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संकट में हिमालय!

2018/02/15



हमारे पुरखे पर्यावरण प्रबंधन के क्षेत्र में दूरद्रष्टा रहे हैं. हमारे यहां प्राचीन ग्रन्थों में प्राकृतिक संसाधनों को ईश्वर का दर्जा दिया गया है. पर्वतों को भगवान की हड्डियां, नदियों को धमनियां और वृक्षों को रोम बताया गया है. भगवान के विराट स्वरूप में पाताल से अंतरिक्ष तक में मौजूद समस्त प्राकृतिक संसाधनों के दर्शन होते हैं. हिमालय को भारत का मस्तक माना जाता है. पुराणों में हिमालय से जुड़ी अनेक कथाएं हैं. हिमालय को जीवमान इकाई माना जाता है. इसे भगवान शंकर का निवास भी कहा गया है. पुराणों में हिमालय संवाद भी करता है. सदियों पूर्व से हमारे पुरखे इस बात को बखूबी जानते थे कि हिमालय भारत के पर्यावरण का एक अहम केन्द्र रहेगा- इसलिए उन्होंने इस स्थान को ईश्वर का रूप निरूपित किया था. हिमालय में बड़े-बड़े धार्मिक केन्द्र स्थापित किए गए. इन सबके पीछे आशय यही था कि हिमालय का संरक्षण और संवर्धन होता रहे. लेकिन पांच साल पूर्व हुई केदारनाथ त्रासदी ने देश और दुनिया में पर्यावरण की चिंता करने वालों को हिलाकर रख दिया था, जहां बड़े पैमाने पर बाढ़ से जान और माल की हानि हुई थी. अब हिमालय के बारे में आई ताजा रिपोर्ट भी चौंकाने वाली है. भारत सरकार के नीति आयोग के विज्ञान और तकनीकी विभाग ने एक रिपोर्ट में कहा है कि हिमालय से निकलने वाली 60 प्रतिशत जलधाराएं सूखने की कगार पर हैं. इसमें गंगा और ब्रम्हपुत्र जैसी बड़ी नदियों की जलधाराएं भी शामिल हैं. चिंताजनक बात यह है कि इन जलधाराओं में केवल बरसात के मौसम में ही पानी आता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से करीब 50 लाख जलधाराएं निकलती हैं. इसमें से करीब 30 लाख तो भारतीय हिमालय क्षेत्र से ही आती हैं. जलवायु परिवर्तन की वजह से घटते ग्लेशियर, पानी की बढ़ती मांग, पेड़ काटने की वजह से जमीन में होने वाले बदलाव आदि से ये जलधाराएं सिकुड़ती जा रही हैं. वैसे हिमालय संकट में आएगा तो पूरे भारत पर ही असर पड़ेगा, लेकिन भारत के 12 राज्यों के 5 करोड़ से ज्यादा लोग एकदम सीधे तौर पर इससे प्रभावित होंगे. यहां के लोगों को पीने के पानी से लेकर रोजमर्रा की जरूरत का पानी यहीं से मिलता है. यदि तुरन्त कदम नहीं उठाए गए तो अगले दस सालों में यहां स्थिति काफी खराब हो जाएगी. हिमालय संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है. गंगा एक्शन प्लान से अभी कुछ हाथ नहीं लग रहा है. अब हिमालय प्लान में ऐसी कुछ योजनाएं बनें जिससे इस देव पर्वतमाला का संरक्षण जमीन पर क्रियान्वित होता दिखना चाहिए. हिमालय में पर्यटन पर इस तरह निगरानी रखी जानी चाहिए कि वह पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करे. हिमालय संरक्षण भारत की व्यवस्था, समाज और विषय विशेष हों, की चिंता का प्रमुख एजेन्डा बनना चाहिए.


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