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समाधान में भी उत्पात

2017/01/24



` तमिलनाडु का जलीकट्टïू आंदोलन वे लोग चला रहे हैं जो सार्वजनिक जीवन में किसी न किसी को बात को बनाकर उस पर हिंसा करने वाले ये लोग पेशेवर हो गये हैं. जलीकट्टïू पर पिछले तीन साल में प्रतिबंध चल रहा था. साधारण तौर पर उसकी मांग की जाती रही लेकिन वह प्रतिबंध जन मानस को स्वीकार ही हो गया था. हाल ही दिनों में मुख्यमंत्री जयललिता की असामयिक मृत्यु के बाद सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक में ही अंदरुनी राजनीति के बाद अंतत: श्री पनीर सेलवम मुख्यमंत्री पद पर कायम बने रहे. नई सरकार को विरोधी दल द्रमुक ने किसी परेशानी में डालने के लिये एकाएक जलीकट्टïू पर एक उग्र आंदोलन खड़ा कर दिया. जबकि पिछले तीन साल से लोग इसी मसले पर खामोश हो गये थे. यह परंपरा या राज्य की संस्कृति का ऐसा मसला नहीं है जिस पर जनता में उद्विग्नता एकदम से इतनी उग्र हो जाए. वास्तव में प्रतिबंध के बाद यह कोई मसला ही नहीं रह गया था. इसे एकाएक बनाया और उभारा गया है. इसमें अन्नाद्रमुक के अंदरुनी या उसके अन्य विरोधी दलों की एक ऐसी चाल में कि नई सरकार को इसमें उलझाए रखा जाए. तमिलनाड में भावनाओं के उभारने के आंदोलन ही वहां की परंपरा लगते है. श्रीलंका में लिट्टïे और वहां तमिल भाषी नागरिक पूरी तौर से उनका ही अंदरूनी मामला था लेकिन उसमें यूपीए सरकार की साझा पार्टी होने के नाते करुणानिधि ने इसे अपनी राज्य की राजनीति बना कर अंतरराष्टï्रीय स्तर पर भारत को बड़े संकोच की स्थिति में डाले रखा. अब फिर लंकाई तमिल के मसले को बनाया व उछाला जा रहा है कि भारत लिट्टे के विरुद्ध कार्यवाही में तमिलों पर हुए कथित अत्याचार की जांच कराये. जबकि श्रीलंका में ही अब यह कोई मसला नहीं है और वहां के तमिल नागरिक विद्रोह और विभाजन की मांग छोड़कर शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं. जलीकट्टू पर अभी हर समय नये-नये ढंग से उसके समाधान को ही नकारा जा रहा है और आंदोलन को राज्यव्यापी हिंसा का रूप दिया गया है. पहले तीन साल से चले आ रहे प्रतिबंध को हटाने की मांग की गयी. उसमें इतनी जल्दी मचाई कि फौरन अध्यादेश जारी करके उस प्रतिबंध को हटाया गया. इस पर राज्य के मुख्यमंत्री श्री पनीर सेलवम व केंद्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने यह हल निकाला कि राज्य सरकार अध्यादेश लागू करके जलीकट्टू को पुन: जारी करा दे. न सिर्फ अध्यादेश जारी हुआ बल्कि उस पर तुरंत विधेयक लाकर उसे कानून भी बना दिया. अब जलीकट्टïू के समर्थकों ने यह समाधान पाकर उसे दूसरे ढंग से और अधिक हिंसा से जारी रखे हुए हैं. अब उनकी मांग है कि केवल अध्यादेश स्वीकार नहीं है इसे स्थाई कानून का रूप दिया जाए. ये आंदोलनकारी भी जानते हैं कि यह तुरंत कार्यवाही का अध्यादेश है जो कानूनी रूप से 6 माह का है. इसी बीच स्थाई कानून भी बनेगा. लेकिन आंदोलनकारियों को जलीकट्टïू से कोई मतलब नहीं है उन्हें तो अन्ना द्रमुक की नई सरकार को लगातार घेरते रहना है. अभी राजधानी चेन्नई में थाना जला कर बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू की है. आगे अब श्रीलंकाई तमिलों के ऐसे मसले पर एक भावनात्मक आंदोलन चलाने की भी तैयारी शुरू कर दी है जो न तो भारत में और न ही श्रीलंका में अब कोई मसला बचा है. जलीकट्टू पर केवल आंदोलन के लिये आंदोलन और हिंसा के लिए ही हिंसा की जा रही है.


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