
ग्वालियर। शहर को हरा-भरा और खूबसूरत बनाने के लिए नगर निगम द्वारा कुछ वर्ष पहले अलग-अलग स्थानों पर किए गए सौंदर्यीकरण के प्रयोग अब सवालों के घेरे में हैं। जहां नाले की सुरक्षा के लिए लगी लोहे की जाली पर कतारों में सैकड़ों छोटे-छोटे गमले लगाए गए हैं। दूर से देखने पर यह पूरी जाली एक बड़ी ग्रीन वॉल जैसी दिखाई देती है, लेकिन नजदीक जाने पर कई गमलों में पौधे नहीं हैं और कई में मिट्टी सूखी पड़ी है।
शहर में स्वच्छता और सौंदर्यीकरण के नाम पर पहले भी अनुपयोगी सामग्री से गमले तैयार करने, सार्वजनिक स्थानों को हराभरा करने और नालियों में कचरा जाने से रोकने के लिए जालियां लगाने जैसे प्रयोग किए जा चुके हैं।
गमले लगे, लेकिन पौधों की देखरेख नहीं
सबसे बड़ा सवाल इन गमलों के रखरखाव को लेकर है। जाली पर एक के बाद एक बड़ी संख्या में गमले लगाए गए हैं। इनमें मिट्टी तो दिखाई देती है, लेकिन कई जगह पौधे गायब हैं। जो पौधे लगे हैं, उनमें भी नियमित पानी और देखभाल की कमी दिखाई देती है। ऐसे में सवाल यह है कि गमले लगाने के बाद उनकी देखरेख की जिम्मेदारी किसकी है और इसके लिए कितना बजट निर्धारित किया गया था. ग्वालियर में जल निकासी व्यवस्था पहले से ही चुनौती बनी हुई है। हाल के निरीक्षणों में वैज्ञानिकों ने भी शहर के कई इलाकों में ड्रेनेज सिस्टम और नालियों के आपसी मिलान में कमियां बताई थीं। वहीं स्वर्णरेखा नदी में प्रदूषण और नालों के गंदे पानी को लेकर हाल में हाईकोर्ट ने भी गंभीर रुख अपनाया है।
पहले नालों की समस्या, फिर ऊपर सजावट
शहर में नालों की सफाई, जल निकासी और अतिक्रमण जैसी मूल समस्याएं अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ऐसे में नालों की जाली पर सैकड़ों गमले लगाकर सौंदर्यीकरण करना तभी सार्थक होगा, जब पौधे नियमित रूप से जीवित रखे जाएं। वरना यह व्यवस्था कुछ समय बाद केवल खाली गमलों और जंग लगी जालियों तक सीमित रह जाएगी।
