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बहुत कुछ खोकर भी उम्मीद के सहारे गैस पीडि़त

2017/11/30



33 साल बाद भी नहीं मिली पेंशन भोपाल, 3 दिसंबर 1984 को भोपाल कभी भूल नहीं सकता क्योंकि सदी की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदी में से एक भोपाल गैस त्रासदी इसी दिन हुई थी. इस साल त्रासदी की 33वीं बरसी है. इन 33 वर्षों में आज भी हजारों-लाखों गैस पीडि़त न्याय की उम्मीद में गुजर-बसर कर रहे हैं. इन्हीं गैस पीडि़तों में एक पीडि़त साजिद बानो भी हैं, जिनका लगभग सब कुछ इस त्रासदी ने ले लिया. 25 दिसंबर 1981 को साजिदा के शोहर अशरफ खान (लाला) जो कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में फिटर के रूप में कार्यरत्ï थे, का इंतकाल हो गया. वजह थी अशरफ अपनी ड्ïयूटी पूरी करने के बाद घर जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी फैक्ट्री के मैनेजर ने अशरफ से पूछा इसमें गैस तो नहीं है तो मैनेजर ने पाइप लाइन खाली होने की बात कही, तब इस बात से अंजान अशरफ पाइप लाइन ठीक करने लगे कि पाइप लाइन में गैस है. पाइप लाइन में लगभग 20 लीटर फास्जीन गैस थी. अशरफ गैस के प्रभाव में आ गये और इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई. इस घटना के तीन साल बाद 3 दिसंबर 1984 की भीषण गैस त्रासदी में साजिदा बानो ने अपने बड़े बेटे मो. अरशद खान उम्र मात्र साढ़े चार वर्ष थी, को खो दिया. उसकी भी मृत्यु हो गई. इनका छोटा बेटा मो. शोएब खान को गैस लगने की वजह से मानसिक बीमारी हो गई, जिससे वह आज भी पीडि़त है साथ ही खुद साजिदा बानो सांस की बीमारी से ग्रसित हो गईं. इसके बाद 1986 में साजिदा को महिला पॉलीटेक्निक में अनुकम्पा नियुक्ति मिली, उनके स्थानांतरण भी हुये और प्रमोशन भी और अक्टूबर 2016 में साजिद रिटायर हो गईं. आज रिटायरमेंट के 13 महीने बाद भी साजिदा को न तो जीपीएफ न ही पेंशन और न ही रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला कोई फंड मिला है. साजिद दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं.और तो और सांस की बेजा तकलीफ एवं बीमार बच्चे की वजह से अस्पतालों में भटकने को मजबूर हैं. साजिदा बी को एमएचआरसी जैसे गैस राहत के अस्पतालों में ठीक से इलाज नहीं मिल पा रहा है. यह बात सिर्फ साजिदा बानो की है, ऐसे हजारों गैस पीडि़त हैं जिनकी तकलीफों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. ये गैस पीडि़त अपने अंदर उम्मीद का दीया जलाये जिन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं कि कभी तो गैस पीडि़तों के साथ न्याय किया जायेगा.


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