राजेश पाराशर का चौंकाने वाला वैज्ञानिक प्रयोग: संकरी गलियों में बजने वाला डीजे सीधे दिल पर कर सकता है हमला

इटारसी: राजेश पाराशर का वैज्ञानिक प्रदर्शन: संकरी गलियों में डीजे का शोर दिल के लिए जानलेवा राजेश पाराशर ने बकरे के दिल पर लाइव डेमो से किया खुलासा: बंद गलियों में डीजे बन सकता है साइलेंट किलरराजेश पाराशर ने साबित किया संकरी गलियों में डीजे का कैन्यन इफेक्ट का खतरा डी जे का जश्‍न कहीं किसी का दिल न तोड़ दे – वैज्ञानिक प्रयोग से समझाया राजेश पाराशर ने रिहायशी इलाकों और संकरी गलियों में बजने वाले डीजे का शोर बुजुर्गों, बच्चों और मरीजों के लिए कितना घातक हो सकता है, इसका आज इटारसी में एक रोंगटे खड़े कर देने वाला वैज्ञानिक प्रदर्शन किया गया। राष्ट्रपति सम्मान से विभूषित राजेश पाराशर ने आम जनता और प्रशासन को जागरूक करने के लिए यह अनूठा लाइव डेमोंस्ट्रेशन किया।
प्रयोग सहयोगी एम एस नरवरिया एवं हरीश चौधरी के साथ प्रयोग करते हुये वैज्ञानिक राजेश पाराशर ने एक मानक साउंड बॉक्स के सामने बकरे के दिल को रखा। तेज बास के साथ म्यूजिक चालू होते ही, लो-फ्रिक्वेंसी साउंड वेव्स के भारी दबाव के कारण बकरे के दिल में तीव्र और अनियंत्रित कंपन देखा गया। श्री पाराशर ने समझाया कि इंसानी दिल की मांसपेशियां भी बकरे के दिल जितनी ही संवेदनशील होती हैं। डीजे का भारी बास हमारे शरीर से टकराकर दिल की धड़कन की प्राकृतिक लय को बिगाड़ देता है, जो दिल के मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
प्रयोग के दूसरे चरण में ध्वनि विज्ञान को समझाने के लिए साउंड बॉक्स के दोनों तरफ प्लाईवुड की दीवारें खड़ी की गईं, जिससे डेसिबल मीटर में भारी उछाल दर्ज हुआ। राजेश पाराशर ने बताया कि खुली जगह में ध्वनि तरंगें हवा में फैल जाती हैं, लेकिन संकरी गलियों में कंक्रीट की दीवारें ध्वनि को रिफ्लेक्ट करती हैं, जिससे वहां टनल या अर्बन कैन्यन एकॉस्टिक्स या कैन्यन इफेक्ट पैदा होता है। इसके कारण संकरी जगह पर ध्वनि का स्तर 6 से 12 डेसिबल तक बढ़ जाता है। डेसिबल स्केल के मुताबिक, हर 3 dB की बढ़ोतरी का मतलब साउंड एनर्जी का दोगुना होना है।
राजेश पाराशर ने कहा कि वर्तमान नियमों में खुली जगह और बंद संकरी गलियों के लिए एक ही मानक तय हैं, जो कि इस प्रयोग के अनुसार सबसे बड़ी कमी है राजेश पाराशर ने कहा कि खुली जगहों और संकरी गलियों के लिए अलग-अलग डेसिबल लिमिट तय की जाना चाहिये ताकि मासूम बच्चों, बीमारों और बुजुर्गों को इस ध्वनि प्रताड़ना से बचाया जा सके।
प्रयोग का विज्ञान –
संकरी गलियों में दोनों तरफ कंक्रीट, ईंट या पत्थरों की दीवारें होती हैं। ये ठोस सतहें ध्वनि तरंगों को वापस टकराकर गली के अंदर ही भेज देती हैं। जिसे सादंड बिल्‍डअप कहा जाता है । आवाज बार-बार टकराने से रिवरबरेशन पैदा होता है। यह गूंज आवाज को लंबे समय तक कानों में टिकने वाली बना देती है
इसके कारण डेसिबल स्तर बढ़ जाता है, जबकि खुली जगह में ध्वनि तरंगें बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ जाती हैं और हवा में फैल जाती हैं, जिससे डेसिबल स्तर कम हो जाता है।
अगर खुली जगह में डीजे का साउंड लेवल 90 dB है, तो उसी वॉल्यूम पर किसी संकरी या बंद गली में दीवारों के रिफ्लेक्शन के कारण यह बढ़कर 96 dB से 102 dB या उससे भी अधिक महसूस हो सकता है। हर 3 dB की बढ़ोतरी का मतलब है साउंड एनर्जी का दोगुना होना। इसलिए बंद गली में डीजे बजाना इंसानी कानों और सेहत के लिए कहीं ज्यादा नुकसानदेह होता है।
राजेश पाराशर ने बताया कि मौजूदा सरकारी नियमों में सबसे बड़ी कमी यही है कि वे खुली जगह और बंद संकरी गलियों के फर्क को नहीं देखते। 55 dB की जो लिमिट खुले ग्राउंड के लिए तय है, वही लिमिट संकरी गलियों के लिए भी है। इस प्रयोग से यह बताया गया है कि संकरी गलियों में कैन्यन इफेक्ट के कारण 55 dB का साउंड भी कई गुना ज्यादा घातक हो जाता है। कैन्यन इफेक्ट वह वैज्ञानिक कारण है जिसकी वजह से बंद गलियों में बजने वाले डीजे की आवाज असहनीय हो जाती है, खिड़कियों के कांच थरथराने लगते हैं और घरों के अंदर रहने वाले बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों का दिल घबराने लगता है। इसलिए बंद गलियों के लिए सरकार को अलग से कड़े नियम बनाने चाहिए

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