भोपाल। आचार्य श्री समयसागरजी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के स्वाध्याय सत्र में कहा कि धार्मिक व्रतों का वास्तविक पालन केवल बाहरी क्रियाकलापों से नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धता, दृढ़ संकल्प और आत्मसंयम से संभव है। व्रतों का उद्देश्य आत्मानुशासन और आध्यात्मिक उन्नति है।
मीडिया प्रभारी भविष्य जैन ने बताया कि प्रवचन में अहिंसा, सत्य, अचौर्य और संयमित आचरण के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया। गृहस्थों द्वारा अणुव्रतों के पालन में स्थूल पापों से बचने पर जोर दिया जाता है, जबकि कठोर व्रतों का पालन करने वालों के लिए अधिक संयम और अनुशासन आवश्यक है।
अचौर्य व्रत की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि दूसरे की वस्तु नहीं लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बिना स्वेच्छा से दी गई वस्तु को स्वीकार करने की भावना से भी बचना चाहिए। दान के लिए प्रेरित करना उचित है, लेकिन किसी को दान देने के लिए बाध्य करना स्वैच्छिक त्याग की भावना के विपरीत है।
प्रवचन में विवादों से दूर रहने, धन के प्रति आसक्ति और मान-सम्मान की अपेक्षा त्यागने पर भी बल दिया गया। आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज द्वारा अपने उत्तराधिकारी आचार्य विद्यासागरजी महाराज के प्रति प्रदर्शित विनम्रता का स्मरण कराते हुए सादगी और वीतराग भाव को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी गई।
सत्र में निष्कर्ष दिया गया कि व्रतों का सच्चा पालन आत्मसंयम को मजबूत करता है और आध्यात्मिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
