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रोजगार का संक्रमण काल

2017/04/22



` श्री डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्टï्रपति बनते ही न सिर्फ अमेरिका बल्कि अन्य कई देशों में रोजगार के मामले में नीतियों में व्यापक परिवर्तन हुए. अभी तक यह स्थिति रही कि अमेरिका, यूरोप के देशों आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि विकसित देशों में पिछड़े या विकासशील देशों से लोग रोजगार की तलाश में जाते थे और उन्हें जो भी नौकरी वहां उपयुक्त लगी उसे करने लगते. इनमें उच्च शिक्षित टेक्नोक्रेट से लेकर साफ सफाई का काम करने की छोटी-छोटी नौकरियों में भी प्रवासी मजदूर होते थे. पेट्रोलियम की वजह से धनाढ्य हो गये. अरब के खाड़ी देशों में तो भारत व बंगला देश जैसे पिछड़े या गरीब देशों से घरेलू नौकर के रूप में ी-पुरुष दोनों जाते थे. वहां उनके पासपोर्ट उनके मालिक रख लेते थे और गुलामों की तरह काम लिया जाता था. जो वेतन बताकर वहां दलाल ले जाते थे उतना वेतन नहीं दिया जाता था. वे वहां फंस जाते थे और उनको वहां से बचाना- निकालने का मुश्किल काम करना पड़ता था. रोजगार दिलाने के नाम पर कुछ लोगों ने इसे ही उनका दलाली का रोजगार बना लिया था. अमेरिका में अभी तक सभी प्रकार के लोग रोजगार करने जाते थे. अब श्री ट्रम्प ने वहां के उद्योग-व्यापार जगत से कहा है कि 'हायर अमेरिकनÓ केवेल अमेरिकी लोगों को ही नौकरी दे और अमेरिकी जनता से कहा है 'बाई अमेरिकनÓ अमेरिकी माल ही खरीदो. अभी तक अमेरिकी पूंजीवादी व्यवस्था का इतना व्यापक विकास हो गया है कि उसका पूरा उद्योग बहुराष्टï्रीय (मुल्टीनेशनल) और दूसरों से माल बनवाना (आउट सोर्सिंग) हो गया. वह अपनी वस्तुओं के लायसेंस देकर उन्हें उनके नाम- ब्रेन्ड लीज पर दे देते थे और रायल्टी व कान्टेक्ट प्राफिट शेयरिंग करते रहे. अमेरिका ने ही दुनिया में यह नीति प्रतिपादित की दुनिया में मुक्त व्यापार हो, कोई भी देश उसे प्रतिबंधित न करे. इसी के परिणाम स्वरूप आज दुनिया ने 'डब्ल्यू.टी.ए.Ó (वल्र्ड ट्रेड एग्रीमेंट) मान लिया है. अब विडम्बना यह है कि वहीं अमेरिका यह कह रहा है 'हायर-अमेरिकन और बाई अमेरिकनÓ. अमेरिका में कल कारखानों के नाम पर वहां केवल दफ्तर होते हैं जो आउटसोर्सिंग से माल बनवाते और दूसरों से ही मार्केटिंग भी कराते हैं और उनका काम केवल'नोट गिननाÓ भर होता है. भारत में भी कई उत्पादों के रेपर पर यह छापा जाता है कि यह वस्तु कहां किस कारखाने में बनवायी गयी है. अब अमेरिका कि यह नीति है कि वह उन्हीं को रोजगार देगा जिसकी उसे जरूरत होगी. वह उन्हें अपने देश में नहीं आने देगा जो खुद कोई रोजगार ढूंढने वहां जायेंगे. अमेरिकी जनता वहां का निर्मित माल खरीदेगी तो उसके यहां आयात होने वाला माल नहीं बिकेगा और कई देशों के कारखाने बंद हो जायेंगे. आऊट सोर्सिंग बंद होने से भी दूसरे देश के कारखाने पर बंद होने का खतरा पडऩे वाला है. अमेरिकी नीति का संक्रामक असर यह हुआ है कि अब आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व यूरोप के कई देशों ने भी यह कहा कि उनके संस्थान पहले वहीं के लोगों को रोजगार देंगे और उन्हीं विदेशियों को रोजगार के लिये आने दिया जायेगा जिसकी उन देशों को जरूरत होगी. इसका असर भारत पर सबसे ज्यादा पड़ेगा. यहीं से सबसे ज्यादा लोग इन देशों में जा चुके हैं और यह सिलसिला डोनाल्ड ट्रम्प के आने से पहले तक जारी था. अब भारत को अपने यहां नया रोजगार लाना होगा. विदेशी पूंजी आ रही है यह शर्त लगानी होगी कि पूंजी उनकी पर रोजगार भारतीयों को देना होगा. यहां के लोगों को भी अब शिक्षा व ज्ञान प्राप्त करना होगा जिनकी बाहरी देशों को जरूरत होगी. अब वल्र्ड ट्रेड एग्रीमेंट (डब्ल्यूटीए) का देश वल्र्ड की जगह सिर्फ 'अमेरिकाÓ रह गया है और इसका संक्रमण दूसरे देशों में भी फैल गया है. राष्टï्रपति ट्रम्प ने अमेरिका का और पूंजीवाद का रूप ही बदल कर मुल्टीनेशनल से 'नेशनलÓ कर दिया.


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