कोटडा वाली माताजी जहां तीन जजमान बैठते हैं और चौथी और से माता स्वयं आहुति देती थी।

बागली: बागली नगर मुख्यालय से 3 किलोमीटर दूर विंध्याचल पर्वत श्रेणी में प्राचीन ऐतिहासिक कोटड़ा किला जहां पर वर्षों पुराना माताजी का मंदिर बना हुआ है। इस स्थान पर आज भी तांत्रिक लोगों की निगाह बनी हुई है ।कहा जाता है ,कि इस स्थान पर अतुल्य खजाना किले की दीवार या कीले के परिसर में कहीं गड़ा हुआ है। वर्तमान में नवरात्रि पर्व पर बागली से जुड़े श्रद्धालु इस स्थान पर पूजा पाठ करने पहुंचते हैं, अंतिम दिन यज्ञ और भंडारा होता है । माता जी के भक्ति श्रद्धालु प्रताप सिंह डाबी ने बताया कि यह स्थान चमत्कारिक है। यहां पर मन की मुरादे पूरी होती है।

इसकी प्राचीनता के विषय में सही-सही तो नहीं पता लेकिन 800 वर्ष से अधिक पुराना किला है ,इसी समय इनकी भी स्थापना हुई होगी आज भी यहां पर हवन कुंड में तीन दिशा में बैठकर हवन किया जाता है चौथी और कोई भी जजमान नहीं बैठता प्राचीन मान्यता के अनुसार चौथी और जी और दीवार पर त्रिशूल बना है। उस दिशा की ओर से माता जी का हाथ निकलता ,और आहुति देता था। कालांतर में यह चमत्कार दिखाई नहीं देता लेकिन एहसास जरूर कराता है। इस किले में रात्रि में विश्राम कोई भी श्रद्धालु नहीं करता किले के बाहर कोटडा नमक छोटा सा गांव बसा हुआ है। ग्रामीण बताते हैं ,कि शाम होते ही इस किले से लोग दूरी बना लेते हैं।

कहानी किस्सों के अनुसार यहां के शासन करता ने किसी नटनी को बुलाकर उसकी परीक्षा ली किले के इस पर से उस पार की पहाड़ी पर रस्सी बांधी गई जिसकी दूरी लगभग 300 मीटर है।उस पर नटनी को चलकर उस पार जाकर शौर्य प्रतीक झडीं लगाकर इस पार आना था।यदि वह ऐसा कार्य पूर्ण कर देती तो उसे आधा राज्य दिया जाना घोषित किया गया नटनी सफलता पूर्वक 90 फ़ीसदी रास्ता पार कर गई इस बीच आधा राज्य देने की बात को ध्यान में रखते हुए मन में लालच आया और रस्सी को काट दिया गया और वह नटनी सैकड़ो फीट खाई में नीचे गिरकर मर गई तभी से उसकी आत्मा यहां पर घूमती है।

हालांकि वर्तमान में यहां मंदिर परिसर में पूजा पाठ करने पर कोई अवरोध आज तक सिद्ध नहीं हो पाया फिर भी ग्रामीण अन्य दिनों में रात्रि विश्राम करने से डरते हैं श्रद्धालु प्रताप सिंह डाबी ने बताया कि यहां पर बड़ा सा त्रिशूल दीवार पर बना हुआ है ,और उसी की पूजा की जाती है अंतिम दिवस यज्ञ आहुति के साथ पूजा होती है, भोजन भंडारे और यज्ञ का आयोजन ब्रह्मलीन संत केशव जी महाराज के सानिध्य में विगत 50 वर्षों से शुरू किया गया है। आरंभ के दिनों में यज्ञ में ब्रह्मलीन महाराज केशव जी संत भी शामिल होते रहे उन्होंने ही इस स्थान के महत्व के विषय में लोगों को जानकारी दी दीवार के बाहर परिसर में हनुमान जी का प्राचीन स्थान है।

विगत सरपंच द्वारा यहां आस-पास सड़क का निर्माण करवा दिया पुरानी छतरी को भी दुरुस्त करवा दिया था। माता जी का यह स्थान प्राचीन होकर सिद्ध है। करीब 50 एकड़ में फेला यह किला सुरक्षा की दृष्टि से बहुत ही सुरक्षित रहा होगा दो लहर के बाद तीसरी लहर में ही बस्ती रहती होगी हालांकि वर्तमान में दो लहर साफ़ दिखाई देती है शेष खंडहर के रूप में दिखाई देता है यहीं पर प्राचीन बावड़ी बनी है जिसमें वर्ष भर पानी रहता है। कीले के दो मुख्य द्वार खंडहर रूप में दिखाई देते हैं। दूसरे द्वार पर ही माता जी का मंदिर बना हुआ है। ग्रामीण लोगो ने हमारे संवाददाता सुनील जोगी को बताया कि वर्षों पूर्व गरासिया समुदाय के लोग यहां पर निवास करते थे। उन्हीं के द्वारा क्षेत्र में पांच अन्य स्थानों पर भी इसी प्रकार के पहाड़ी किले बनाए थे। वर्तमान में जिनके अवशेष ही बाकी है।

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