भोपाल। एमपी नगर स्थित विद्योदय तीर्थ में विराजमान आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार स्वाध्याय में अहिंसा, संयम, त्याग और धर्माराधना के महत्व पर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य सांसारिक सुख-भोग नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और कर्मबंधन से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए।
आचार्य श्री ने अहिंसा व्रत के पांच अतिचार बताते हुए कहा कि जीवों को बंधन में डालना, मारना या पीड़ा पहुंचाना, अंगों को काटना-छेदना, क्षमता से अधिक भार लादना तथा भोजन-पानी रोकना हिंसात्मक आचरण हैं। पशुओं के साथ व्यवहार में उनकी क्षमता और जरूरतों का ध्यान रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि धर्म का पालन केवल अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार नहीं, बल्कि आगम में बताई गई विधि और मर्यादा के अनुरूप करना चाहिए। साधना में तप का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण और राग-द्वेष से मुक्ति का प्रयास है। आचार्य श्री ने बाहरी परिग्रह के त्याग के साथ आंतरिक त्याग, संयम और निरंतर साधना पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कठिनाइयों के बावजूद साधक को अपने भाव निर्मल रखने और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
