इंदौर: इस मानसून सीजन में शहर में सामान्य से लगभग 26 प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई है, जिससे जल संकट और बढ़ते तापमान का खतरा पैदा हो गया है. ऐसे हालातों में पेड़ों की कटाई से पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ गई है. इसी के चलते एमओजी लाइंस में रहवासियों ने पेड़ों की कटाई के विरोध में और हरियाली बचाने के लिए प्रदर्शन कर प्रशासन से जवाब मांगा.
एमओजी लाइंस में पुराने और विशाल पेड़ों की कटाई के विरोध में पिछले दिनों रहवासियों और पर्यावरण प्रेमियों ने मोर्चा खोल दिया. पर्यावरण प्रेमी मंच के नेतृत्व में पहले मौन धरना दिया गया फिर मानव श्रृंखला बनाकर विरोध जताया और रैली निकालकर पेड़ों को बचाने की अपील की गई. प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ी तो पेड़ों की रक्षा के लिए चिपको आंदोलन भी किया जाएगा. इन पेड़ों को स्थानीय लोगों ने वर्षों की मेहनत से सींचकर बड़ा किया है.
अब जमीन कंपनियों को देने के लिए हरित क्षेत्र को उजाड़ने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि क्यों दी जा रही है? कंपनियों को पेड़ काटने की अनुमति किसने दी और क्या इसके लिए नियमानुसार टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई? अक्टूबर में भी महसूस हो रही गर्मी और मानसून की कम बारिश के बीच पेड़ों की कटाई रहवासियों की चिंता बढ़ा रही है. प्रशासन से कटाई रोकने अनुमति संबंधी दस्तावेज सार्वजनिक करने और हरियाली बचाने की मांग उठ रही है. प्रदर्शन में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं राजनीतिक दलों और पर्यावरण प्रेमियों ने भाग लिया.
यह बोले पर्यावरणविद् और बुद्धिजीवी…
पुराने पेड़ शहर की प्राकृतिक धरोहर हैं, इन्हें काटने से पहले सार्वजनिक रूप से अनुमति और कारण बताए जाएं. विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण को उजाड़ने की कीमत पर नहीं.
– डॉ. एसएल गर्ग, शिक्षाविद्
घने और बड़े पेड़ों को काटा जा रहा है. आने वाली पीढ़ियों को छांव और स्वच्छ हवा से वंचित होना पड़ेगा. अगर हरे-भरे पेड़ों की कटाई नहीं रोकी गई तो चिपको आंदोलन करेंगे.
– श्यामसुंदर यादव, श्रमिक नेता
कम बारिश और बढ़ती गर्मी के बीच हरियाली बचाना बेहद जरूरी है. प्रशासन बताए पेड़ों की कटाई की अनुमति किसने दी और हरे-पेड़ों की कटाई पर पर्यावरण की भरपाई के लिए क्या व्यवस्था की गई है.
– डॉ. दिलीप वागेला, पर्यावरणविद्
