रविवार शाम जब इंदौर के आसमान से ओलों और तेज़ बारिश की बौछारें गिरीं, तब शहर का नक्शा अचानक बदल गया था. स्वच्छता और स्मार्ट विकास की मिसाल बना यह शहर कुछ ही घंटों में पानी-पानी हो गया. राजवाड़ा, भंवरकुआं, एम.जी. रोड और बाणगंगा जैसी प्रमुख बस्तियां जलमग्न हो गईं. घरों में पानी घुसा, नालों से गंदा पानी उफन कर सडक़ों पर आया और ट्रैफिक घंटों तक जाम में फंसा रहा. यह सब उस इंदौर में हुआ, जो लगातार सात वर्षों से ‘भारत का सबसे स्वच्छ शहर’ कहलाता आ रहा है.यह दृश्य चौंकाता तो है, पर नया नहीं है. इंदौर ही नहीं, मध्य प्रदेश के अधिकांश नगरों में मानसून या अचानक की बारिश एक वार्षिक आपदा की तरह आती है. भोपाल से लेकर ग्वालियर तक, जबलपुर की निचली बस्तियों से लेकर उज्जैन की फ्रीगंज कॉलोनी तक, हर शहर एक जैसे संकटों का सामना करता है. परंतु सवाल यह है कि जब समस्या जानी-पहचानी है, तो समाधान इतने वर्षों में क्यों नहीं खोजे जा सके? इसका उत्तर इतना आसान और स्पष्ट है कि आम जनता को भी मालूम है. दरअसल ड्रेनेज प्रबंधन इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि निगम और अर्बन डेवलपमेंट विभाग के अधिकारियों और सत्ताधीशों के बीच अनौपचारिक सहमति होती है. जाहिर है सहमति का यह बिंदु कुछ और नहीं भ्रष्टाचार होता है. स्मार्ट सिटी की अवधारणा, शहरी प्रबंधन और ड्रेनेज सिस्टम का सुधार सब कुछ अधिकारियों और नेताओं की मिली भगत के कारण भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ जाता है. हालांकि दुनिया की अर्बन डेवलपमेंट कॉन्सेप्ट के हिसाब से विश्लेषण करें तो इसकी जड़ें शहरी नियोजन के उस ढांचे में हैं जो सतही विकास को प्राथमिकता देता है. ध्यान रहे स्मार्ट रोड्स, सीसीटीवी निगरानी, सिग्नल-फ्री यातायात जैसी सुविधाओं को हमने ‘स्मार्टनेस’ का मानक मान लिया है. परंतु जल निकासी, वर्षाजल पुनर्भरण, नालों की सफाई, और भूमिगत ड्रेनेज लाइन जैसे बुनियादी विषयों पर बजट, इच्छाशक्ति और निगरानी तीनों की कमी है.इंदौर में 2019 में ‘स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज प्लान’ की बात की गई थी, पर वह आज भी पूरी तरह कार्यान्वित नहीं हो सका है. शहर में करीब 600 से अधिक छोटे-बड़े नाले हैं, जिनमें से आधे अतिक्रमण की चपेट में हैं. बरसाती पानी के लिए रास्ता न हो तो वह बस्तियों में ही अपनी दिशा बना लेता है. यही कल इंदौर में हुआ. बहरहाल,इस संकट का एक पर्यावरणीय पहलू भी है. वर्षा जल का प्रबंधन केवल जल निकासी तक सीमित नहीं रहना चाहिए. यह जल पुनर्भरण का अवसर भी है. यदि शहर के भीतर पर्याप्त जल-संग्रहण संरचनाएं हों, ओपन ग्राउंड्स संरक्षित हों और ज़मीन का प्राकृतिक अवशोषण बना रहे, तो न केवल जल जमाव रोका जा सकता है, बल्कि गिरते भूजल स्तर को भी संभाला जा सकता है.
दरअसल,अब समय आ गया है कि हम शहरी विकास को “वास्तविक स्मार्टनेस” की कसौटी पर कसें. स्मार्ट सिटी का मतलब केवल चमचमाती सडक़ों से नहीं है, बल्कि ऐसी योजनाओं से है जो संकट के समय शहर को संभाल सकें. हमें डिज़ाइन आधारित सोच अपनानी होगी, यानी जहां इन्फ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण, जनसंख्या घनत्व और क्लाइमेट रिस्क को एक साथ ध्यान में रखकर समाधान गढ़े जाएं. वस्तुत: जब तक ऐसा नहीं होगा स्मार्ट सिटी की समग्र अवधारणा फलीभूत नहीं होगी. इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में जो अनुकरणीय कार्य किया है, वही मॉडल अब जल प्रबंधन और शहरी प्लानिंग में भी लागू किया जाना चाहिए. यह ध्यान रखें कि केवल पुरस्कार और रैंकिंग से शहर नहीं चलते, बल्कि टिकाऊ और समावेशी सोच से चलते हैं.
