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बेहतर वित्त प्रबंधन शिवराज सिंह चौहान को सक्षम प्रशासक प्रमाणित करता है. विरासत में मिली बदतर आर्थिक स्थिति को उन्होंने जिस तरह संभाला और प्रदेश को लगातार राजस्व आधिक्य की स्थिति में रखा, वह उनके जीवट और आर्थिक विषयों की गहरी समझ को रेखांकित करता है. प्रदेश का अधोसंरचनागत विकास किसी को भी दूर से ही दिखता है. उनके आलोचक भी मानते हैं कि वर्ष 2003 तक लालटेन के युग में जीने वाला प्रदेश आज बिजली के क्षेत्र में आत्म-निर्भर है. सिंचाई का रकबा अगर 7.5 लाख से 40 लाख हेक्टेयर हुआ तो वे शाबासी के पात्र हैं ही. समकालीन राजनतिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक ऐसे राजनेता के रूप में स्थापित हुए हैं, जो आम आदमी से सीधे जुड़ा है. समग्रता में वे प्रदेशवासियों की दुख-तकलीफों को दूर करने के लिये बिना थके मेहनत करने वाले राजनेता के रूप में स्थापित होने में सफल रहे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री पद को जो ऊँचाई दी है वह उनके पूर्ववर्ती नहीं दे पाये, तो यह उनकी सफलता है और इसका श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में पिछले सवा बारह साल से अपनी लकीर निरन्तर बड़ी की है और वह भी दूसरों की लकीर को छोटा किये बिना. साधारण कार्यकर्ता से असाधारण मुख्यमंत्री के रूप में उनका यह सफर बहुतों के लिये शुरू में अजूबा सा रहा. पर वास्तविकता तो वास्तविकता है. आज वे प्रदेश के सर्वमान्य नेता है तो इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ प्रदेश की जनता द्वारा उनमें लगातार व्यक्त किया जाता रहा विश्वास है. यह विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है और रहेगा. बहुतों को ताज्जुब है कि स्वामी विवेकानंद के दर्शन और विचारों से प्रभावित और गीता का यह मौन उपासक सत्ता के साकेत की दुरभिसंधियों से निपटने और जन-विश्वास की कसौटी पर खरा उतरने के कौशल में इतना पारंगत कैसे है? पद, प्रतिष्ठा तो अनेक लोगों को मिलती है. इनका जैसा उपयोग शिवराज ने मानवता की सेवा, प्रदेशवासियों के कल्याण और प्रदेश के विकास के लिये किया, वह उनको बिरला बनाता है. प्रदेश के तकरीबन पिछले सवा बारह साल गवाह रहे हैं कि शिवराज ने सत्ता और जन-कल्याण के साथ जो तादात्म्य बैठाया है, वह अद्भुत है. इसमें उनकी मदद की मातृ संस्था के संस्कारों, कर्मपथ के प्रति समर्पण और सबसे बढक़र आम आदमी की जन-समस्याओं पर उनके जन-संवेदी दृष्टिकोण ने. आज अगर उनकी उपलब्धियाँ मत-मतांतर और राग-द्ववेष से परे हैं, तो इसका श्रेय भी उनकी अनूठी कार्य-शैली को ही जाता है. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि प्रदेश को बीमारू राज्य की श्रेणी से निकालना तो इतिहास में जगह पायेगी ही. एक समय के कतरन प्रदेश को आज का मध्यप्रदेश बनाने और प्रदेश वासियों में मध्यप्रदेशीय अस्मिता को जगाने में वे सफल रहे. प्रदेश की आज की एकरूप पहचान का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने सभी अंचल के संतुलित विकास पर ध्यान दिया. यह प्रमाणित किया कि मुख्यमंत्री क्षेत्र विशेष का नहीं होता, वह सब वर्गों, सभी तबकों, सभी धर्मों, समाजों और सबसे बढक़र पूरे प्रदेश और सबका होता है. उनके कार्यकाल में सामाजिक सद्भाव का दिनोंदिन बढऩा इसका उदाहरण है. उनकी योजनाएँ भी इसका प्रमाण है चाहे वह मुख्यमंत्री विवाह-निकाह योजना हो या अन्य योजनाएँ. कोई भी योजना हो, वह सब वर्गों के लिये हैं किसी एक या विशेष के लिये नहीं. सोने में सुहागा मुख्यमंत्री निवास पर सभी धर्मों के त्यौहारों को मनाना रहा. फिर वह ईद हो, क्रिसमस हो, प्रकाश पर्व हो, क्षमावाणी हो या हिन्दू त्यौहार. प्रदेश के विकास की उनकी कोशिशें यह बखूबी बयां करती हैं कि वे कृषि और सहयोगी क्षेत्रों को लाभदायी बनाने के साथ औद्योगिक और अधोसंरचना सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के लिये भी समर्पित रहे. शिवराज यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बेरोजगारी का हल सरकारी नौकरियाँ नहीं है. इसलिये उन्होंने शासकीय नौकरियों की जगह युवाओं को स्व-रोजगार अपनाने और उद्यमी बनने के लिये प्रेरित किया. इसके लिये योजनाएँ भी बनायी. वे प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री है जिन्होंने ईमानदारी से यह स्वीकारा कि सरकार अकेले सब कुछ नहीं कर सकती. शिवराज जी ने विकास के एजेण्डा के साथ सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में, बेटियों के जन्म को अभिशाप मानने, नशामुक्ति और पर्यावरण संरक्षण जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर सामाजिक जागरूकता पैदा करने में सफलता हासिल की. उनके बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मिल-बाँचें कार्यक्रम, स्कूल चलें हम अभियान, शौर्या दल, आओ बनाये मध्यप्रदेश, आदिवासी सम्मान यात्रा, नमामि देवि नर्मदे-सेवा यात्रा और एकात्म दर्शन यात्रा को जनता ने हाथों हाथ लिया. ये सभी कार्यक्रम सरकार प्रेरित थे, परन्तु जन-अभियानों और जन-आंदोलनों में बदले, जिन्होंने सरकार के साथ समाज को खड़ा करने की उनकी सोच को बल प्रदान किया. हाशिये के लोगों की सलाह से उनकी भलाई के प्रयास का उनका प्रयोग अनूठा रहा. मुख्यमंत्री निवास पर अनेक कमजोर वर्गों और महिला-किसान पंचायतों का आयोजन विश्व की अनूठी प्रजातांत्रिक कवायद रही. इन्हीं पंचायतों में प्राप्त सुझावों पर बनी लाड़ली लक्ष्मी और मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन जैसी सफल योजनाएँ इसका प्रमाण है. किसने सोचा था कि घरेलू कामकाजी महिला, शिल्पी, कुम्हार, युवा, महिला, किसान, हम्माल, तुलावटी, हाथठेला और रिक्शा चालक, वृद्धजन, केश शिल्पी, चर्म शिल्पी, आदिवासी, विद्यार्थी, फेरीवाले, नि:शक्तजन आदि मुख्यमंत्री निवास में मुख्यमंत्री के मेहमान होंगे और उनसे सीधा संवाद करेंगे. महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सशक्तीकरण ने उन्हें और प्रदेश को देश-विदेश में नयी पहचान दी. जन्म से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, विवाह, संतान उत्पत्ति, रोजगार और अंत्येष्टि तक की योजनाएँ और उन पर कारगर अमल उनका ऐसा काम है जो आधी आबादी के प्रति उनकी संवेदनशीलता को रेखांकित करता है. प्रदेश की महिलाएँ और बच्चियाँ इस बात की गवाह है कि उनके परिवार से अलहदा एक व्यक्ति उनके प्रति करूणा, संवेदना और उनके हालात बदलने की इच्छा रखता है. ताज्जुब तो इस बात का है कि महिलाओं के कल्याण के क्षेत्र में काम कर रही देश-विदेश की नामचीन संस्थाओं ने उनके इस काम का अभी तक संज्ञान क्यों नहीं लिया. पानी चाहे वह नर्मदा का हो या अन्य नदियों का पीने और सिंचाई के काम में संतुलित रूप से इस्तेमाल हो रहा है. सडक़ों, पुल, पुलिया का निर्माण जितना इन सवा बारह साल में हुआ उतना पहले के पचास सालों में भी नहीं हुआ. सुशासन के मामले में भी उनकी पहल अनूठी रही है. वर्ष 2010 में लोक सेवाओं के प्रदान का गारंटी अधिनियम, जन-सुनवाई, समाधान ऑनलाइन, समाधान एक-दिन तत्काल सेवा, अंत्योदय मेले, लोक कल्याण शिविर, सी.एम. हेल्पलाइन, और सबसे बढक़र सुशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग उन्हें प्रजापालक मुख्यमंत्री बनाता है. खाद्य सुरक्षा और वन अधिकार अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन इस बात का प्रमाण है कि वे सरकार में लोगों का विश्वास बढ़ाने में सफल रहे हैं. पिछले वर्ष प्रदेश के हर आवासहीन को जमीन उपलब्ध कराने के लिये बनाया गया कानून और 12 साल तक की बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों के लिये फाँसी की सजा के प्रावधान वाले मध्यप्रदेश दण्ड संहिता (संशोधन) विधेयक को राज्य विधानसभा से पारित करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य उनके कार्यकाल में ही बना है. इससे पहले भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस की नीति और कानून-व्यवस्था की बेहतरी के लिये किये गये प्रयास और भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को राजसात करने के लिये बना कानून उनके मुख्यमंत्रित्वकाल के मील का पत्थर है. कुल मिलाकर उन्होंने आवाम में अपने प्रति भरोसा जगाया है. लगता है कि कोई है, जो सिर्फ देखेगा नहीं करेगा भी. तकरीबन सवा 12 साल के कार्यकाल में यह स्थापित करने में वे सफल रहे हैं कि सत्ता महज सत्ता पाने के लिये नहीं होती, उसका उपयोग या यूँ कहे कि सदुपयोग कर प्रदेश की तकदीर और तस्वीर बदली जा सकती है. उसमें लोगों की तरक्की और खुशहाली के रंग भरे जा सकते हैं. अगर आप मेधावी है, तो सरकार के खर्चें पर उच्च शिक्षा प्राप्त करना, रिसर्च करना, विदेश अध्ययन जाना सिर्फ मध्यप्रदेश में संभव है. आज अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, सबको दवाई, पढ़ाई, रोजगार, सिर पर छत आज अगर उनकी प्राथमिकता है, तो यह गैर वाजिब नहीं है. केन्द्र की योजनाओं पर तत्परता से अमल और मानिटरिंग, उन्हें और अधिक स्वीकार्य बनाते हैं. इस सबके बीच उन्होंने अपनी सरल, सहज व्यक्तित्व की जो अजातशत्रु यू.एस.पी. बनाई है, वह भी उन्हें विशिष्ट बनाती है."/> बेहतर वित्त प्रबंधन शिवराज सिंह चौहान को सक्षम प्रशासक प्रमाणित करता है. विरासत में मिली बदतर आर्थिक स्थिति को उन्होंने जिस तरह संभाला और प्रदेश को लगातार राजस्व आधिक्य की स्थिति में रखा, वह उनके जीवट और आर्थिक विषयों की गहरी समझ को रेखांकित करता है. प्रदेश का अधोसंरचनागत विकास किसी को भी दूर से ही दिखता है. उनके आलोचक भी मानते हैं कि वर्ष 2003 तक लालटेन के युग में जीने वाला प्रदेश आज बिजली के क्षेत्र में आत्म-निर्भर है. सिंचाई का रकबा अगर 7.5 लाख से 40 लाख हेक्टेयर हुआ तो वे शाबासी के पात्र हैं ही. समकालीन राजनतिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक ऐसे राजनेता के रूप में स्थापित हुए हैं, जो आम आदमी से सीधे जुड़ा है. समग्रता में वे प्रदेशवासियों की दुख-तकलीफों को दूर करने के लिये बिना थके मेहनत करने वाले राजनेता के रूप में स्थापित होने में सफल रहे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री पद को जो ऊँचाई दी है वह उनके पूर्ववर्ती नहीं दे पाये, तो यह उनकी सफलता है और इसका श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में पिछले सवा बारह साल से अपनी लकीर निरन्तर बड़ी की है और वह भी दूसरों की लकीर को छोटा किये बिना. साधारण कार्यकर्ता से असाधारण मुख्यमंत्री के रूप में उनका यह सफर बहुतों के लिये शुरू में अजूबा सा रहा. पर वास्तविकता तो वास्तविकता है. आज वे प्रदेश के सर्वमान्य नेता है तो इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ प्रदेश की जनता द्वारा उनमें लगातार व्यक्त किया जाता रहा विश्वास है. यह विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है और रहेगा. बहुतों को ताज्जुब है कि स्वामी विवेकानंद के दर्शन और विचारों से प्रभावित और गीता का यह मौन उपासक सत्ता के साकेत की दुरभिसंधियों से निपटने और जन-विश्वास की कसौटी पर खरा उतरने के कौशल में इतना पारंगत कैसे है? पद, प्रतिष्ठा तो अनेक लोगों को मिलती है. इनका जैसा उपयोग शिवराज ने मानवता की सेवा, प्रदेशवासियों के कल्याण और प्रदेश के विकास के लिये किया, वह उनको बिरला बनाता है. प्रदेश के तकरीबन पिछले सवा बारह साल गवाह रहे हैं कि शिवराज ने सत्ता और जन-कल्याण के साथ जो तादात्म्य बैठाया है, वह अद्भुत है. इसमें उनकी मदद की मातृ संस्था के संस्कारों, कर्मपथ के प्रति समर्पण और सबसे बढक़र आम आदमी की जन-समस्याओं पर उनके जन-संवेदी दृष्टिकोण ने. आज अगर उनकी उपलब्धियाँ मत-मतांतर और राग-द्ववेष से परे हैं, तो इसका श्रेय भी उनकी अनूठी कार्य-शैली को ही जाता है. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि प्रदेश को बीमारू राज्य की श्रेणी से निकालना तो इतिहास में जगह पायेगी ही. एक समय के कतरन प्रदेश को आज का मध्यप्रदेश बनाने और प्रदेश वासियों में मध्यप्रदेशीय अस्मिता को जगाने में वे सफल रहे. प्रदेश की आज की एकरूप पहचान का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने सभी अंचल के संतुलित विकास पर ध्यान दिया. यह प्रमाणित किया कि मुख्यमंत्री क्षेत्र विशेष का नहीं होता, वह सब वर्गों, सभी तबकों, सभी धर्मों, समाजों और सबसे बढक़र पूरे प्रदेश और सबका होता है. उनके कार्यकाल में सामाजिक सद्भाव का दिनोंदिन बढऩा इसका उदाहरण है. उनकी योजनाएँ भी इसका प्रमाण है चाहे वह मुख्यमंत्री विवाह-निकाह योजना हो या अन्य योजनाएँ. कोई भी योजना हो, वह सब वर्गों के लिये हैं किसी एक या विशेष के लिये नहीं. सोने में सुहागा मुख्यमंत्री निवास पर सभी धर्मों के त्यौहारों को मनाना रहा. फिर वह ईद हो, क्रिसमस हो, प्रकाश पर्व हो, क्षमावाणी हो या हिन्दू त्यौहार. प्रदेश के विकास की उनकी कोशिशें यह बखूबी बयां करती हैं कि वे कृषि और सहयोगी क्षेत्रों को लाभदायी बनाने के साथ औद्योगिक और अधोसंरचना सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के लिये भी समर्पित रहे. शिवराज यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बेरोजगारी का हल सरकारी नौकरियाँ नहीं है. इसलिये उन्होंने शासकीय नौकरियों की जगह युवाओं को स्व-रोजगार अपनाने और उद्यमी बनने के लिये प्रेरित किया. इसके लिये योजनाएँ भी बनायी. वे प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री है जिन्होंने ईमानदारी से यह स्वीकारा कि सरकार अकेले सब कुछ नहीं कर सकती. शिवराज जी ने विकास के एजेण्डा के साथ सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में, बेटियों के जन्म को अभिशाप मानने, नशामुक्ति और पर्यावरण संरक्षण जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर सामाजिक जागरूकता पैदा करने में सफलता हासिल की. उनके बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मिल-बाँचें कार्यक्रम, स्कूल चलें हम अभियान, शौर्या दल, आओ बनाये मध्यप्रदेश, आदिवासी सम्मान यात्रा, नमामि देवि नर्मदे-सेवा यात्रा और एकात्म दर्शन यात्रा को जनता ने हाथों हाथ लिया. ये सभी कार्यक्रम सरकार प्रेरित थे, परन्तु जन-अभियानों और जन-आंदोलनों में बदले, जिन्होंने सरकार के साथ समाज को खड़ा करने की उनकी सोच को बल प्रदान किया. हाशिये के लोगों की सलाह से उनकी भलाई के प्रयास का उनका प्रयोग अनूठा रहा. मुख्यमंत्री निवास पर अनेक कमजोर वर्गों और महिला-किसान पंचायतों का आयोजन विश्व की अनूठी प्रजातांत्रिक कवायद रही. इन्हीं पंचायतों में प्राप्त सुझावों पर बनी लाड़ली लक्ष्मी और मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन जैसी सफल योजनाएँ इसका प्रमाण है. किसने सोचा था कि घरेलू कामकाजी महिला, शिल्पी, कुम्हार, युवा, महिला, किसान, हम्माल, तुलावटी, हाथठेला और रिक्शा चालक, वृद्धजन, केश शिल्पी, चर्म शिल्पी, आदिवासी, विद्यार्थी, फेरीवाले, नि:शक्तजन आदि मुख्यमंत्री निवास में मुख्यमंत्री के मेहमान होंगे और उनसे सीधा संवाद करेंगे. महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सशक्तीकरण ने उन्हें और प्रदेश को देश-विदेश में नयी पहचान दी. जन्म से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, विवाह, संतान उत्पत्ति, रोजगार और अंत्येष्टि तक की योजनाएँ और उन पर कारगर अमल उनका ऐसा काम है जो आधी आबादी के प्रति उनकी संवेदनशीलता को रेखांकित करता है. प्रदेश की महिलाएँ और बच्चियाँ इस बात की गवाह है कि उनके परिवार से अलहदा एक व्यक्ति उनके प्रति करूणा, संवेदना और उनके हालात बदलने की इच्छा रखता है. ताज्जुब तो इस बात का है कि महिलाओं के कल्याण के क्षेत्र में काम कर रही देश-विदेश की नामचीन संस्थाओं ने उनके इस काम का अभी तक संज्ञान क्यों नहीं लिया. पानी चाहे वह नर्मदा का हो या अन्य नदियों का पीने और सिंचाई के काम में संतुलित रूप से इस्तेमाल हो रहा है. सडक़ों, पुल, पुलिया का निर्माण जितना इन सवा बारह साल में हुआ उतना पहले के पचास सालों में भी नहीं हुआ. सुशासन के मामले में भी उनकी पहल अनूठी रही है. वर्ष 2010 में लोक सेवाओं के प्रदान का गारंटी अधिनियम, जन-सुनवाई, समाधान ऑनलाइन, समाधान एक-दिन तत्काल सेवा, अंत्योदय मेले, लोक कल्याण शिविर, सी.एम. हेल्पलाइन, और सबसे बढक़र सुशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग उन्हें प्रजापालक मुख्यमंत्री बनाता है. खाद्य सुरक्षा और वन अधिकार अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन इस बात का प्रमाण है कि वे सरकार में लोगों का विश्वास बढ़ाने में सफल रहे हैं. पिछले वर्ष प्रदेश के हर आवासहीन को जमीन उपलब्ध कराने के लिये बनाया गया कानून और 12 साल तक की बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों के लिये फाँसी की सजा के प्रावधान वाले मध्यप्रदेश दण्ड संहिता (संशोधन) विधेयक को राज्य विधानसभा से पारित करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य उनके कार्यकाल में ही बना है. इससे पहले भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस की नीति और कानून-व्यवस्था की बेहतरी के लिये किये गये प्रयास और भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को राजसात करने के लिये बना कानून उनके मुख्यमंत्रित्वकाल के मील का पत्थर है. कुल मिलाकर उन्होंने आवाम में अपने प्रति भरोसा जगाया है. लगता है कि कोई है, जो सिर्फ देखेगा नहीं करेगा भी. तकरीबन सवा 12 साल के कार्यकाल में यह स्थापित करने में वे सफल रहे हैं कि सत्ता महज सत्ता पाने के लिये नहीं होती, उसका उपयोग या यूँ कहे कि सदुपयोग कर प्रदेश की तकदीर और तस्वीर बदली जा सकती है. उसमें लोगों की तरक्की और खुशहाली के रंग भरे जा सकते हैं. अगर आप मेधावी है, तो सरकार के खर्चें पर उच्च शिक्षा प्राप्त करना, रिसर्च करना, विदेश अध्ययन जाना सिर्फ मध्यप्रदेश में संभव है. आज अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, सबको दवाई, पढ़ाई, रोजगार, सिर पर छत आज अगर उनकी प्राथमिकता है, तो यह गैर वाजिब नहीं है. केन्द्र की योजनाओं पर तत्परता से अमल और मानिटरिंग, उन्हें और अधिक स्वीकार्य बनाते हैं. इस सबके बीच उन्होंने अपनी सरल, सहज व्यक्तित्व की जो अजातशत्रु यू.एस.पी. बनाई है, वह भी उन्हें विशिष्ट बनाती है."/> बेहतर वित्त प्रबंधन शिवराज सिंह चौहान को सक्षम प्रशासक प्रमाणित करता है. विरासत में मिली बदतर आर्थिक स्थिति को उन्होंने जिस तरह संभाला और प्रदेश को लगातार राजस्व आधिक्य की स्थिति में रखा, वह उनके जीवट और आर्थिक विषयों की गहरी समझ को रेखांकित करता है. प्रदेश का अधोसंरचनागत विकास किसी को भी दूर से ही दिखता है. उनके आलोचक भी मानते हैं कि वर्ष 2003 तक लालटेन के युग में जीने वाला प्रदेश आज बिजली के क्षेत्र में आत्म-निर्भर है. सिंचाई का रकबा अगर 7.5 लाख से 40 लाख हेक्टेयर हुआ तो वे शाबासी के पात्र हैं ही. समकालीन राजनतिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक ऐसे राजनेता के रूप में स्थापित हुए हैं, जो आम आदमी से सीधे जुड़ा है. समग्रता में वे प्रदेशवासियों की दुख-तकलीफों को दूर करने के लिये बिना थके मेहनत करने वाले राजनेता के रूप में स्थापित होने में सफल रहे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री पद को जो ऊँचाई दी है वह उनके पूर्ववर्ती नहीं दे पाये, तो यह उनकी सफलता है और इसका श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में पिछले सवा बारह साल से अपनी लकीर निरन्तर बड़ी की है और वह भी दूसरों की लकीर को छोटा किये बिना. साधारण कार्यकर्ता से असाधारण मुख्यमंत्री के रूप में उनका यह सफर बहुतों के लिये शुरू में अजूबा सा रहा. पर वास्तविकता तो वास्तविकता है. आज वे प्रदेश के सर्वमान्य नेता है तो इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ प्रदेश की जनता द्वारा उनमें लगातार व्यक्त किया जाता रहा विश्वास है. यह विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है और रहेगा. बहुतों को ताज्जुब है कि स्वामी विवेकानंद के दर्शन और विचारों से प्रभावित और गीता का यह मौन उपासक सत्ता के साकेत की दुरभिसंधियों से निपटने और जन-विश्वास की कसौटी पर खरा उतरने के कौशल में इतना पारंगत कैसे है? पद, प्रतिष्ठा तो अनेक लोगों को मिलती है. इनका जैसा उपयोग शिवराज ने मानवता की सेवा, प्रदेशवासियों के कल्याण और प्रदेश के विकास के लिये किया, वह उनको बिरला बनाता है. प्रदेश के तकरीबन पिछले सवा बारह साल गवाह रहे हैं कि शिवराज ने सत्ता और जन-कल्याण के साथ जो तादात्म्य बैठाया है, वह अद्भुत है. इसमें उनकी मदद की मातृ संस्था के संस्कारों, कर्मपथ के प्रति समर्पण और सबसे बढक़र आम आदमी की जन-समस्याओं पर उनके जन-संवेदी दृष्टिकोण ने. आज अगर उनकी उपलब्धियाँ मत-मतांतर और राग-द्ववेष से परे हैं, तो इसका श्रेय भी उनकी अनूठी कार्य-शैली को ही जाता है. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि प्रदेश को बीमारू राज्य की श्रेणी से निकालना तो इतिहास में जगह पायेगी ही. एक समय के कतरन प्रदेश को आज का मध्यप्रदेश बनाने और प्रदेश वासियों में मध्यप्रदेशीय अस्मिता को जगाने में वे सफल रहे. प्रदेश की आज की एकरूप पहचान का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने सभी अंचल के संतुलित विकास पर ध्यान दिया. यह प्रमाणित किया कि मुख्यमंत्री क्षेत्र विशेष का नहीं होता, वह सब वर्गों, सभी तबकों, सभी धर्मों, समाजों और सबसे बढक़र पूरे प्रदेश और सबका होता है. उनके कार्यकाल में सामाजिक सद्भाव का दिनोंदिन बढऩा इसका उदाहरण है. उनकी योजनाएँ भी इसका प्रमाण है चाहे वह मुख्यमंत्री विवाह-निकाह योजना हो या अन्य योजनाएँ. कोई भी योजना हो, वह सब वर्गों के लिये हैं किसी एक या विशेष के लिये नहीं. सोने में सुहागा मुख्यमंत्री निवास पर सभी धर्मों के त्यौहारों को मनाना रहा. फिर वह ईद हो, क्रिसमस हो, प्रकाश पर्व हो, क्षमावाणी हो या हिन्दू त्यौहार. प्रदेश के विकास की उनकी कोशिशें यह बखूबी बयां करती हैं कि वे कृषि और सहयोगी क्षेत्रों को लाभदायी बनाने के साथ औद्योगिक और अधोसंरचना सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के लिये भी समर्पित रहे. शिवराज यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बेरोजगारी का हल सरकारी नौकरियाँ नहीं है. इसलिये उन्होंने शासकीय नौकरियों की जगह युवाओं को स्व-रोजगार अपनाने और उद्यमी बनने के लिये प्रेरित किया. इसके लिये योजनाएँ भी बनायी. वे प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री है जिन्होंने ईमानदारी से यह स्वीकारा कि सरकार अकेले सब कुछ नहीं कर सकती. शिवराज जी ने विकास के एजेण्डा के साथ सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में, बेटियों के जन्म को अभिशाप मानने, नशामुक्ति और पर्यावरण संरक्षण जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर सामाजिक जागरूकता पैदा करने में सफलता हासिल की. उनके बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मिल-बाँचें कार्यक्रम, स्कूल चलें हम अभियान, शौर्या दल, आओ बनाये मध्यप्रदेश, आदिवासी सम्मान यात्रा, नमामि देवि नर्मदे-सेवा यात्रा और एकात्म दर्शन यात्रा को जनता ने हाथों हाथ लिया. ये सभी कार्यक्रम सरकार प्रेरित थे, परन्तु जन-अभियानों और जन-आंदोलनों में बदले, जिन्होंने सरकार के साथ समाज को खड़ा करने की उनकी सोच को बल प्रदान किया. हाशिये के लोगों की सलाह से उनकी भलाई के प्रयास का उनका प्रयोग अनूठा रहा. मुख्यमंत्री निवास पर अनेक कमजोर वर्गों और महिला-किसान पंचायतों का आयोजन विश्व की अनूठी प्रजातांत्रिक कवायद रही. इन्हीं पंचायतों में प्राप्त सुझावों पर बनी लाड़ली लक्ष्मी और मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन जैसी सफल योजनाएँ इसका प्रमाण है. किसने सोचा था कि घरेलू कामकाजी महिला, शिल्पी, कुम्हार, युवा, महिला, किसान, हम्माल, तुलावटी, हाथठेला और रिक्शा चालक, वृद्धजन, केश शिल्पी, चर्म शिल्पी, आदिवासी, विद्यार्थी, फेरीवाले, नि:शक्तजन आदि मुख्यमंत्री निवास में मुख्यमंत्री के मेहमान होंगे और उनसे सीधा संवाद करेंगे. महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सशक्तीकरण ने उन्हें और प्रदेश को देश-विदेश में नयी पहचान दी. जन्म से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, विवाह, संतान उत्पत्ति, रोजगार और अंत्येष्टि तक की योजनाएँ और उन पर कारगर अमल उनका ऐसा काम है जो आधी आबादी के प्रति उनकी संवेदनशीलता को रेखांकित करता है. प्रदेश की महिलाएँ और बच्चियाँ इस बात की गवाह है कि उनके परिवार से अलहदा एक व्यक्ति उनके प्रति करूणा, संवेदना और उनके हालात बदलने की इच्छा रखता है. ताज्जुब तो इस बात का है कि महिलाओं के कल्याण के क्षेत्र में काम कर रही देश-विदेश की नामचीन संस्थाओं ने उनके इस काम का अभी तक संज्ञान क्यों नहीं लिया. पानी चाहे वह नर्मदा का हो या अन्य नदियों का पीने और सिंचाई के काम में संतुलित रूप से इस्तेमाल हो रहा है. सडक़ों, पुल, पुलिया का निर्माण जितना इन सवा बारह साल में हुआ उतना पहले के पचास सालों में भी नहीं हुआ. सुशासन के मामले में भी उनकी पहल अनूठी रही है. वर्ष 2010 में लोक सेवाओं के प्रदान का गारंटी अधिनियम, जन-सुनवाई, समाधान ऑनलाइन, समाधान एक-दिन तत्काल सेवा, अंत्योदय मेले, लोक कल्याण शिविर, सी.एम. हेल्पलाइन, और सबसे बढक़र सुशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग उन्हें प्रजापालक मुख्यमंत्री बनाता है. खाद्य सुरक्षा और वन अधिकार अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन इस बात का प्रमाण है कि वे सरकार में लोगों का विश्वास बढ़ाने में सफल रहे हैं. पिछले वर्ष प्रदेश के हर आवासहीन को जमीन उपलब्ध कराने के लिये बनाया गया कानून और 12 साल तक की बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों के लिये फाँसी की सजा के प्रावधान वाले मध्यप्रदेश दण्ड संहिता (संशोधन) विधेयक को राज्य विधानसभा से पारित करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य उनके कार्यकाल में ही बना है. इससे पहले भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस की नीति और कानून-व्यवस्था की बेहतरी के लिये किये गये प्रयास और भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को राजसात करने के लिये बना कानून उनके मुख्यमंत्रित्वकाल के मील का पत्थर है. कुल मिलाकर उन्होंने आवाम में अपने प्रति भरोसा जगाया है. लगता है कि कोई है, जो सिर्फ देखेगा नहीं करेगा भी. तकरीबन सवा 12 साल के कार्यकाल में यह स्थापित करने में वे सफल रहे हैं कि सत्ता महज सत्ता पाने के लिये नहीं होती, उसका उपयोग या यूँ कहे कि सदुपयोग कर प्रदेश की तकदीर और तस्वीर बदली जा सकती है. उसमें लोगों की तरक्की और खुशहाली के रंग भरे जा सकते हैं. अगर आप मेधावी है, तो सरकार के खर्चें पर उच्च शिक्षा प्राप्त करना, रिसर्च करना, विदेश अध्ययन जाना सिर्फ मध्यप्रदेश में संभव है. आज अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, सबको दवाई, पढ़ाई, रोजगार, सिर पर छत आज अगर उनकी प्राथमिकता है, तो यह गैर वाजिब नहीं है. केन्द्र की योजनाओं पर तत्परता से अमल और मानिटरिंग, उन्हें और अधिक स्वीकार्य बनाते हैं. इस सबके बीच उन्होंने अपनी सरल, सहज व्यक्तित्व की जो अजातशत्रु यू.एस.पी. बनाई है, वह भी उन्हें विशिष्ट बनाती है.">

सत्ता और जन-कल्याण के अद्भुत तादात्म्य के प्रणेता हैं शिवराज

2018/03/05



बेहतर वित्त प्रबंधन शिवराज सिंह चौहान को सक्षम प्रशासक प्रमाणित करता है. विरासत में मिली बदतर आर्थिक स्थिति को उन्होंने जिस तरह संभाला और प्रदेश को लगातार राजस्व आधिक्य की स्थिति में रखा, वह उनके जीवट और आर्थिक विषयों की गहरी समझ को रेखांकित करता है. प्रदेश का अधोसंरचनागत विकास किसी को भी दूर से ही दिखता है. उनके आलोचक भी मानते हैं कि वर्ष 2003 तक लालटेन के युग में जीने वाला प्रदेश आज बिजली के क्षेत्र में आत्म-निर्भर है. सिंचाई का रकबा अगर 7.5 लाख से 40 लाख हेक्टेयर हुआ तो वे शाबासी के पात्र हैं ही. समकालीन राजनतिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक ऐसे राजनेता के रूप में स्थापित हुए हैं, जो आम आदमी से सीधे जुड़ा है. समग्रता में वे प्रदेशवासियों की दुख-तकलीफों को दूर करने के लिये बिना थके मेहनत करने वाले राजनेता के रूप में स्थापित होने में सफल रहे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री पद को जो ऊँचाई दी है वह उनके पूर्ववर्ती नहीं दे पाये, तो यह उनकी सफलता है और इसका श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में पिछले सवा बारह साल से अपनी लकीर निरन्तर बड़ी की है और वह भी दूसरों की लकीर को छोटा किये बिना. साधारण कार्यकर्ता से असाधारण मुख्यमंत्री के रूप में उनका यह सफर बहुतों के लिये शुरू में अजूबा सा रहा. पर वास्तविकता तो वास्तविकता है. आज वे प्रदेश के सर्वमान्य नेता है तो इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ प्रदेश की जनता द्वारा उनमें लगातार व्यक्त किया जाता रहा विश्वास है. यह विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है और रहेगा. बहुतों को ताज्जुब है कि स्वामी विवेकानंद के दर्शन और विचारों से प्रभावित और गीता का यह मौन उपासक सत्ता के साकेत की दुरभिसंधियों से निपटने और जन-विश्वास की कसौटी पर खरा उतरने के कौशल में इतना पारंगत कैसे है? पद, प्रतिष्ठा तो अनेक लोगों को मिलती है. इनका जैसा उपयोग शिवराज ने मानवता की सेवा, प्रदेशवासियों के कल्याण और प्रदेश के विकास के लिये किया, वह उनको बिरला बनाता है. प्रदेश के तकरीबन पिछले सवा बारह साल गवाह रहे हैं कि शिवराज ने सत्ता और जन-कल्याण के साथ जो तादात्म्य बैठाया है, वह अद्भुत है. इसमें उनकी मदद की मातृ संस्था के संस्कारों, कर्मपथ के प्रति समर्पण और सबसे बढक़र आम आदमी की जन-समस्याओं पर उनके जन-संवेदी दृष्टिकोण ने. आज अगर उनकी उपलब्धियाँ मत-मतांतर और राग-द्ववेष से परे हैं, तो इसका श्रेय भी उनकी अनूठी कार्य-शैली को ही जाता है. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि प्रदेश को बीमारू राज्य की श्रेणी से निकालना तो इतिहास में जगह पायेगी ही. एक समय के कतरन प्रदेश को आज का मध्यप्रदेश बनाने और प्रदेश वासियों में मध्यप्रदेशीय अस्मिता को जगाने में वे सफल रहे. प्रदेश की आज की एकरूप पहचान का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. उन्होंने सभी अंचल के संतुलित विकास पर ध्यान दिया. यह प्रमाणित किया कि मुख्यमंत्री क्षेत्र विशेष का नहीं होता, वह सब वर्गों, सभी तबकों, सभी धर्मों, समाजों और सबसे बढक़र पूरे प्रदेश और सबका होता है. उनके कार्यकाल में सामाजिक सद्भाव का दिनोंदिन बढऩा इसका उदाहरण है. उनकी योजनाएँ भी इसका प्रमाण है चाहे वह मुख्यमंत्री विवाह-निकाह योजना हो या अन्य योजनाएँ. कोई भी योजना हो, वह सब वर्गों के लिये हैं किसी एक या विशेष के लिये नहीं. सोने में सुहागा मुख्यमंत्री निवास पर सभी धर्मों के त्यौहारों को मनाना रहा. फिर वह ईद हो, क्रिसमस हो, प्रकाश पर्व हो, क्षमावाणी हो या हिन्दू त्यौहार. प्रदेश के विकास की उनकी कोशिशें यह बखूबी बयां करती हैं कि वे कृषि और सहयोगी क्षेत्रों को लाभदायी बनाने के साथ औद्योगिक और अधोसंरचना सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के लिये भी समर्पित रहे. शिवराज यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बेरोजगारी का हल सरकारी नौकरियाँ नहीं है. इसलिये उन्होंने शासकीय नौकरियों की जगह युवाओं को स्व-रोजगार अपनाने और उद्यमी बनने के लिये प्रेरित किया. इसके लिये योजनाएँ भी बनायी. वे प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री है जिन्होंने ईमानदारी से यह स्वीकारा कि सरकार अकेले सब कुछ नहीं कर सकती. शिवराज जी ने विकास के एजेण्डा के साथ सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में, बेटियों के जन्म को अभिशाप मानने, नशामुक्ति और पर्यावरण संरक्षण जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर सामाजिक जागरूकता पैदा करने में सफलता हासिल की. उनके बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मिल-बाँचें कार्यक्रम, स्कूल चलें हम अभियान, शौर्या दल, आओ बनाये मध्यप्रदेश, आदिवासी सम्मान यात्रा, नमामि देवि नर्मदे-सेवा यात्रा और एकात्म दर्शन यात्रा को जनता ने हाथों हाथ लिया. ये सभी कार्यक्रम सरकार प्रेरित थे, परन्तु जन-अभियानों और जन-आंदोलनों में बदले, जिन्होंने सरकार के साथ समाज को खड़ा करने की उनकी सोच को बल प्रदान किया. हाशिये के लोगों की सलाह से उनकी भलाई के प्रयास का उनका प्रयोग अनूठा रहा. मुख्यमंत्री निवास पर अनेक कमजोर वर्गों और महिला-किसान पंचायतों का आयोजन विश्व की अनूठी प्रजातांत्रिक कवायद रही. इन्हीं पंचायतों में प्राप्त सुझावों पर बनी लाड़ली लक्ष्मी और मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन जैसी सफल योजनाएँ इसका प्रमाण है. किसने सोचा था कि घरेलू कामकाजी महिला, शिल्पी, कुम्हार, युवा, महिला, किसान, हम्माल, तुलावटी, हाथठेला और रिक्शा चालक, वृद्धजन, केश शिल्पी, चर्म शिल्पी, आदिवासी, विद्यार्थी, फेरीवाले, नि:शक्तजन आदि मुख्यमंत्री निवास में मुख्यमंत्री के मेहमान होंगे और उनसे सीधा संवाद करेंगे. महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सशक्तीकरण ने उन्हें और प्रदेश को देश-विदेश में नयी पहचान दी. जन्म से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, विवाह, संतान उत्पत्ति, रोजगार और अंत्येष्टि तक की योजनाएँ और उन पर कारगर अमल उनका ऐसा काम है जो आधी आबादी के प्रति उनकी संवेदनशीलता को रेखांकित करता है. प्रदेश की महिलाएँ और बच्चियाँ इस बात की गवाह है कि उनके परिवार से अलहदा एक व्यक्ति उनके प्रति करूणा, संवेदना और उनके हालात बदलने की इच्छा रखता है. ताज्जुब तो इस बात का है कि महिलाओं के कल्याण के क्षेत्र में काम कर रही देश-विदेश की नामचीन संस्थाओं ने उनके इस काम का अभी तक संज्ञान क्यों नहीं लिया. पानी चाहे वह नर्मदा का हो या अन्य नदियों का पीने और सिंचाई के काम में संतुलित रूप से इस्तेमाल हो रहा है. सडक़ों, पुल, पुलिया का निर्माण जितना इन सवा बारह साल में हुआ उतना पहले के पचास सालों में भी नहीं हुआ. सुशासन के मामले में भी उनकी पहल अनूठी रही है. वर्ष 2010 में लोक सेवाओं के प्रदान का गारंटी अधिनियम, जन-सुनवाई, समाधान ऑनलाइन, समाधान एक-दिन तत्काल सेवा, अंत्योदय मेले, लोक कल्याण शिविर, सी.एम. हेल्पलाइन, और सबसे बढक़र सुशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग उन्हें प्रजापालक मुख्यमंत्री बनाता है. खाद्य सुरक्षा और वन अधिकार अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन इस बात का प्रमाण है कि वे सरकार में लोगों का विश्वास बढ़ाने में सफल रहे हैं. पिछले वर्ष प्रदेश के हर आवासहीन को जमीन उपलब्ध कराने के लिये बनाया गया कानून और 12 साल तक की बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों के लिये फाँसी की सजा के प्रावधान वाले मध्यप्रदेश दण्ड संहिता (संशोधन) विधेयक को राज्य विधानसभा से पारित करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य उनके कार्यकाल में ही बना है. इससे पहले भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस की नीति और कानून-व्यवस्था की बेहतरी के लिये किये गये प्रयास और भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को राजसात करने के लिये बना कानून उनके मुख्यमंत्रित्वकाल के मील का पत्थर है. कुल मिलाकर उन्होंने आवाम में अपने प्रति भरोसा जगाया है. लगता है कि कोई है, जो सिर्फ देखेगा नहीं करेगा भी. तकरीबन सवा 12 साल के कार्यकाल में यह स्थापित करने में वे सफल रहे हैं कि सत्ता महज सत्ता पाने के लिये नहीं होती, उसका उपयोग या यूँ कहे कि सदुपयोग कर प्रदेश की तकदीर और तस्वीर बदली जा सकती है. उसमें लोगों की तरक्की और खुशहाली के रंग भरे जा सकते हैं. अगर आप मेधावी है, तो सरकार के खर्चें पर उच्च शिक्षा प्राप्त करना, रिसर्च करना, विदेश अध्ययन जाना सिर्फ मध्यप्रदेश में संभव है. आज अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, सबको दवाई, पढ़ाई, रोजगार, सिर पर छत आज अगर उनकी प्राथमिकता है, तो यह गैर वाजिब नहीं है. केन्द्र की योजनाओं पर तत्परता से अमल और मानिटरिंग, उन्हें और अधिक स्वीकार्य बनाते हैं. इस सबके बीच उन्होंने अपनी सरल, सहज व्यक्तित्व की जो अजातशत्रु यू.एस.पी. बनाई है, वह भी उन्हें विशिष्ट बनाती है.


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