बालाघाट में बदलेंगे राजनीतिक समीकरण…?

महाकौशल की डायरी

अविनाश दीक्षित

राजनीति में चर्चाएं, उम्मीदें और अंतिम निर्णय सदैव एक जैसे नहीं होते और ना ही आज की सहमति और कल के संबंध एक जैसे होते हैं, सारे समीकरण वक्त की नजाकत एवं परिस्थितियों पर निर्भर होते हैं। इन दिनों कुछ ऐसा ही परिदृश्य बालाघाट की राजनीति में नजर आ रहा है। दरअसल बालाघाट के भाजपाई गलियारे में डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को उत्तराखंड का राज्यपाल बनाये जाने और जिले के क्षत्रप माने जाने वाले गौरीशंकर बिसेन के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं छिड़ी हुई हैं। केंद्र बिंदु में यह सवाल है कि गौरीशंकर बिसेन जिन्हें लोग गौरीभाऊ भी बोलते हैं, के लंबे राजनीतिक अनुभव और वरिष्ठता के बावजूद डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को राज्यपाल के पद पहुंचने का अवसर कैसे मिल गया..?
स्मरण रहे कि दशकों से बालाघाट के सियासी समीकरण गौरीभाऊ के “मूड” पर बनते बिगड़ते रहे हैं। कभी टिकट बंटवारे से लेकर समुची चुनावी बिसात उनके नेतृत्व में भाजपा संगठन बिछाता रहा है। गौरीभाऊ की पहचान मुखर नेता की रही है, सार्वजनिक मंचों से दिए गए उनके बयान हमेशा सुर्खियों में रहे, जिसको लेकर वह विवादित भी हुए। 2017 में जब वह कृषि मंत्री थे तब एक कार्यक्रम में तत्कालीन सांसद बोधसिंह भगत से उनकी तीखी बहस हुई। यह मामला इतना गर्माया कि तत्कालीन प्रदेश भाजपाध्यक्ष नंद कुमार सिंह को दोनों नेताओं को तलब करना पड़ गया था। इस विवाद के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बोध सिंह भगत का टिकट कट गया और ढ़ालसिंह सांसद निर्वाचित हुए। माना जाता है कि गौरीभाऊ ने डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को ना केवल टिकट दिलवाई बल्कि चुनाव भी जितवाया। यह अलग बात है कि इसके बाद दोनों नेताओं के संबंधों में तल्खी की चर्चाएं भी सार्वजनिक होतीं रहीं, फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में ढ़ालसिंह का टिकट काटकर भारती पारधी को प्रत्याशी बनाया गया जो वर्तमान सांसद हैं। विदित रहे कि 2018 के विधानसवभा चुनाव में कद्दावर गौरीभाऊ कांग्रेस की अनुभा मुंजारे से चुनाव हार गए। इस पराजय और अनेक विवादों से घिरे रहने के चलते गौरीभाऊ के भव्य दरबार की दिव्यता आज क्षीण दिखाई पड़ती है। हालांकि उनकी बेटी मौसम हरिनखेड़े सार्वजनिक मंचों पर सक्रिय दिखाई देती रहतीं हैं, बावजूद इसके जिले में आम चर्चाएं हैं कि गौरीभाऊ का “क्रेज” अब दांव पर लग गया है। फिलहाल डॉक्टर ढ़ाल सिंह बिसेन को नया दायित्व मिलने के बाद पवार समुदाय बहुल बालाघाट जिले के सियासी समीकरण बदलना तय माना जा रहा है, क्योंकि दोनों नेता इसी समाज के हैं।

नजराना के बाद आखिर कैसे कर दें कार्रवाई…?

महाकौशल, विंध्य के जिलों से बड़ी तादाद में जबलपुर पहुंच रहा कबाड़ और फिर यहां आउटर के कबाड़खानों में प्रतिदिन करोड़ों के स्क्रैप को खपाना.. इन दिनों चर्चाओं का विषय बना हुआ है। खबर है कि कटनी, रीवा, सतना, मंडला, डिंडौरी, नरसिंहपुर और दमोह सहित अन्य कई जिलों से स्क्रैप जबलपुर पहुंचाया जा रहा है, जिनमें अलग-अलग जिलों से चोरी हुई रेलवे की सामग्री, बिजली के तार, कृषि उपकरण और निर्माण सामग्री शामिल है। ऐसे में सवाल उठने शुरू हो चुके हैं कि जिलों में चोरी की घटनाओं में गायब होने वाली सामग्री आखिर कहां खपती है और कबाड़ यार्डों तक पहुंचने के बाद उसकी पहचान कैसे खत्म हो जाती है? जब विंध्य के इलाकों से होते हुए जबलपुर सामान आ रहा है तो रास्ते में उसकी चैकिंग कहीं क्यों नहीं हुई? अब तो कबाड़ के कारोबार में नकद लेन-देन और माल के दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ मामलों में ई-वे बिल और जीएसटी से जुड़े नियमों के पालन पर भी सवाल किए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक जबलपुर में करीब 500 छोटे- बड़े कबाड़ कारोबारियों/यार्डों का संचालन किया जा रहा है । नियमों की मानें तो कबाड़ कारोबारियों को माल बेचने वाले की पहचान, वाहन नंबर और माल के स्रोत जैसी जानकारी दर्ज रखना और यार्ड में निगरानी की व्यवस्था रखना जरूरी है, लेकिन फिलहाल इन नियमों का पालन होता नहीं नजर आ रहा है। सूत्रों की माने तो आउटर इलाकों के दर्जनों यार्डों में चोरी की सामग्री और वाहन चंद घंटे में प्रतिदिन कट रहे हैं। सवाल तो पुलिस प्रशासन भी खड़े होने शुरू हो गए हैं क्योंकि बिना किसी मिलीभगत के ये इतना बड़ा काम संभव नहीं है। कहा जा रहा है नजराना की राशि आला अधिकारियों को मिठाई के डिब्बों में पहुंच जाती है और फिर शुरू होता है काले कारोबार का साम्राज्य.. यही एक बड़ी वजह है जिस कारण कबाड़ियों पर बड़े स्तर पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

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