कांग्रेसी हुए मुखर, भाजपाई खेमे में बढ़ी बेचैनी

महाकौशल की डायरी

अविनाश दीक्षित

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर राहुल गांधी का जंगी प्रदर्शन हो या फिर इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम में पेपर लीक जैसे मुद्दे को लेकर मालवा-निमाड़ में सेंध लगाना हो या फिर बालाघाट में पीड़ित आदिवासियों के बीच जाकर भाजपा सरकार की तस्वीर सभी को बताना हो… ये सभी प्रदर्शन इन दिनों जबलपुर सहित महाकौशल के विभिन्न शहर और ग्रामीण अंचलों में अब तक कांग्रेस को संजीवनी बूटी मिलने जैसे साबित हुए हैं। जबलपुर में लगभग कुम्भकरणी निंद्रा में डूबी कांग्रेस अचानक आक्रामक मूड में नजर आने लगी है। हालिया दिनों में जिस तरह भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेसियों का हुजूम सड़कों पर उमड़ा और जिसने जहां एक ओर शहर की जनता का ध्यान आकर्षित किया वहीं दूसरी ओर भाजपा के खेमे में भी बेचैनी बढ़ा दी है ।

राजनैतिक जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ महीनों से जिस प्रकार से कांग्रेस एक नई क्रांति लेकर सड़कों पर उमड़ी है उससे महाकौशल में आगामी नगर निकाय, विधानसभा चुनाव में राजनैतिक समीकरण बदले हुए नजर आ सकते हैं, बशर्ते कांग्रेस कार्यकर्ता इसी मोड में बने रह पाएं। यद्यपि जबलपुर में भाजपा का वर्चस्व अभी भी है जिसमें सेंध लगा पाना सहज नहीं होगा लेकिन पिछले कुछ वक़्त से समय बदलता दिख रहा है। विदित हो कि स्थानीय निकाय चुनाव 2027 में होने वाले हैं और फिर इसके बाद विधानसभा चुनाव… संगठनों के भीतरखाने की मानें तो कांग्रेस और भाजपा ने अभी से मान लिया है कि विधानसभा चुनाव 2028 शुरू हो गया है और बतौर इसकी तैयारियां प्रदर्शनों के जरिये शक्ति दिखाई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राहुल गांधी के मध्यप्रदेश के लगातार दौरे से यहां की राजनीति में बहुत गहरा असर पड़ा है और कयास लगाए जाने लगे हैं कि इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा की कशमकश जोरदार होने वाली है। उधर भाजपाई खेमे में राहुल गांधी के मध्यप्रदेश में लगातार सक्रिय होने को लेकर भी गुपचुप तरीके से चर्चाएं हो रहीं हैं और रूपरेखा तय होने लगीं हैं कि मप्र में समय रहते अब भाजपा को भी नामी या बड़े चेहरे को रोड शो या सक्रियता दिखाने सामने आना होगा.. नहीं तो ऐसा न हो कि कहीं देर हो जाए और जनता के बीच कांग्रेस पूरी तरह घुसपैठ कर ले।

3 साल में सामने आए कुलसचिव के 9 चेहरे….

अभी तक हुए लगातार बदलाव ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्थाओं को झंकझोर कर रखा हुआ है, हालिया बदलाव के बावजूद सवाल उठ रहे हैं कि खेमों में बटी विवि की प्रशासनिक व्यवस्था क्या अब पटरी पर वापस लौट पाएगी ..। दरअसल कुलगुरू प्रोफेसर राजेश वर्मा के 3 साल के कार्यकाल में विवि के कुलसचिव का 9 बार बदले जा चुके हैं। पिछले कुछ महीनों से शहर से लेकर भोपाल तक किसी न किसी मुद्दे को लेकर सुर्खियों में बने रहने वाले कुलगुरू की कुर्सी पर आंच नहीं आना भी लोगों को हजम नहीं हो रहा है। विवि के गलियारों में गुपचुप चर्चा हो रही है कि साहब ने तो गजब की सेटिंग जमाई है, तभी तो उनका बाल बांका नहीं हो रहा है। शैक्षणिक जानकार कई खामियां निकाल रहे हैं, वहीं छात्र संगठन भी संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। प्रदर्शन, आरोप- प्रत्यारोप की झड़ी के बीच कुलगुरु – कुलसचिव का तालमेल सियासी तानेबाने में उलझ रहा है। अंत में नतीजा ये हो रहा है कि कुलसचिव का स्थानांतरण कर दिया जाता है।

विदित रहे कि प्रो. वर्मा के कार्यकाल के दौरान अब नौंवे कुलसचिव डॉ. डीके बग्गा अपनी जिम्मेदारी का निभाएंगे। कुलसचिव की कुर्सी लगातार बदलाव का केंद्र बनी रही। स्मरण रहे कि दिसंबर 2023 में प्रो. वर्मा के कुलपति पद संभालने के बाद से अब तक कुलसचिव पद पर नियमित नियुक्ति के साथ-साथ प्रभार की व्यवस्थाएं भी बदलती रही हैं। उपलब्ध आदेशों और विश्वविद्यालय से जुड़ी जानकारी को देखें तो इस अवधि में कुलसचिव पद की व्यवस्था में करीब 9 बार बदलाव हुआ है। दिसंबर 2023 से अक्टूबर 2026 तक कुलसचिव पद की पूरी कड़ी को देखें तो डॉ. दीपेश मिश्रा, डॉ. संतोष जाटव, डॉ. राजेंद्र कुमार कुररिया, डॉ. सुरेंद्र सिंह, डॉ. राजेंद्र कुमार बघेल, डॉ. सुशील कुमार दुबे, डॉ. रविशंकर सोनवाल और अब डॉ. डीके बग्गा के नाम सामने आये। इनमें डॉ. सुरेंद्र सिंह ने अलग-अलग समय पर दोबारा प्रभार संभाला, जबकि डॉ. सुशील कुमार दुबे ने भी बीच-बीच में प्रभारी के तौर पर जिम्मेदारी निभाई। यानी तीन साल के भीतर कुलसचिव की कुर्सी पर स्थायी नियुक्ति से लेकर प्रभार तक लगातार बदलाव हुआ। सवाल ये भी खड़े हुए कि आखिर ऐसा क्या था कोई भी कुलचिव विवि में लंबी पारी नहीं खेल पाया। यही सवाल नये कुलसाचिव के आने के बाद भी बरकरार है ।

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