नई दिल्ली, देश में एक बार फिर महंगाई का दबाव तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, ऊर्जा लागत में तेजी और प्रतिकूल आधार प्रभाव के कारण सितंबर महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.6% तक पहुंच सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह करीब 23 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर होगा, जबकि इससे पिछले महीने यानी अगस्त में खुदरा महंगाई दर 4.82% दर्ज की गई थी। अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण के अनुसार, सब्जियों, दालों, अनाज और खाद्य तेलों के महंगे होने से आम परिवारों का मासिक बजट बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
पश्चिम एशिया के तनाव और महंगे कच्चे तेल ने बढ़ाई चिंता, आरबीआई के रेपो रेट बढ़ाने से ईएमआई पर भी पड़ेगा असर
महंगाई में इस तेजी के पीछे केवल घरेलू खाद्य वस्तुएं ही नहीं, बल्कि वैश्विक कारक भी जिम्मेदार हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, जिससे परिवहन और अन्य वस्तुओं की लागत बढ़ रही है। इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान रेपो दर को 0.25 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 5.50% कर दिया है और अपने रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ में बदल दिया है। केंद्रीय बैंक के इस कड़े कदम से आने वाले समय में होम लोन, कार लोन और अन्य कर्जों की मासिक किस्त यानी ईएमआई (EMI) के और अधिक महंगे होने की पूरी संभावना है।
सरकार और विशेषज्ञों की पैनी नजर, कृषि उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति पर टिकी आगामी महीनों की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की वास्तविक स्थिति मानसून के प्रभाव, कृषि उत्पादों की स्थानीय उपलब्धता और वैश्विक बाजार में ऊर्जा की कीमतों पर निर्भर करेगी। सरकार खुदरा मुद्रास्फीति के इन आंकड़ों पर लगातार नजर बनाए हुए है ताकि आवश्यक खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, लगातार छठे महीने बढ़ती खुदरा महंगाई ने आम आदमी की जेब पर दबाव बढ़ा दिया है, जिससे आने वाले दिनों में नीतिगत मोर्चे पर और अधिक सतर्कता बरते जाने की उम्मीद जताई जा रही है।

