिस शोध का समाज कल्याण में कोई योगदान नहीं है, उसकी उपयोगिता पर विचार किया जाना चाहिए।
ज्ञान की सार्थकता चरित्र में दिखे, भारतीय परंपरा में आदर्शों का महत्व: डॉ. अर्जुन आनंद
डॉ. अर्जुन आनंद ने मानव जीवन के अनुभवजन्य ज्ञान और भारतीय सभ्यता के आदर्शों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक सभ्यता के कुछ आदर्श और मानक होते हैं, जो पीढ़ियों से प्राप्त अनुभवों पर आधारित होते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में चरित्र और आदर्शों को विशेष महत्व दिया गया है। ज्ञान का प्रतिबिंब व्यक्ति के आचरण में दिखाई देना चाहिए। यदि ज्ञान चरित्र में परिलक्षित नहीं होता, तो उसकी सार्थकता अधूरी रह जाती है। उन्होंने शोधार्थियों को ऐसे विषयों पर शोध करने की सलाह दी, जिनके परिणाम आमजन के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकें।
