इंदौर: डिजिटल भुगतान को लेकर व्यापारियों की नाराजगी तकनीक से नहीं, बल्कि उसकी बढ़ती लागत से है. प्रस्तावित शुल्क को लेकर व्यापारियों का कहना है कि डिजिटल सुविधा उपलब्ध कराने का आर्थिक बोझ भी व्यापारी ही क्यों उठाए? इसी नाराजगी के बीच ‘चलो चले 2016 की ओर’ का नारा सामने आया है. व्यापारियों के मुताबिक इसका मतलब नोटबंदी की वापसी नहीं, बल्कि उस दौर की कारोबारी स्वतंत्रता से है, जब भुगतान का माध्यम चुनने की आजादी व्यापारी और ग्राहक दोनों के पास थी.
अहिल्या चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के संयुक्त सचिव अक्षय जैन ने कहा कि व्यापारी डिजिटल भुगतान के खिलाफ नहीं है. बाजार की जरूरत और ग्राहक सुविधा के चलते व्यापारियों ने डिजिटल माध्यम को तेजी से अपनाया है, लेकिन अब भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क का बोझ सीधे व्यापारियों के मुनाफे पर असर डालेगा. महंगाई, ऑनलाइन कारोबार की प्रतिस्पर्धा, किराए, कर्मचारियों के वेतन और घटते मार्जिन के बीच व्यापारी पहले ही लागत के दबाव में है. ऐसे में डिजिटल भुगतान की अतिरिक्त लागत को लेकर सवाल सीधा है- सुविधा सबकी, खर्च सिर्फ व्यापारी का क्यों?
अतिरिक्त आर्थिक भार न पड़े
व्यापारियों का कहना है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना है तो सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें छोटे और मध्यम कारोबारियों पर अतिरिक्त आर्थिक भार न पड़े। किसी भी नए शुल्क से पहले व्यापारी संगठनों से चर्चा की जाए और भुगतान का माध्यम चुनने की स्वतंत्रता बरकरार रखी जाए.
टकराव नहीं चाहते, लेकिन आवाज उठाना जरूरी
व्यापारियों ने साफ किया कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन कारोबार बचाने के लिए आर्थिक दबाव के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है। उनका संदेश भी स्पष्ट है—तकनीक आगे बढ़े, डिजिटल भुगतान बढ़े, लेकिन व्यापारी की कीमत पर नहीं।
