रावण दहनः परंपरा निर्वहन के साथ कलाकारों को दे रहा रोजगार

इंदौर: दशहरा के पूर्व शहर में रावण दहन की तैयारियां तेज हो जाती हैं. इस त्योहार के साथ रावण के पुतले बनाने वाले कलाकारों और व्यापारियों का कारोबार भी रफ्तार पकड़ने लगता है. कभी इस काम से गिने-चुने लोग जुड़े थे, लेकिन अब इंदौर में कई परिवार और कारीगर अलग-अलग आकार और डिजाइन के रावण बना रहे हैं. कॉलोनियों और मोहल्लों में बढ़ते आयोजनों के कारण छोटे पुतलों की मांग बढ़ी है, वहीं बड़े आयोजनों के लिए विशाल रावण तैयार किए जा रहे हैं.

रावण के पुतले बनाने का कारोबार भले ही मौसमी हो, लेकिन इसमें कारीगरों की मेहनत, हुनर और तैयारी अहम होती है. कुछ परिवारों का काम कुछ सप्ताह तक चलता है, जबकि अन्य एक से चार महीने तक त्योहारों और आयोजनों के लिए व्यस्त रहते हैं. बड़े ऑर्डर मिलने पर लाखों रुपये तक का कारोबार संभव है, हालांकि वास्तविक कमाई पुतलों के आकार, ऑर्डर और लागत पर निर्भर करती है. इंदौर में रावण के पुतलों का बढ़ता बाजार बताता है कि यह परंपरा अब धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के साथ रोजगार का साधन भी बन चुकी है.

पारंपरिक कारोबार का दायरा बढ़ा

रावण बनाने वाले गोलू बताते हैं कि यह उनके परिवार का पुश्तैनी व्यवसाय है. उनके परिवार में पहले मिट्टी के खिलौने बनाए जाते थे, लेकिन रावण बनाने की परंपरा उनके दादा-परदादा के समय से चली आ रही है. पहले संस्थाओं और समितियों से अधिक ऑर्डर मिलते थे, जबकि अब आम लोग भी घरों और कॉलोनियों में दशहरा मनाने के लिए छोटे रावण खरीदते हैं. इससे इस पारंपरिक कारोबार का दायरा बढ़ा है.

25 दिन पहले शुरू होती है बुकिंग

मालवा मिल अनाज मंडी स्थित जानकीलाल भैया मार्केट के रुपेश जैन बताते हैं कि अब शहर की कई कॉलोनियों में रावण दहन होने लगा है. उनके यहां हर साल करीब 50 से 60 रावण तैयार किए जाते हैं. ग्राहकों की मांग के अनुसार 2 फीट से लेकर 65 फीट तक के पुतले बनाए जाते हैं. दशहरे से लगभग 15 से 25 दिन पहले बुकिंग शुरू हो जाती है. तैयार पुतलों को गाड़ियों के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है. समय के साथ डिजाइन में भी बदलाव आ रहा है और पारंपरिक कुर्ता-पायजामा के अलावा पैंट-शर्ट जैसी पोशाक वाले रावण बनाने के प्रयोग किए जा रहे हैं.

विशेष थीम वाले पुतलों की मांग

वहीं, अंकुश जैन बताते हैं कि उनके दादाजी ने करीब 25 से 30 साल पहले इस काम की शुरुआत की थी. इसके बाद उनके पिता ने कारोबार संभाला और अब वे इसे आगे बढ़ा रहे हैं. उनके यहां इस साल करीब 60 रावण बनाए गए हैं. सबसे छोटा पुतला 3 फीट और सबसे बड़ा 65 से 70 फीट तक का होता है. पुतलों का ढांचा मुख्य रूप से बांस से तैयार किया जाता है, जबकि टाट, घास और अन्य सामग्री से उन्हें आकार दिया जाता है. उनके अनुसार, यह काम मुख्य रूप से दशहरे से पहले करीब 20 से 25 दिनों तक चलता है. अब कुछ आयोजक विशेष थीम वाले पुतलों की मांग भी करते हैं. अंकुश जैन बताते हैं कि पहले सुपर्णखा से जुड़े विषय पर पुतला बनाने का ऑर्डर मिला था, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के कारण उसका दहन नहीं हो सका. ऐसे विशेष ऑर्डर सामान्य मांग की तुलना में कम आते हैं और इन्हें ग्राहक की जरूरत के अनुसार तैयार किया जाता है.

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