पहाड़, नदी और गांव की जिंदगी बनी पर्यटकों की पसंद

इंदौर: शहर से निकलकर जब रास्ता पहाड़ों और हरियाली के बीच पहुंचता है तो पर्यटन की तस्वीर भी बदलती नजर आती है. महू क्षेत्र में कालाकुंड से करीब एक किलोमीटर पहले बड़खेड़ा में अब पर्यटक सिर्फ प्रकृति देखने नहीं आ रहे, बल्कि गांव में रुककर गांव की जिंदगी जीने पहुंच रहे हैं. मिट्टी और कवेलू के घर, चूल्हे पर बना खाना, खेतों की ताजी सब्जियां, पहाड़, नदी और ग्रामीण परिवेश उनके लिए पर्यटन का हिस्सा बन रहे हैं. इस बदलाव के बीच होम-स्टे स्थानीय परिवारों के लिए गांव में ही रोजगार और आमदनी का नया जरिया बन रहे हैं.

मध्यप्रदेश में ग्रामीण पर्यटन को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कवायद के तहत होम-स्टे मॉडल पर जोर दिया जा रहा है. कालाकुंड क्षेत्र में प्राकृतिक पर्यटन के साथ स्थानीय खानपान, ग्रामीण जीवन, नेचर वॉक, ट्रेकिंग और संस्कृति को जोड़ने की दिशा में काम हो रहा है. मकसद यह है कि पर्यटक कुछ घंटे घूमकर लौटने के बजाय गांव में ठहरें और उनके खर्च का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचे.

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ गांव में शुरू किया होम-स्टे

बड़खेड़ा का तुलसीवन होम-स्टे इस बदलाव की जमीन पर दिखाई देने वाली तस्वीर है. वर्ष 2022 में शुरू हुए इस होम-स्टे के संचालक सूरज यादव ने नवभारत को बताया कि पर्यटन विभाग की एक पहल के तहत बकरिछाप कंपनी के माध्यम से उन्हें होम-स्टे योजना की जानकारी मिली थी. इसके बाद कालाकुंड की प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़, नदी और ग्रामीण जीवन को पर्यटकों के सामने अनुभव के रूप में प्रस्तुत करने का विचार आया. यादव के अनुसार होम-स्टे तैयार करने में करीब 5.5 लाख रुपए खर्च हुए. पर्यटन विभाग से आर्थिक सहायता भी मिली. उनके मुताबिक सामान्य और ओबीसी वर्ग के हितग्राहियों को करीब दो लाख रुपए तथा एससी-एसटी वर्ग के हितग्राहियों को करीब तीन लाख रुपए तक की सहायता दी गई.

मानसून में बुकिंग, वीकेंड पर बढ़ती संख्या
तुलसीवन में मानसून के दौरान पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है. यादव के मुताबिक कई बार इस मौसम में लगभग हर दिन होम-स्टे पूरी तरह बुक रहता है. शनिवार और रविवार को भी सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा पर्यटक पहुंचते हैं. सुविधाओं और पैकेज के अनुसार कपल्स के लिए रात रुकने का शुल्क करीब 2500 से 3500 रुपए तक रहता है. पर्यटकों को यहां सिर्फ कमरा उपलब्ध कराना उद्देश्य नहीं है. उन्हें खेती, ग्रामीण जीवन, स्थानीय वातावरण और पारंपरिक देसी खानपान से जोड़ा जाता है. चूल्हे पर तैयार भोजन और गांव की जीवनशैली का अनुभव शहर से आने वाले पर्यटकों के लिए अलग तरह का आकर्षण बन रहा है.

पर्यटक आए तो गांव के कई कामों को मिला सहारा
यादव बताते हैं कि पहले रोजगार के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता था, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर ही कमाई का जरिया उपलब्ध हो गया है. पर्यटकों की आवाजाही का फायदा सिर्फ होम-स्टे तक सीमित नहीं रहता. स्थानीय दुकानदार, वाहन चालक, किसान और छोटे कारोबारी भी इससे अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ते हैं. ग्रामीण पर्यटन का दायरा बढ़ने पर स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प, पारंपरिक उत्पाद और खेती से जुड़े कामों को भी इससे जोड़ा जा सकता है. महिला स्व-सहायता समूहों के जरिए स्थानीय व्यंजन और उत्पादों को बाजार मिलने तथा युवाओं के लिए गाइड, ट्रेकिंग और हॉस्पिटैलिटी जैसे काम विकसित होने की संभावनाएं भी हैं.

कालाकुंड को सिर्फ घूमने की जगह नहीं, अनुभव बनाने की तैयारी
कालाकुंड की पहचान पहले से ही हेरिटेज रेलवे, जंगल, झरनों और प्राकृतिक घाटियों से जुड़ी है. अब ग्रामीण पर्यटन के जरिए इसमें गांव की संस्कृति और स्थानीय जीवन को भी जोड़ा जा रहा है. पर्यटन को एक दिन के अनुभव के रूप में विकसित करने की अवधारणा में कालाकुंड के साथ आसपास के पातालपानी, चोरल और जानापाव जैसे क्षेत्रों को जोड़ने की दिशा भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. आगे मांडू, महेश्वर और ओंकारेश्वर जैसे पर्यटन स्थलों से जोड़कर क्षेत्रीय पर्यटन सर्किट विकसित करने की संभावनाएं भी हैं. इस मॉडल में पर्यटक एक ही यात्रा में प्रकृति, विरासत, स्थानीय संस्कृति और मालवा के स्वाद का अनुभव कर सकेंगे.

पर्यटन बढ़ा, लेकिन सड़क अभी पीछे
इस पूरी तस्वीर का दूसरा पहलू सड़क है. भगोरा-कालाकुंड मार्ग पर करीब तीन किलोमीटर का घाट सेक्शन अभी कच्चा है. तुलसीवन होम-स्टे संचालक के मुताबिक सड़क पक्की होने से पर्यटकों को गांव तक पहुंचने में सुविधा होगी और कालाकुंड व आसपास के ग्रामीण पर्यटन क्षेत्रों से संपर्क बेहतर होगा. कालाकुंड की खूबसूरती पहले से लोगों को आकर्षित करती रही है, लेकिन अब गांव की जिंदगी भी यहां पर्यटन का हिस्सा बन रही है. पहाड़ और नदी पर्यटक को यहां खींचते हैं, जबकि मिट्टी का घर, चूल्हे का स्वाद और ग्रामीणों की मेहमाननवाजी उसे रुकने की वजह दे रहे हैं. यही बदलाव आने वाले समय में कालाकुंड के ग्रामीण पर्यटन की सबसे बड़ी पहचान बन सकता है.

प्रकृति से जुड़ाव जरूरीः पूजा
भोपाल से आईं पर्यटक पूजा का कहना है कि हर व्यक्ति में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जागरूकता होना जरूरी है. प्रकृति केवल हमें स्वस्थ रखने का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे जीवन की आधारशिला है. इसके संरक्षण के प्रति सजग रहना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है.

शहर की भागदौड़ से सुकून मिलाः भावना
भोपाल से आईं पर्यटक भावना ने कहा कि रोजमर्रा की आपाधापी में वह सुकून कहीं पीछे छूट गया है, जिसकी आज इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत है. यहां आकर महसूस हुआ कि जिंदगी की लगातार भागदौड़ कितनी बेमानी है. प्रकृति के बीच कुछ पल बिताने पर मन को जो शांति मिलती है, वह शहर की व्यस्त जिंदगी में आसानी से नहीं मिलती.

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