सतना: शहर के ऐतिहासिक दशहरे की परंपरा को पुनर्जीवित कर नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और पहचान से परिचित कराया जा सकता है. पिछले दो दशकों से शहर में निकलने वाले दशहरा चल समारोह की परंपरा पूरी तरह छूट और समाप्त हो चुकी है. इसके पुनर्जीवन को लेकर जब नवभारत ने शहर के प्रबुद्ध जनों की राय जानी तो उनका कहना था कि इसे फिर से जीवित किया जा सकता है.
विंध्य की औद्योगिक नगरी सतना शहर में कभी विजयादशमी का पर्व केवल रावण वध तक सीमित नहीं था, बल्कि यह पूरे शहर के सामूहिक उल्लास, आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक भव्यता का प्रतीक हुआ करता था. अनुशासित चल समारोह इस शहर की सांस्कृतिक पहचान हुआ करता था. लेकिन समय के साथ यह भव्य परंपरा धीरे-धीरे बिसर गई और पिछले दो दशकों से यह पूरी तरह बंद पड़ी है. आज की नई पीढ़ी इस समृद्ध परंपरा से पूरी तरह अनजान है, जो किसी भी जीवंत समाज के लिए चिंता का विषय है. हाल ही में इस परंपरा के पुनर्जीवन को लेकर जब शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और बुद्धिजीवियों से चर्चा की गई, तो एक स्वर में यह बात सामने आई कि इस ऐतिहासिक धरोहर को फिर से जीवित कर नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ा जाना बेहद जरूरी है.
कैसे निकलता था ऐतिहासिक चल समारोह
बुजुर्गों और शहर के वरिष्ठ नागरिकों की स्मृतियों में वह दौर आज भी ताजा है जब सतना का दशहरा उत्सव पूरे विंध्य क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र हुआ करता था. उन दिनों को याद करते हुए वरिष्ठजनों ने बताया कि शारदीय नवरात्रि के आगमन के साथ ही विजय दशमी के उत्सव को भव्य और व्यवस्थित बनाने रामलीला समितियों और प्रशासन के बीच समारोह के स्वरूप की रूप रेखा तैयार की जाती थी. शहर की गलियों में सुंदर और आकर्षक लाइटों की सजावट शुरू हो जाती थी विजय दशमी के दिन रावण वध के ठीक पश्चात बिहारी रामलीला समिति के सदस्यों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा एक विशेष कमेटी का गठन किया जाता था. गठित कमेटी के मार्गदर्शन में शहर के विभिन्न मोहल्लों और समितियों की ओर से मनमोहक और आकर्षक तक़रीबन 150 से अधिक प्रतिमाएं व झांकियां एक साथ मुख्य मार्गों से निकलती थीं. उत्सव में प्रतिस्पर्धा और उत्साह को बनाए रखने के लिए शहर की सबसे उत्कृष्ट और सुंदर झांकी को प्रशासन और समितियों की ओर से विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया जाता था, जो कलाकारों और आयोजकों में नया जोश भर देता था.
जन समुदाय की सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम होते थे.
दशहरा चल समारोह देखने के लिए ग्राम अंचल से विशाल जन समूह आया करता था प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा समूची व्यवस्था का संचालन व्यवस्थिति तरीके से किया जाता था ताकि कोई अशोभनी घटना नहीं घटने पाए. सभी सिनेमा घरों में रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक चल चित्रो का प्रदर्शन कराया जाता था ताकि ग्रामीण जनता सूर्य के प्रकाश में अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंच सके. कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक सेमरिया चौराहे पर स्थापित नियंत्रण कक्ष में समूची व्यवस्था पर निगरानी रखते थे और जगह जगह तैनात कार्यपालिक मजिस्ट्रेट एवं पुलिस अधिकारियों से चल समारोह की समुचित जानकारी लेते रहते थे.
परंपरा के थमने से खोया सांस्कृतिक अपनापन
समय के साथ बदलते शहरीकरण, व्यस्त जीवनशैली और प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह शानदार परंपरा धीरे- धीरे बंद होती गई नतीजतन, आज की नई पीढ़ी रावण दहन की औपचारिकता तक ही दशहरा पर्व को सीमित मानती है. वे शहर की उस साझा संस्कृति, भव्य झांकियों के जुलूस और सामाजिक समरसता के उस माहौल से अनजान हैं, जो कभी इस शहर की पहचान हुआ करता था.
प्रबुद्ध जनों के सुझाव कैसे हो सकता है पुनर्जीवन
शहर के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि यदि प्रशासन, सामाजिक संगठन और युवा पीढ़ी मिलकर एक बार फिर पहल करें, तो इस परंपरा को नए स्वरूप और आधुनिक ऊर्जा के साथ वापस लाया जा सकता है
यह सिर्फ़ परंपरा नहीं हमारी पहचान है: हरिप्रकाश गोस्वामी
बिहारी रामलीला समिति के वरिष्ठ हरिप्रकाश गोस्वामी जी ने बताया कि उस भव्यता और परंपरा को जीवंत करने सामूहिक पहल करने की जरूरत है जिनमें नगर निगम, जिला प्रशासन और शहर की धार्मिक-सांस्कृतिक समितियों को आगे आकर एक संयुक्त कार्ययोजना बनानी चाहिए यह सिर्फ़ परंपरा नहीं हमारी पहचान है जिसे जीवंत करना आवश्यक है.
पुरानी पहचान देती है प्रेरणा: डॉ. सतेंद्र शर्मा
वरिष्ठ शिक्षा विद् डॉ सतेंद्र शर्मा जी ने कहा की शहर की पहचान उसकी आधुनिक इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विरासतों से होती है. शहर का ऐतिहासिक दशहरा चल समारोह कला और लोक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज था. यदि समय रहते इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इस महान विरासत को केवल कहानियों में ही सुन पाएंगी. आवश्यकता इस बात की है कि शहर के प्रबुद्ध जन, प्रशासन और युवा मिलकर एक नई शुरुआत करें, ताकि सतना की सड़कों पर एक बार फिर सांस्कृति उल्लास का वह दौर लौट सके.
चल समारोह की भव्यता को निखारने की ज़रूरत: के सी मिश्रा
सेवानिवृत्त अपर कलेक्टर के सी मिश्रा ने उन दिनों को याद करते हुए कहा की दशहरा चल समारोह पूर्व के वर्षों में बहुत आकर्षक और भव्य हुआ करता था. समूचे बाजार में रोशनी हुआ करती थी. लगभग 150 से अधिक झांकियों का प्रदर्शन होता था. उसे पुनः जीवंत करने और आने वाली पीढ़ियों तक परंपरा और विरासत पहुँचाने हमे एक जुट होकर उत्सव समितियों और प्रशासन के साझा प्रयासों से विजयादशमी के भव्य आयोजन को पुर्जीवित करना चाहिए. यह उत्सव के साथ – साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत है
