नयी दिल्ली, 07 अक्टूबर (वार्ता) रिजर्व बैंक के रेपो दर बढाने और रुख “तटस्थ” से “सख्त” करने के फैसले को बैंकिंग और वित्तीय कंपनियों तथा उद्योग संगठनों ने सोच-समझकर उठाया हुआ कदम बताया है।
केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति समिति की बुधवार को समाप्त तीन दिवसीय बैठक के बाद रेपो दर 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने की घोषणा की। साथ ही भविष्य के लिए रुख “तटस्थ” से “सख्त” कर दिया है।
भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष श्रीनिवासुलु शेट्टी ने कहा कि बढ़ती महंगाई के दबावों के प्रति आरबीआई ने सोच-समझकर यह कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक द्वारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाने के बारे में उन्होंने कहा कि यह भरोसा बढ़ाने वाला है। भले ही भू-राजनैतिक घटनाक्रम और आपूर्ति पक्ष पर दबाव के कारण लगातार बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
श्री शेट्टी ने कहा कि अकाउंट एग्रीगेटर्स के बीच इंटरऑपरेबिलिटी और बैंक जमा की जानकारी को एकीकृत अकाउंट स्टेटमेंट में शामिल करने जैसे विकास से जुड़े उपाय अधिक आसान, सहमति-आधारित और एकीकृत वित्तीय पारितंत्र की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
उद्योग संगठन एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल मिंडा ने रेपो दर बढ़ाने और रुख तटस्थ से कठोर करने के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह सख्ती व्यापक अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति में स्थिरता बनाए रखने की दिशा में एक सतर्क दृष्टिकोण का संकेत देती है। ऊंची उधारी लागत का हालांकि खपत पर कुछ असर पड़ेगा और नये निवेश तथा विस्तार योजनाओं की गति धीमी हो सकती है। उन्होंने कहा कि इसका प्रभाव तत्काल की बजाय धीरे-धीरे पड़ने की संभावना है, क्योंकि मौद्रिक नीति का प्रभाव अर्थव्यवस्था तक पहुंचने में समय लगता है।
भारतीय निर्यातकों के संगठन फियो ने फैसले को समय की जरूरत बताया लेकिन साथ ही निर्यातकों के लिए राहत की भी मांग की। फियो के अध्यक्ष एस.सी. रल्हन ने कहा कि बढ़ती महंगाई और कीमतों में स्थिरता बनाए रखने की जरूरत को देखते हुए आरबीआई का फैसला सही है। भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के बीच यह जरूरी है कि मौद्रिक सख्ती से निर्यात पर निर्भर कारोबार के लिए कार्यशील पूंजी की उपलब्धता पर कोई बुरा असर न पड़े।
श्री रल्हन ने कहा कि निर्यातक अभी बहुत अनिश्चित वैश्विक माहौल में काम कर रहे हैं। भू-राजनैतिक तनाव, ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट, परिवहन में अधिक समय और भुगतान में देरी की वजह से निर्यातकों के लिए कार्यशील पूंजी का चक्र लंबा होता जा रहा है। इन परिस्थितियों में अधिक ब्याज लागत भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता पर बुरा असर डाल सकती है, विशेष कर उनके लिए जो कम मुनाफे पर काम करते हैं। उन्होंने एक्सपोर्ट क्रेडिट की अवधि को मौजूदा 270 दिन से बढ़ाकर 450 दिन करने की मांग की।
एलएंडटी फाइनेंस के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुदीप्त रॉय ने कहा कि आरबीआई ने वैश्विक हालात में लगातार हो रहे बदलाव और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के कारण रेपो दर बढ़ाने और रुख में बदलाव का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि रेपो दर बढ़ाने से वित्तीय स्थितियों को सामान्य करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
बॉन्ड स्कैनर के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी निश्चय नाथ ने कहा कि रेपो दर में इस वृद्धि का बॉन्ड, ऋण और जमा पर अलग-अलग रफ्तार से असर पड़ेगा। बॉन्ड बाजार में पहले ही 10-साल के सरकारी बॉन्ड पर रिटर्न सात प्रतिशत से ऊपर था, इसलिए इसमें ज्यादा बदलाव नहीं आयेगा। नकदी की उपलब्धता, कच्चा तेल और रुपये की स्थिति भी बॉन्ड बाजार पर प्रभाव डालती है।
श्री नाथ ने कहा कि इसका असर सबसे पहले ऋण लेने वालों पर पड़ेगा क्योंकि रेपो दर से जुड़े होम लोन हर तीन महीने में कम से कम एक बार रीसेट होते हैं। सावधि जमा में भी बदलाव कि उम्मीद है हालांकि हर बैंक अपनी रफ्तार से ऐसा करता है।
