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शादी और मौत भी अधिकार

2018/03/10



भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 9 और 10 मार्च को उसके फैसले या राय व्यक्त करने में भारत के नागरिकों के संवैधानिक मौलिक अधिकारों में दो और नये मौखिक अधिकार (1) वयस्क आयु में अपनी मर्जी से शादी करने का अधिकार और (2) दारुण शारीरिक कष्टï में सम्मानजनक अति पीड़ा रहित मौत का अधिकार भी संविधान के मूलभूत अधिकारों में शामिल किया जाए.शादी का मामला केरल राज्य की हिन्दू लडक़ी अखिला अशोकन ने स्वेच्छा से हिन्दू धर्म त्याग इस्लाम कुबूल कर शैफीन नामक एक मुसलिम युवक से दिसम्बर 2016 में शादी की थी. इस शादी को अखिला के पिता के.एम. अशोकन ने लव जिहाद का मामला बताते हुए केरल हाईकोर्ट में मामला दायर कर यह कहा कि उसकी लडक़ी का ब्रेनवाश कर जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया है और वह इस्लामी स्टेट के चंगुल में फंसकर आतंकी बना कर सीरिया भेजी जा रही है. केरल हाईकोर्ट ने भी यह पाया कि अखिला उर्फ हदिया अच्छा-बुरा समझने की हालत में नहीं है. ऐसे में उसका शादी का निर्णय कैसे सही हो सकता है. वह सीरिया जाकर भेड़ पालने की बात कहती रही. केरल हाईकोर्ट ने इन्हीं आधारों पर उसका शैफीन से निकाह रद्द कर दिया. लेकिन शादी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हदिया हर जगह हर समय यही कहती रही कि उसने स्वेच्छा से इस्लाम कुबूल किया है और वह शैफीन के साथ ही रहना चाहती है. इस मामले में हदिया ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए उनकी शादी को 287 दिन के कानूनी संघर्ष के बाद बहाल कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हदिया ने माना कि उसने मर्जी से इस्लाम कबूला और शैफीन से शादी की है. हाईकोर्ट को असीम शक्तियां प्राप्त हैं पर वह शादी रद्द करने के लिये नहीं है. उसे संविधान की रक्षा करनी है. यह वयस्कों का मूलभूत अधिकार है. इस मामले में एन.आई.ए. (नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी) को कुछ संदेहास्पद लग रहा है. वह अपनी जांच जारी रखे और यदि उसकी जांच में कुछ आपत्तिजनक आता है तो वह शैफीन को गिरफ्तार भी कर सकती है. स्वेच्छा से मरने के अधिकार पर एक स्वयंसेवी संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन लगाई है कि जैसे लोगों को जीने का मूलभूत अधिकार है उसी तरह उसे मरने का भी मूलभूत अधिकार होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने माना कि ऐसा अधिकार होना चाहिए और मामला सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ को निर्णय के लिये सौंप दिया. कुछ लोग ऐसे रोगों में फंस जाते हैं जिसमें असहनीय पीड़ा होती है और वे असाध्य न ठीक होने वाले रोग होते हैं. ऐसे में उसे बड़ी असहनीय पीड़ा में जिंदा लाश की तरह जीना पड़ता है. इस पर एक अरसे से सामाजिक स्तर पर बहस चल रही है. पश्चिमी देशों में कुछ लोग ऐसे व्यक्ति को जान से मार देते हैं और उसे ‘मर्सी किलिंग’ दया भाव से मृत्यु देना कहते हैं. लेकिन ऐसी मौत में स्वेच्छा से मरने का अधिकार यदि दिया भी जाए तो वह पीडि़त व्यक्ति को ही होना चाहिए. इसमें मर्सी (दया भाव) किलिंग का साथ न किया जाए. फिल्म अभिनेता आमिर खान ने कुछ दिनों पहले ‘सत्यमेव जयते’ टाइटिल से एक सीरियल चलाया था. इसमें बताया गया था कि तमिलनाडु में कई आदिवासी पिछड़े वर्ग में ऐसे मृतप्राय व्यक्ति को लोग सामाजिक मान्यता के साथ मार डालते हैं इसे हर तरह से रोका जाना चाहिए, चाहे ऐसे मृतप्राय व्यक्तियों के विशेष आश्रम या अस्पताल में वार्ड बनाने पड़ें.


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