
महाकौशल की डायरी
अविनाश दीक्षित
उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (नैक) द्वारा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय को प्रदत्त किए गए ए ग्रेड पर अब खुद ही विभागीय प्रोफेसर्स बट्टा लगाने में तुले हुए हैं। इतना ही नहीं परीक्षा व्यवस्था में लापरवाही के चलते विवि के छात्रों का भविष्य भी दांव पर लग रहा है। सवाल खड़े हो रहे हैं कि जब काबिल प्रोफेसर्स न हों तो फिर किस आधार पर उन्हें ये प्रश्र पत्र बनाने का काम दिया जा रहा है। विश्वविद्यालय के कामकाज के जानकारों की मानें तो विवि के भीतर अपने-अपने चहेतों को उपकृत कराने के लिए कॉपियों के मूल्यांकन का काम और पेपर सेटिंग का काम दे दिया जाता है फिर चाहे वो इस काबिल हो या नहीं इससे विवि के जिम्मेदारों को कोई फर्क नहीं पड़ता। ताजा मामले में हुआ यूं कि विवि द्वारा आयोजित एमए चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा में छात्रों को तृतीय सेमेस्टर के सिलेबस पर आधारित प्रश्नपत्र बांट दिये गये। जैसे ही प्रश्नपत्र छात्रों ने देखा तो उनके होश उड़ गए और उन्होंने आपत्ति जताते हुए परीक्षा का बहिष्कार कर दिया। चंद मिनटों में विवि परिसर में ये खबर आग की तरह फैल गई। लिहाजा इस दौरान छात्रों ने प्रश्नपत्र तैयार करने और मॉडरेशन प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग की, मगर ये मांग कार्रवाई तक कब पहुंचती है ये अभी बड़ा सवाल बनकर खड़ा हुआ है। विदित हो कि एमए चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा में रानीदुर्गावती विश्वविद्यालय में 182 विद्यार्थी बैठे थे। यद्यपि परीक्षा नियंत्रक सुशील दुबे ने इसे गंभीर लापरवाही माना है और जांच कराकर जिम्मेदार पर उचित कार्रवाई करने की बात कही है परन्तु यह वाक्या विवि की छवि को एक बार फिर धूमिल कर गया। इस घटना से
सवाल ये भी खड़े हुए कि क्या सिर्फ अपनी जेब भरने परीक्षा के प्रश्र पत्र सेट करने वाले प्रोफेसर्स और कॉपी चैक करने वाले प्रोफेसर्स रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय का उपयोग कर रहे हैं। हाल ही विवि पर बट्टा लगाने का ये कोई पहला मामला नहीं है। इसके पहले भी एक परीक्षा में आउट ऑफ सिलेबस प्रश्र पूछे गए थे, जिसका चरम विरोध भी छात्रों द्वारा हुआ था।
डॉक्टर्स को मिली लापरवाही की सजा….
विभागीय डॉक्टर्स, कर्मचारियों की व्यक्तिगत मौज व लापरवाह रवैये के कारण हमेशा से सुर्खियों में रहने वाला जिला अस्पताल विक्टोरिया एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया। इस बार अस्थि रोग विभाग की ओपीडी के डॉ. संजय जैन और डॉ. सुनील पटेल इसकी मुख्य वजह बने… हुआ यूं कि मंडला, डिंडोरी, शहपुरा, पाटन व अन्य आसपास के ग्रामीण अंचलों से बेहतर इलाज की आस लेकर जिला अस्पताल विक्टोरिया पहुंचे मरीजों का समूह डॉक्टर्स की तकवारी करता रह गया और उधर दूसरी तरफ अस्थि रोग विभाग की ओपीडी के डॉक्टर्स मौके पर मौजूद न रहकर कहीं और अपनी सेवाएं देते रहे। मामला गरमाया तो चंद देर में शिकायत विक्टोरिया के मुखिया तक पहुंची, फिर क्या, जो हुआ उसने सभी को चौंका दिया। जिले की स्वास्थ्य सुविधाओं के अन्य जरूरी काम छोड़कर निरीक्षण के बहाने सीएमएचओ अपने कमरे से निकले और अस्थि रोग की ओपीडी में लगी मरीजों की भीड़ को संभालने के लिए खुद ही उन्हें इलाज कर उचित परामर्श देने लगे। अस्पताल के अन्य विभागों के जानकारों और डॉक्टर्स ने ये देखा तो अस्पताल के गलियारों में ये चर्चाएं तेज हुईं कि साहब कभी हमारे विभाग की ओपीडी में आकर मरीजों को देख लिया करो। खबर है कि डॉक्टर संजय जैन और डॉ. सुनील पटेल के मातहतों ने मोबाइल पर उन्हें सूचना दी कि साहब जल्दी आ जाओ यहां तो सीएमएचओ साहब मरीजों का इलाज करने लगे हैंं। ये सुनकर दोनों डॉक्टर्स के पैरों तले जमीन खिसक गई और वे दोनों भागते हुए ओपीडी पहुंच गए। इधर आग बबूला सीएमएचओ डॉ. नवीन कोठारी ने दोनों डॉक्टर्स को अपने केबिन के बाहर बैठने कहा। खबर तो ये भी है कि सजा बतौर सीएमएचओ ने दोनों डॉक्टर्स को अपने केबिन के बाहर करीब आधे घंटे तक इंतजार कराया और फिर उनके एक दिन के वेतन काटने के सख्त निर्देश देते हुए उन्हें सख्त लहजे में कह दिया कि दोबारा ये लापरवाही हुई तो बचने की कोई गुंजाईश नहीं रहेगी।
