
बाग. मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शिल्प गांव बाग में हस्तशिल्प और प्राकृतिक रंगों का अनोखा संगम देखने को मिला, जब नीदरलैंड मूल की टेक्सटाइल शोधकर्ता व जर्मनी में कार्यरत इमली कोपेंस (श्वद्वद्बद्य4 ष्टशश्चश्चद्गठ्ठह्य) ने एक दिवसीय विशेष बाग प्रिंट वर्कशॉप में भाग लिया। अंतर्राष्ट्रीय टेक्सटाइल विजिट पर भारत आईं इमली कोपेंस ने पूरे दिन बाग गांव में रहकर इस विश्व प्रसिद्ध पारंपरिक कला की बारीकियों को बेहद करीब से समझा और खुद अपने हाथों से ठप्पा (ब्लॉक) प्रिंटिंग कर खूबसूरत स्टोल तैयार किया।
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं ने दी बारीकियां
वर्कशॉप के दौरान राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मास्टर शिल्पकार मोहम्मद बिलाल खत्री तथा राज्य स्तरीय पुरस्कार विजेता काजि़म खत्री ने इमली कोपेंस को बाग प्रिंट की सदियों पुरानी और जटिल प्राकृतिक रंगाई-छपाई प्रक्रिया की हर एक स्टेप को गहराई से समझाया। इमली कोपेंस ने तांबे के हंडों में कपड़ों के शोधन, प्राकृतिक जड़ी-बूटियों (जैसे हरड़, फिटकरी, धावड़ी के फूल और आल की जड़) के इस्तेमाल से रंग बनाने तथा बागनी नदी के पानी में कपड़ों की धुलाई तक की पूरी वैज्ञानिक व पारंपरिक विधि को बहुत ध्यानपूर्वक देखा और समझा।
स्वयं अपने हाथों से उकेरे पारंपरिक ठप्पे- केवल देखने तक सीमित न रहते हुए इमली कोपेंस ने खुद लकड़ी के नक्काशीदार ब्लॉक्स (ठप्पों) को प्राकृतिक रंगों में डुबोकर कपड़े पर छापने का लाइव अनुभव लिया। मोहम्मद बिलाल खत्री और काजि़म खत्री के मार्गदर्शन में उन्होंने पूरे दिन की कड़ी मेहनत के बाद स्वयं का एक आकर्षक बाग प्रिंटेड स्टोल तैयार किया।
अंतिम परिणाम देख उठीं— ‘वाओ, अद्भुत शिल्पकला! ‘
जब भट्टी में उबालने और बहते पानी में धुलाई के बाद स्टोल पर प्राकृतिक लाल और काले रंग खिलकर सामने आए, तो इमली कोपेंस अपनी खुशी और उत्साह को रोक नहीं पाईं। उत्पाद के अंतिम रूप को देखकर उनके मुंह से निकला— ‘वाओ! यह तो चमत्कार जैसा है! ‘
उन्होंने बाग प्रिंट के जीवंत रंगों और प्राकृतिक प्रक्रिया की जमकर तारीफ की। इमली कोपेंस ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों से इस तरह के जादुई और टिकाऊ रंग तैयार करना भारतीय हस्तशिल्प की समृद्ध विरासत को दर्शाता है। वह अपने हाथों से तैयार किए गए इस खूबसूरत स्टोल को एक अनमोल याद के रूप में अपने साथ ले गईं।
