
सीधी(कृपाशंकर तिवारी)। आधुनिक युग में भी राजघरानों में भी दशहरा मिलन परम्परा कायम है। जिले की मड़वास एवं सेमरिया गढ़ी में आज भी परम्परागत तरीके से दशहरा मिलन मनाया जाता है। आयोजन से सांस्कृतिक पुरानी धरोहर और मर्यादाएं सहेजी जा रही हैं।
सीधी जिले के राजघरानों में आज भी दशहरा मिलन की ऐतिहासिक परम्परा पूरी भव्यता के साथ जीवंत है। रियासत कालीन संस्कृति को समेटे हुए जिले की मड़वास गढ़ी और सेमरिया गढ़ी में हर साल विजयादशमी के अवसर पर इस पारंपरिक उत्सव का शानदार आयोजन किया जाता है, जहां इतिहास और लोक-आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है। मड़वास गढ़ी की शाही परम्परा की निगाहबानी की जाये तो मड़वास रियासत जो ऐतिहासिक रूप से बलेंदु शासकों और चेदी वंश से जुड़ी रही है में दशहरा मिलन का विशेष महत्व है। विजयादशमी के दिन गढ़ी में राजा (राजा अभ्युदय सिंह) का पूर्ण वैदिक रीति-रिवाज से तिलक लगाकर पूजन व सम्मान किया जाता है। इस दौरान राजसी हथियारों की पारंपरिक शस्त्र पूजा भी संपन्न होती है। पूर्व रियासत के अंतर्गत आने वाले दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में लोग आज भी अपने राजा के दर्शन करने और उन्हें बधाई देने गढ़ी पहुंचते हैं। उत्सव के दौरान लोग एक-दूसरे को दशहरा की बधाई देते हुए पारम्परिक रूप से पान खिलाते हैं। मान्यता के अनुसार इस दिन राजा और नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना बेहद शुभ और समृद्धि दायक माना जाता है।
मड़वास की ही तरह सेमरिया गढ़ी में भी यह सदियों पुरानी विरासत आज भी बदस्तूर जारी है। आधुनिक युग में भी यहां के राजवंश और स्थानीय नागरिकों ने मिलकर अपनी पुरानी धरोहर और मर्यादाओं को सहेज कर रखा है। यह आयोजन केवल राजपरिवार तक सीमित न रहकर पूरे क्षेत्र के लिए आपसी भाईचारे और मिलन का प्रतीक बन जाता हैएजहां लोग आपसी भेदभाव भूलकर एकजुट होते हैं।
सीधी जिले में मड़वास गढ़ी एवं सेमरिया गढ़ी में वर्तमान में भी दशहरा मिलन का आयोजन धूमधाम से किया जाता है जिसमें हजारों की संख्या में लोग पहुंचकर गढ़ी में आयोजित दशहरा मिलन उत्सव में शिकरत करते हुये सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं।
आधुनिक युग में परम्पराओं को जीवित रखना युवाओं की जिम्मेदारी: अभ्युदय
राजा मड़वास गढ़ी अभ्युदय सिंह ने राजघरानों में कायम दशहरा मिलन परम्परा पर चर्चा के दौरान कहा कि आधुनिक युग में परम्पराओं को जीवित रखना युवाओं की जिम्मेदारी है। सभी युवा पहले अपने घर, परिवार एवं फिर समाज को जोडऩे में अपनी महती जिम्मेदारी निभाएं। उन्होंने कहा कि पुरानी परम्पराएं जो आज हैं पूर्वजों की विरासत हैं आज भी वह चल रही हैं। आधुनिक समय में भी मड़वास गढ़ी में दशहरा मिलन की परम्परा जीवंत है। व्यक्ति कितना भी आधुनिक हो जाए लेकिन उनके स्नेह से यह परम्परा चल रही है। ऐसे आयोजन सामाजिक समरसता से लोगों को जोडऩे का काम करते हैं। दशहरा के पावन अवसर पर मड़वास गढ़ी में हमारे ईष्ट गुरू अडग़ड़ानंद जी महाराज को गद्दी में विराजमान कर पूजन किया जाता है।
रामराज्य से शुरु हुई दशहरा मिलन परम्परा: के.के.सिंह
सेमरिया गढ़ी के राव कृष्ण कुमार सिंह भंवर (के.के.सिंह) ने दशहरा पर राजघरानों में होने वाली दशहरा मिलन परम्परा पर चर्चा के दौरान कहा कि भगवान राम की रावण विजय के बाद रामराज्य से यह परम्परा राजपूताना घरानों में शुरू हुई थी। पहले तो राजाओं के यहां दशहरा पर राज दरबार लगती थी, जिसमें संबंधित राज्य के इलाकेदार, जमींदार समेत प्रजा शामिल होती थी। दशहरा पर ब्यौहार के रूप में सभी को पान खिलाने की परम्परा रही है। वर्तमान में भी लोग दशहरा पर राजपूताना घरों में मिलने के लिये आते हैं। दशहरा पर राजघरानों में शस्त्र पूजन होता है और सभी से मिलन होता है। यह प्राचीन परम्परा अब भी राजघरानों में कायम होने से बड़ी संख्या में लोग दशहरा मिलन के लिये आते हैं।
