
ग्वालियर। दीपावली पर दूसरों के घरों को रोशन करने वाले कुम्हारों और छोटे माटी शिल्पियों के घर भी खुशियों का उजाला पहुंचे, इसके लिए कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी रुचिका चौहान ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। इसके तहत मिट्टी के दीये, मूर्तियां, खिलौने, मटके और सजावटी सामान बेचने वालों को बाजारों में निःशुल्क स्थान उपलब्ध कराने तथा मिट्टी के दीये बेचने वालों से कोई कर नहीं लेने के निर्देश दिए गए हैं।
*आदेश कागजों से निकलकर जमीन पर भी दिखे*
मिट्टी के दीये बनाने वाला कुम्हार महीनों मेहनत करता है। उसे उम्मीद रहती है कि दीपावली पर बिक्री होगी तो परिवार की जरूरतें पूरी होंगी और बच्चों के चेहरे पर भी मुस्कान आएगी। लेकिन बाजार में दुकान लगाने की जगह मिलने से लेकर बिक्री तक उसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में सवाल है कि जब कलेक्टर ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं, तो क्या बाजारों में उनका पालन सुनिश्चित होगा? यदि जगह देने के नाम पर छोटे कारोबारियों से पैसे मांगे जाते हैं या उन्हें परेशान किया जाता है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि छोटे कर्मचारियों की मनमानी या कथित वसूली के कारण किसी गरीब कारीगर को परेशानी न उठानी पड़े।
दीपावली का असली अर्थ सिर्फ अपने घर में दीप जलाना नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के जीवन में भी खुशियों का उजाला लाना है। मिट्टी के दीये खरीदना केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि उस कारीगर की मेहनत का सम्मान करना भी है, जिसके हाथ हमारी दीपावली को खास बनाते हैं।
