रियाद, खाड़ी देश सऊदी अरब में मृत्युदंड की सजा को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी चिंता जताई है। ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अधिकारियों ने 17 अक्टूबर को हसन जकी अल-फराज नामक व्यक्ति को फांसी दे दी है। सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि जिन मामलों में उसे मौत की सजा सुनाई गई, उनमें से कई कथित अपराध उसने तब किए थे जब वह महज 14 वर्ष का था। मानवाधिकार संगठनों ने निष्पक्ष सुनवाई के अभाव और पूछताछ के दौरान पुलिस द्वारा यातनाएं देकर जबरन जुर्म कबूलवाने के गंभीर आरोप भी लगाए हैं।
शिया बहुल प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के चलते आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत की गई कार्रवाई, कई अन्य कैदियों पर भी मंडरा रहा खतरा
मीडिया रिपोर्ट्स और मानवाधिकार संस्थाओं के मुताबिक, हसन अल-फराज को नवंबर 2017 में गिरफ्तार किया गया था। उस पर शिया अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने और आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत गंभीर आरोप तय किए गए थे, जिसके बाद नवंबर 2022 में उसे मौत की सजा सुनाई गई थी। यूरोपीय सऊदी संगठन फॉर ह्यूमन राइट्स ने यह भी दावा किया है कि सऊदी अदालतों द्वारा यूसुफ अल-मनासिफ सहित कई अन्य ऐसे लोगों की भी मौत की सजा बरकरार रखी गई है, जिन पर किशोरावस्था के दौरान हुए कथित अपराधों का आरोप है।
बांग्लादेशी नागरिकों को दी गई सजा पर भी उठे थे कड़े सवाल, किशोर न्याय और अंतरराष्ट्रीय संधियों की पालना पर हो रही है चर्चा
यह सनसनीखेज मामला ऐसे समय में सामने आया है जब कुछ दिन पहले ही बांग्लादेश के दो नागरिकों को दी गई फांसी को लेकर भी कड़े कूटनीतिक सवाल उठे थे। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं के बाद वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने सऊदी सरकार से अपील की है कि वे किशोर न्याय प्रणाली में सुधार करें और नाबालिग उम्र में किए गए कथित कृत्यों के लिए मृत्युदंड देने की प्रथा पर पूरी तरह रोक लगाएं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर मध्य पूर्व में न्याय प्रक्रिया और मानवाधिकारों की रक्षा के पैमानों पर वैश्विक बहस छेड़ दी है।

