
ग्वालियर, सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की जिम्मेदारी केवल नियमों का पालन कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके निर्णयों में ईमानदारी, संवेदनशीलता, निष्पक्षता और भेदभाव रहित दृष्टिकोण भी होना चाहिए। यह बात आरिफ मोहम्मद खान ने रीइमैजिनिंग गवर्नेंस: डिस्कोर्स फॉर एक्सीलेंस के एक विशेष सत्र में कही।
यह कार्यक्रम कर्मचारी भविष्य निधि संगठन द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा अकादमी के तत्वावधान में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ईपीएफओ और पीड़ीयूएनएसएस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ देशभर के क्षेत्रीय कार्यालयों के अधिकारी वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए।
आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि भारतीय सभ्यता में ‘धर्म’ का अर्थ केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सही आचरण और नैतिक जिम्मेदारी है। इसी संदर्भ में राजधर्म का संबंध उन लोगों की जिम्मेदारी से है, जिन्हें जनता की सेवा और शासन की शक्ति सौंपी गई है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और महत्व को समझना प्रशासन का मूल आधार होना चाहिए। सरकारी अधिकारी का उद्देश्य केवल अधिकार का प्रयोग करना नहीं, बल्कि जनता की सेवा करना होना चाहिए। उन्होंने ईमानदारी, आत्मसंयम, निष्पक्षता और संवेदनशीलता को लोकसेवा के लिए जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी केवल सरकारी प्रक्रिया तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसका एक महत्वपूर्ण नैतिक पक्ष भी है।
खान ने उपनिषदों और शंकराचार्य की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी मनुष्यों में एक समान मानवीय गरिमा है। इसलिए प्रशासन में संकीर्ण भेदभाव से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के साथ समान और न्यायपूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नियम, व्यवस्था और तकनीक प्रशासन के महत्वपूर्ण साधन हैं, लेकिन वे मानवीय संवेदनशीलता और नैतिकता का स्थान नहीं ले सकते। आम नागरिक किसी सरकारी संस्था को किस तरह अनुभव करता है, यह अधिकारियों के व्यवहार और निर्णय लेने के तरीके पर काफी निर्भर करता है।
*सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में राजधर्म*
ईपीएफओ के केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त रमेश कृष्णमूर्ति ने चर्चा को सामाजिक सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि ईपीएफओ लाखों कर्मचारियों, पेंशनभोगियों और उनके परिवारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसे में कानूनी नियमों के पालन के साथ-साथ संवेदनशील और नागरिक-केंद्रित सेवा भी जरूरी है। उन्होंने अधिकारियों से आग्रह किया कि दावे, पेंशन और शिकायतों से जुड़े मामलों में केवल कागजी प्रक्रिया न देखें, बल्कि उनके पीछे मौजूद लोगों की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझें।
*प्राचीन ज्ञान से आधुनिक प्रशासन तक*
पीड़ीयूएनएएसएस के निदेशक कुमार रोहित ने कहा कि राजधर्म की अवधारणा आज के प्रशासन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने चित्रकूट के भारत-मिलाप प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान राम ने भरत को शासन की जिम्मेदारी सौंपते समय आदर्श राज्य व्यवस्था का संदेश दिया था। उन्होंने रामचरितमानस की पंक्तियों— “मुखिया मुखु सो चाहिए, खान-पान कहुँ एक। पालइ पोसइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥” का उल्लेख करते हुए समझाया कि जिस तरह शरीर का मुख भोजन ग्रहण कर पूरे शरीर के अंगों का पोषण करता है, उसी तरह प्रशासक का दायित्व है कि वह समाज के हर वर्ग का निष्पक्ष और समान रूप से पोषण व संरक्षण सुनिश्चित करे। उन्होंने कहा कि शासन का मूल उद्देश्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति की देखभाल और सेवा करना है। आरजीडीई का उद्देश्य भी सभ्यतागत ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और आधुनिक शासन व्यवस्था के बीच संवाद स्थापित करना है।
*व्यवहार में उतारने पर जोर*
कार्यक्रम में अधिकारियों के साथ संवाद भी हुआ, जिसमें रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों में नैतिक मूल्यों को लागू करने, नियमों के साथ परिस्थितियों का संतुलन बनाने और तकनीक आधारित व्यवस्था में भी मानवीय संवेदनशीलता बनाए रखने जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम का संचालन प्रशांत शर्मा, आरपीएफसी-I ने किया। उन्होंने राजधर्म की अवधारणा को लोकसेवा की व्यावहारिक चुनौतियों से जोड़ते हुए अधिकारियों के साथ संवाद को आगे बढ़ाया। साथ ही पीड़ीयूएनएएसएस ने सार्वजनिक सेवा में सीखने, आत्मचिंतन और उत्कृष्टता की संस्कृति को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता दोहराई।
