नई दिल्ली, ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक नई रिपोर्ट ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा भारतीय रिफाइनरियों, विशेषकर रिलायंस इंडस्ट्रीज को वेनेजुएला का कच्चा तेल अधिक प्रोसेस करने और वहां निवेश करने के प्रस्ताव पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अमेरिका अपनी नीतियां बदलने के लिए कुख्यात है और यदि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन फिर से पाबंदियां लगाता है, तो भारत के करोड़ों डॉलर के निवेश और लाभांश खतरे में पड़ सकते हैं। अतीत में 2019 के दौरान अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वेनेजुएला में ओएनजीसी और अन्य भारतीय कंपनियों का कामकाज ठप होने का कड़वा अनुभव सामने आ चुका है, इसलिए कोई भी नया व्यावसायिक कदम उठाने से पहले आपूर्ति की विश्वसनीयता और जोखिमों का पूरा आकलन करना बेहद जरूरी है।
रिलायंस की रिफाइनिंग क्षमताओं के अनुकूल है वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल, एमके सुराना ने ऊर्जा स्रोतों में विविधता को बताया फायदेमंद
विशेषज्ञों के अनुसार, वेनेजुएला का कच्चा तेल ‘एक्स्ट्रा हैवी’ (गाढ़ा टार जैसा) होता है, जिसे रिफाइन करने के लिए विशेष अपग्रेडिंग और डाइल्यूएंट्स की आवश्यकता होती है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम के पूर्व सीएमडी एम.के. सुराना ने स्पष्ट किया है कि भारत की सभी रिफाइनरियां इसे प्रोसेस नहीं कर सकतीं, लेकिन रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर स्थित रिफाइनरियां इस तरह के भारी कच्चे तेल को बड़े पैमाने पर संसाधित करने में पूरी तरह सक्षम हैं। हालांकि, सऊदी अरब के उच्च गुणवत्ता वाले तेल की तुलना में कम कीमत (डिस्काउंट) पर मिलने वाले इस तेल की हैंडलिंग लागत और कम ‘यील्ड’ जैसी व्यावसायिक वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना होगा।
रूस से तेल आयात कम करने के अमेरिकी दबाव पर भी उठे सवाल, खुद अमेरिका द्वारा रूस से डीजल खरीदने के दोहरे मापदंड पर चर्चा
एक तरफ जहां वाशिंगटन भारत पर रूस से कच्चे तेल का आयात कम करने का लगातार दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने खुद रूस के साथ समझौता कर अपने यहां डीजल की उपलब्धता सुनिश्चित की है, जिससे रूस को 2027 तक प्रतिबंधों से राहत मिल गई है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि वेनेजुएला से भारत का कच्चा तेल आयात वित्त वर्ष 2026 में तेजी से बढ़कर अरबों डॉलर तक पहुंच चुका है, जिसमें रिलायंस की हिस्सेदारी सर्वाधिक है। ऐसे में भारत को वाशिंगटन के साथ अपनी ऊर्जा सुरक्षा, दीर्घकालिक व्यावसायिक हितों और अमेरिकी मांग की स्थिरता को लेकर स्पष्ट शर्तें तय करनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी भू-राजनीतिक उथल-पुथल से भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों को नुकसान न पहुंचे।

