विजयदशमी पर राजाओं के दर्शन की परंपरा पड़ रही फीकी ! 

सिंगरौली । समय के साथ सामाजिक परंपराएं भी बदलती जा रही हैं। कभी विजयदशमी का पर्व केवल रावण दहन और उत्सव तक सीमित नहीं था, बल्कि इस दिन राजा-महाराजाओं के दर्शन और उनसे मुलाकात की भी विशेष परंपरा रही है। दशहरे के अवसर पर आमजन राजाओं की गढ़ी पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना करते थे और आशीर्वाद लेकर दशहरा मिलन की परंपरा निभाते थे। लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में अब यह परंपरा धीरे-धीरे सिमटती नजर आ रही है। सवाल है कि क्या राजाओं के दर्शन की यह परंपरा समाप्ति की ओर है।

रीवा रियासत के अंतर्गत आने वाले बर्दी खटाई के चंदेल राजवंस के अंतिम शासक के रूप में सिंगरौली जिले की चितरंगी तहसील अंतर्गत खटाई में राजा त्र्यंबकेश प्रताप सिंह जूदेव बर्दी राजघराने के दर्शन के लिए विजयदशमी पर लोगों की भीड़ जुटती थी। अब उनके निधन के बाद उनके पुत्र एवं भाजपा नेता कुंवर कांत देव सिंह राजपरिवार की परंपरा से जुड़े हैं, लेकिन यहां दशहरा मिलन के लिए पहुंचने वालों की संख्या पहले की तुलना में सीमित होती दिखाई देती है। कभी यह आयोजन सामाजिक मेल-मिलाप का महत्वपूर्ण अवसर हुआ करता था। जिला मुख्यालय बैढ़न में बीपी सिंह राजा बाबा के यहां प्रतिवर्ष दशहरा मिलन समारोह आयोजित होता है। हालांकि यहां भी बीते वर्षों की तुलना में लोगों की रुचि कम होने की चर्चा है। पहले दशहरे पर राजा-महाराजाओं के दर्शन को सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरा से जोड़कर देखा जाता था। आखिर क्यों टूट रही परंपरा की कड़ी, इसके पीछे बदलती जीवनशैली, व्यस्त दिनचर्या, नई पीढ़ी की बदलती प्राथमिकताएं और राजशाही व्यवस्था के प्रति घटता आकर्षण जैसे कारण हो सकते हैं। अब देखना यह है कि यह परंपरा केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी या सामाजिक सहभागिता के जरिए इसे नई पहचान मिल सकेगी।

नीलकंठ के दर्शन की परंपरा भी हो रही कमजोर

विजयदशमी की सुबह नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ मानने की लोकमान्यता रही है। लोग सुबह से ही इस पक्षी को देखने की कोशिश करते थे और इसे भगवान का स्वरूप मानकर मंगलकामना करते थे। लेकिन अब नीलकंठ पक्षी कम दिखाई देने की शिकायतें भी सामने आती हैं। इसके पीछे पर्यावरण में बदलाव, प्राकृतिक आवास में कमी और अन्य कारण हो सकते हैं। ऐसे में राजाओं के दर्शन से लेकर नीलकंठ पक्षी के दर्शन तक, परंपराओं के कमजोर पड़ने पर चिंतन जरूरी है। सवाल यह है कि क्या आधुनिक जीवन की व्यस्तता हमारी सांस्कृतिक जड़ों से दूरी बढ़ा रही है, इन परंपराओं को जीवित रखने के लिए सामाजिक जागरूकता और नई पीढ़ी की भागीदारी आवश्यक है।

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