
विलुप्त होती ब्रज की सांझी कला के संरक्षण में जुटे रसिक बल्लभ नागार्च, बच्चों और युवाओं को भी दे रहे प्रशिक्षण
वृन्दावन/मथुरा। ब्रज की पावन भूमि केवल श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं की साक्षी ही नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट लोककलाओं और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी विश्वविख्यात है। इन्हीं अनमोल परंपराओं में से एक है ब्रज की प्राचीन सांझी कला, जिसके माध्यम से श्रीराधारानी और श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं को रंगों, आकृतियों और अद्भुत कलात्मक संयोजन के जरिए अभिव्यक्त किया जाता है। आज यह कला विलुप्ति के संकट से जूझ रही है, लेकिन वृन्दावन के सांझी कलाकार रसिक बल्लभ नागार्च इस प्राचीन विरासत को सहेजने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यहां आयोजित ब्रज रज महोत्सव में सांझी कलाकार रसिक बल्लभ नागार्च ने अपनी कला के माध्यम से भगवान श्रीराधा-कृष्ण के महारास का मनोहारी चित्रण प्रस्तुत किया। सांझी के माध्यम से महारास की दिव्य छटा को साकार करना दर्शकों के लिए ब्रज की आध्यात्मिक परंपरा और कलात्मक वैभव से जुड़ने का विशेष अवसर है।
रसिक बल्लभ नागार्च ब्रज की सांझी परंपरा से जुड़े ऐसे कलाकार हैं, जो अपनी पारंपरिक कला साधना के माध्यम से ब्रज की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं। वे संत हित परमानंद जी महाराज की आठवीं पीढ़ी से जुड़ी इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। उनके लिए सांझी केवल एक कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि श्रीराधारानी की लीलाओं के प्रति समर्पण और भक्ति का माध्यम है।
*जल से लेकर सूखे रंगों तक, सांझी कला के अनेक अद्भुत रूप*
सांझी कला की विशेषता इसकी विविधता और सूक्ष्म कलात्मकता में निहित है। इसे जल की सतह पर, जल के नीचे तथा सूखे रंगों के माध्यम से विभिन्न रूपों में तैयार किया जाता है। प्रत्येक स्वरूप में कलाकार की साधना, धैर्य, कल्पनाशीलता और सूक्ष्म दृष्टि का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इस कला के माध्यम से राधा-कृष्ण की लीलाओं, महारास और ब्रज के आध्यात्मिक भावों को कलात्मक रूप प्रदान किया जाता है।
रसिक बल्लभ नागार्च पितृपक्ष में एकादशी से अमावस्या तक वृन्दावन स्थित श्री प्रिया बल्लभ लाल जी की कुंज में सांझी की सुंदर रचनाएं तैयार करते हैं। यह परंपरा ब्रज की उस विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत का परिचय कराती है, जिसमें कला और भक्ति एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं।
रसिक बल्लभ नागार्च का मानना है कि सांझी को केवल रंगोली समझना इस प्राचीन कला की वास्तविक पहचान को सीमित कर देना है। सांझी ब्रज की एक विशिष्ट पारंपरिक कला है, जिसमें श्रीराधारानी की दिव्य लीलाओं का वर्णन किया जाता है। इसके निर्माण में कलाकार केवल रंगों और आकृतियों का संयोजन नहीं करता, बल्कि अपनी श्रद्धा, भाव और साधना को भी अभिव्यक्त करता है।
उनके अनुसार, सांझी की प्रत्येक रचना ब्रज की भक्ति परंपरा, लोक संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ी होती है। यही कारण है कि इस कला का संरक्षण केवल एक पारंपरिक शिल्प को बचाना नहीं, बल्कि ब्रज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखना भी है।
बच्चों और युवाओं को प्रशिक्षण देकर कर रहे हैं कला का संरक्षण
सांझी कला को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से रसिक बल्लभ नागार्च बच्चों और युवाओं को इस कला का प्रशिक्षण भी देते हैं। वे हित उत्सव चैरिटेबल ट्रस्ट, वृन्दावन के सचिव के रूप में सांझी कला के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और प्रशिक्षण के लिए प्रयासरत हैं।
उनका उद्देश्य है कि ब्रज की यह विशिष्ट कला केवल कुछ कलाकारों तक सीमित न रह जाए, बल्कि नई पीढ़ी भी इसकी बारीकियों, तकनीकों और आध्यात्मिक महत्ता को समझे। यदि बच्चों और युवाओं को समय रहते इस कला का प्रशिक्षण दिया जाए, तो सांझी की प्राचीन परंपरा को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।
आज आवश्यकता है कि सांझी कला को व्यापक पहचान मिले, इसके कलाकारों को उचित मंच प्राप्त हो और शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों के माध्यम से इसके प्रशिक्षण और संरक्षण की ठोस व्यवस्था विकसित की जाए।
