इंदौर: इंदौर एक बार फिर झांकियों के काफिले के स्वागत के लिए तैयार है. शहर में झांकियां निकलने की परंपरा को 103 साल से ज्यादा हो चुके हैं. एक रात निकलने वाली इन झांकियों की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है. इस दौरान कलाकार पुतलों के निर्माण, पेंटिंग, सजावट और उनकी मूवमेंट पर लगातार काम करते हैं. स्वदेशी मिल, कल्याण मिल, नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण हुकुमचंद मिल राजकुमार मिल खजराना गणेश मंदिर की झांकियां तैयारियों के अंतिम दौर में है.
बैलगाड़ी के दौर से शुरू हुआ यह सफर अब आधुनिक तकनीक और एआई के दौर तक पहुंच चुका है. साधारण रोशनी से लेकर बड़े जनरेटर और आधुनिक लाइटिंग तक बदलाव हुए, लेकिन कई झांकियों में आज भी हाथ से किए जाने वाले काम को प्राथमिकता दी जाती है. झांकियों का काफिला भले ही एक रात शहर की सड़कों पर दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे कई महीनों की तैयारी होती है. पुतलों का निर्माण, उनकी पेंटिंग, सजावट और मूवमेंट तय करने में बड़ी संख्या में कलाकार जुटते हैं. तकनीक के इस्तेमाल के बावजूद कई कलाकार पारंपरिक तरीकों से अपना काम जारी रखे हुए हैं.
10 साल की उम्र से झांकियों में भर रहे रंग
मनोज वर्मा पिछले कई वर्षों से झांकियों पर हाथ से रंग करने का काम कर रहे हैं. उन्होंने महज 10 साल की उम्र से यह काम शुरू किया था. आज जब डिजाइन और विजुअल तैयार करने के लिए आधुनिक तकनीक उपलब्ध है, तब भी मनोज ब्रश और रंगों के जरिए झांकियों को तैयार करते हैं. उनके लिए यह सिर्फ काम नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही कला और अनुभव का हिस्सा है.
सिर्फ पुतले नहीं, उनकी चाल भी खास
झांकियों में पुतलों को तैयार करना ही काफी नहीं होता. उन्हें चलने और अलग-अलग तरह की मूवमेंट देने की भी जरूरत होती है. संतोष मैथिल पिछले 35 सालों से इसी काम से जुड़े हैं. अलग-अलग पुतलों के वजन और बनावट के हिसाब से उनकी मूवमेंट तैयार करना उनका काम है. हर पुतले की चाल अलग होती है और उसे झांकी की पूरी संरचना के साथ संतुलित करना पड़ता है। संतोष अपने अनुभव से इन पुतलों की मूवमेंट तय करते हैं.
बढ़ती महंगाई का भी पड़ा असर
इन झांकियों की तैयारी में मेहनत के साथ खर्च भी बड़ा मुद्दा है. बढ़ती महंगाई के बीच एक झांकी तैयार करने में लाखों रुपये तक खर्च हो जाते हैं. आर्थिक संसाधनों की कमी का असर कई बार कलाकारों और झांकी समितियों की तैयारियों पर भी पड़ता है. इसके बावजूद कई कलाकार वर्षों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. कई परिवारों में दो से तीन पीढ़ियों से लोग झांकियों से जुड़े हैं. उनके लिए यह परंपरा हर साल नए कलाकारों और नई तकनीक के साथ आगे बढ़ रही है. 103 साल से ज्यादा पुरानी इंदौर की झांकियों की परंपरा लगातार बदलते समय के साथ आगे बढ़ रही है. तकनीक और रोशनी के साधन बदल गए हैं, लेकिन हाथ से रंग करने वाले कलाकार और पुतलों को मूवमेंट देने वाले कारीगर आज भी इस परंपरा का अहम हिस्सा हैं. एक रात शहर में दिखाई देने वाली इन झांकियों के पीछे महीनों की तैयारी और कलाकारों की मेहनत जुड़ी है.
परंपरा में आधुनिकता का समावेश जरूरी
झांकियों में बदलाव और आधुनिकता का समावेश होना चाहिए. धार्मिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भावना को बनाए रखते हुए एआई, रोबोटिक्स, ड्रोन, लेजर और आधुनिक लाइटिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि बड़ी चुनौती यह है कि अधिकांश कलाकार पारंपरिक कला से जुड़े हैं और नए कलाकार कम मिलते हैं. कई अनुभवी कलाकार बचपन से इस कला को सीखते आए हैं और उन्हें 40-50 वर्षों का अनुभव है. यदि ऐसे कलाकारों को आधुनिक तकनीक और नए प्रयोगों की ट्रेनिंग दी जाए, तो वे अपनी पारंपरिक कला में आधुनिकता को आसानी से शामिल कर सकते हैं.
सरकार को इसके लिए प्रशिक्षण केंद्र और विशेष कार्यशालाओं की व्यवस्था करनी चाहिए. इससे पुराने कलाकारों के अनुभव का लाभ मिलेगा और नई पीढ़ी भी इस कला से जुड़ेगी झांकियों की पहचान और सांस्कृतिक भावना को बरकरार रखते हुए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल उन्हें नए दौर के अनुरूप और अधिक प्रभावी बना सकता है.
– हरनाम सिंह धारीवाल, कल्याण मिल
मिलें बंद होने के बाद बढ़ी मुश्किलें
जब मिलें चलती थीं, तब मजदूर और अधिकारी आर्थिक सहयोग करते थे और झांकियों के लिए ज्यादातर सामग्री भी मिलों से मिल जाती थी. मिलें बंद होने के बाद आर्थिक और संसाधनों की दिक्कत बढ़ी, लेकिन हमने इस परंपरा को बंद नहीं होने दिया. इंदौर की कपड़ा मिलों से शुरू हुई यह झांकी परंपरा आज शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है. इसे आगे बढ़ाने के लिए समाज, जनप्रतिनिधियों और सरकार- सभी के सहयोग की जरूरत है, ताकि 103 साल पुरानी यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके.
– नरेन्द्र जी हुकुमचंद मिल
