नई दिल्ली, शेयर बाजार के इतिहास में 19 अक्टूबर 1987 का दिन ‘ब्लैक मंडे’ के रूप में दर्ज है, जब एक ही कारोबारी सत्र में अमेरिका का प्रमुख शेयर बाजार डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 22.6 फीसदी धड़ाम हो गया था। यह आज भी प्रतिशत के लिहाज से इस सूचकांक की सबसे बड़ी एक दिवसीय गिरावट मानी जाती है। बढ़ते व्यापार घाटे, डॉलर की कमजोरी, ब्याज दरों को लेकर चिंता और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव के कारण अक्टूबर के शुरुआती दिनों से ही बाजार पर दबाव बनना शुरू हो गया था। 16 अक्टूबर को 4.6 फीसदी की गिरावट के बाद, जब 19 अक्टूबर को बाजार खुला, तो निवेशकों में शेयर बेचने की ऐसी होड़ मची कि खरीदार कम पड़ गए और वैश्विक वित्तीय बाजारों में तहलका मच गया।
कंप्यूटर आधारित ट्रेडिंग और पोर्टफोलियो इंश्योरेंस ने बढ़ाई तबाही, बिकवाली के चक्र ने संकट को किया और अधिक गंभीर
इस ऐतिहासिक क्रैश के पीछे कंप्यूटर आधारित ऑटोमेटेड ट्रेडिंग और पोर्टफोलियो इंश्योरेंस रणनीतियों की सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है। संस्थागत निवेशकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली इन तकनीकों ने बाजार गिरते ही और अधिक बिकवाली के संकेत देने शुरू कर दिए, जिससे मंदी का एक अंतहीन चक्र बन गया। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट की वजह कोई एक कारक नहीं, बल्कि आर्थिक अनिश्चितताएं, निवेशकों का डर और तकनीकी प्रणालियों की सीमाएं थीं। 1929 की महामंदी की याद दिलाने वाले इस हादसे ने दुनिया भर के वित्तीय विश्लेषकों को झकझोर कर रख दिया था और बाजार की संरचना पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
फेडरल रिजर्व के त्वरित हस्तक्षेप से संभला बाजार, निवेशकों में भरोसा लौटने के बाद लागू किए गए नए ‘सर्किट ब्रेकर’ नियम
ब्लैक मंडे के तुरंत बाद इस बात की आशंका जताई जा रही थी कि क्या यह किसी नई महामंदी की शुरुआत है, लेकिन अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने वित्तीय व्यवस्था में नकदी (लिक्विडिटी) बनाए रखकर स्थिति को संभाल लिया। बैंकों को कर्ज जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप बाजार ने तेजी से रिकवरी की और कुछ ही महीनों में सूचकांक अपने पुराने स्तर पर लौट आए। इस सबक के बाद अमेरिकी नियामकों ने 1988 में ‘सर्किट ब्रेकर’ की व्यवस्था लागू की, ताकि अत्यधिक उतार-चढ़ाव की स्थिति में कारोबार को अस्थायी रूप से रोककर निवेशकों को संभलने का मौका दिया जा सके।

