कच्चे तेल की सप्लाई पर बड़ा झटका, ओपेक प्लस ने नवंबर महीने में भी उत्पादन बढ़ाने का फैसला टाला

नई दिल्ली, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई और कीमतों को लेकर एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। ओपेक प्लस समूह की महत्वपूर्ण बैठक से पहले सामने आए संकेतों के अनुसार, समूह ने नवंबर महीने के लिए अपने तेल उत्पादन लक्ष्य में कोई भी बदलाव न करने का फैसला किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि सदस्य देशों के लिए तेल उत्पादन का कोटा पहले की तरह ही बरकरार रहेगा। इस स्थिति के पीछे मुख्य वजह पश्चिम एशिया में चल रहा गंभीर भू-राजनीतिक तनाव और ईरान तथा अमेरिका-इजरायल के बीच जारी संघर्ष है, जिसका सीधा असर खाड़ी देशों के ओपेक प्लस उत्पादकों पर साफ तौर पर देखा जा रहा है।

उत्पादन क्षमता प्रभावित होने से निर्यात में भारी गिरावट, वर्ष 2027 के लिए तय होने वाले कोटे की समीक्षा रुकी

मौजूदा संघर्षपूर्ण हालातों के कारण ये देश अपनी तय क्षमता के मुकाबले काफी कम मात्रा में तेल निकाल पा रहे हैं। पिछले कुछ महीनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो इन देशों से होने वाला तेल का निर्यात सामान्य दिनों की तुलना में लुढ़ककर 60 से 80 प्रतिशत के बीच ही सिमट गया है। इस क्षेत्रीय अनिश्चितता का दूरगामी प्रभाव आगामी वर्ष 2027 के लिए तय होने वाले उत्पादन कोटे पर भी पड़ा है, और फिलहाल इस कोटे की समीक्षा के काम को रोक दिया गया है, क्योंकि मौजूदा तनावपूर्ण माहौल में भविष्य की तेल सप्लाई का सटीक आकलन करना बेहद कठिन हो गया है। हालांकि समूह ने साल 2026 के दौरान उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए थे, लेकिन मध्य मिडिल ईस्ट के लगातार गहराते तनाव ने सभी योजनाओं को प्रभावित किया है।

उत्पादन कटौती का नियम रहेगा जारी, विशेषज्ञों के अनुसार 2027 से पहले बड़े बदलाव की संभावना बेहद कम

ओपेक के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, समूह के सात प्रमुख देशों (सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, कजाखस्तान और ओमान) ने मिलकर अगस्त महीने में रोजाना 2.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन किया था। यह आंकड़ा जुलाई के मुकाबले कुछ अधिक जरूर था, लेकिन फरवरी में युद्ध की शुरुआत होने से पहले के स्तर से यह अब भी करीब 50 लाख बैरल प्रतिदिन कम बना हुआ है। वर्तमान समय में अधिकांश सदस्य देशों पर रोजाना लगभग 20 लाख बैरल की उत्पादन कटौती का नियम लागू है। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2027 से पहले ओपेक प्लस के उत्पादन ढांचे में किसी भी बड़े बदलाव की संभावना बेहद कम है।

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