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पाक की चिंताएं बढ़ी, श्रीलंका ने कर्ज ना पटा पाने के कारण चीन को दिया हंबनटोटा बंदरगाह पेइचिंग, इस महीने की शुरुआत में श्रीलंका ने कर्ज न चुका पाने की वजह से आधिकारिक तौर पर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हंबनटोटा पोर्ट चीन को 99 साल की लीज पर सौंप दिया. अब पाकिस्तान में भी चिंताएं बढ़ गई हैं कि कहीं उसके ग्वादर पोर्ट का भी यही हश्र न हो, जिसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत बनाया जा रहा है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के एक लेख के मुताबिक, पाकिस्तान में अलग-अलग प्रॉजेक्ट्स पर चीन 55 अरब डॉलर यानी 3520 अरब रुपये खर्च कर रहा है. हालांकि, अभी तक इस प्रॉजेक्ट से जुड़े समझौते की शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन एक्सपट्र्स का दावा है कि इसका राशि बड़ा हिस्सा कर्ज के तौर पर है. इससे ठीक श्रीलंका जैसी स्थिति पैदा हो सकती है और ऐसी आशंका है कि आखिरकार पाकिस्तान को अपने ग्वादर पोर्ट सहित अन्य संपत्तियां चीन को सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.ये आशंकाएं निराधार नहीं हैं. हाल ही में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सातवीं संयुक्त बैठक में इसका संकेत भी मिला है. दूसरा, चीन ने ग्वादर सिटी में अपनी करंसी यानी युआन का इस्तेमाल करने की मांग रखी, जिसे पाकिस्तान ने खारिज कर दिया. समझौते को लेकर ऐसा भी कहा जा रहा है कि चीन पाकिस्तान को अपना आर्थिक उपनिवेश बना रहा है. इन मांगों के खारिज होने के बाद चीन ने भी ऐसे कदम उठाए जो पाकिस्तान को रास नहीं आ रहे. नवंबर में हुई संयुक्त बैठक के कुछ दिन बाद ही चीन ने उत्तरी और पश्चिमी पाकिस्तान में बन रहे तीन महत्वपूर्ण हाइवे के निर्माण के लिए फंडिंग रोक दी. चीन के इन कदमों को फायदा उठाने की रणनीति के तौर पर देखा गया. ग्वादर पोर्ट के समझौते को देखें तो पता लगता है कि अगले 40 सालों तक चीन की कंपनी को इसके राजस्व का 91 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा और ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी के पास सिर्फ 9 प्रतिशत हिस्सा रह जाएगा. इसके अलावा यह 40 साल का बीओटी (बिल्ड ऑपरेट ट्रांसफर) अग्रीमेंट है, जो तकनीकी रूप पर लीज से अलग है. इससे यह स्पष्ट है कि अगले 40 साल तक ग्वादर पोर्ट पर पाकिस्तान का कब्जा नहीं हो सकता है. पाकिस्तानी अधिकारी फिलहाल चीन की कुछ मांगों को भले ही खारिज कर रहे हों लेकिन जैसे-जैसे समय बीतेगा और पाकिस्तान पर चीन का कर्ज बढ़ेगा, स्थिति में भी बदलाव आ जाएगा. पाकिस्तान फिलहाल 82 अरब डॉलर के विदेशी कर्जे में डूबा हुआ है और चीन का लोन इसे बढ़ाएगा. यह भी संभव है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान के पास ग्वादर पोर्ट जैसी अपनी महत्वपूर्ण संपत्तियां चीन को सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. हालांकि, पाकिस्तानी सरकार इन आशंकाओं को खारिज करती आई है. पाक ने ठुकराई कर्ज की पेशकश, खुद बनाएगा बांध सीपीईसी चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल का अहम हिस्सा है. अव्वल, पाकिस्तान ने अपने दियामेर-बाशा बांध के लिए 14 अरब डॉलर की चीनी मदद की पेशकश को ठुकरा दिया. इतना ही नहीं इस्लामाबाद ने चीन से इस बांध को सीपीईसी परियोजना से बाहर रखने और इसे पूरी तरह पाकिस्तान को बनाने देने के लिए भी कहा. खबरों के मुताबिक चीन की सख्त शर्तों की वजह से पाकिस्तान ने यह बांध खुद बनाने का फैसला लिया है. खबर की माने तो चीन ने इस बांध का मालिकाना हक मांगा था."/> पाक की चिंताएं बढ़ी, श्रीलंका ने कर्ज ना पटा पाने के कारण चीन को दिया हंबनटोटा बंदरगाह पेइचिंग, इस महीने की शुरुआत में श्रीलंका ने कर्ज न चुका पाने की वजह से आधिकारिक तौर पर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हंबनटोटा पोर्ट चीन को 99 साल की लीज पर सौंप दिया. अब पाकिस्तान में भी चिंताएं बढ़ गई हैं कि कहीं उसके ग्वादर पोर्ट का भी यही हश्र न हो, जिसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत बनाया जा रहा है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के एक लेख के मुताबिक, पाकिस्तान में अलग-अलग प्रॉजेक्ट्स पर चीन 55 अरब डॉलर यानी 3520 अरब रुपये खर्च कर रहा है. हालांकि, अभी तक इस प्रॉजेक्ट से जुड़े समझौते की शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन एक्सपट्र्स का दावा है कि इसका राशि बड़ा हिस्सा कर्ज के तौर पर है. इससे ठीक श्रीलंका जैसी स्थिति पैदा हो सकती है और ऐसी आशंका है कि आखिरकार पाकिस्तान को अपने ग्वादर पोर्ट सहित अन्य संपत्तियां चीन को सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.ये आशंकाएं निराधार नहीं हैं. हाल ही में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सातवीं संयुक्त बैठक में इसका संकेत भी मिला है. दूसरा, चीन ने ग्वादर सिटी में अपनी करंसी यानी युआन का इस्तेमाल करने की मांग रखी, जिसे पाकिस्तान ने खारिज कर दिया. समझौते को लेकर ऐसा भी कहा जा रहा है कि चीन पाकिस्तान को अपना आर्थिक उपनिवेश बना रहा है. इन मांगों के खारिज होने के बाद चीन ने भी ऐसे कदम उठाए जो पाकिस्तान को रास नहीं आ रहे. नवंबर में हुई संयुक्त बैठक के कुछ दिन बाद ही चीन ने उत्तरी और पश्चिमी पाकिस्तान में बन रहे तीन महत्वपूर्ण हाइवे के निर्माण के लिए फंडिंग रोक दी. चीन के इन कदमों को फायदा उठाने की रणनीति के तौर पर देखा गया. ग्वादर पोर्ट के समझौते को देखें तो पता लगता है कि अगले 40 सालों तक चीन की कंपनी को इसके राजस्व का 91 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा और ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी के पास सिर्फ 9 प्रतिशत हिस्सा रह जाएगा. इसके अलावा यह 40 साल का बीओटी (बिल्ड ऑपरेट ट्रांसफर) अग्रीमेंट है, जो तकनीकी रूप पर लीज से अलग है. इससे यह स्पष्ट है कि अगले 40 साल तक ग्वादर पोर्ट पर पाकिस्तान का कब्जा नहीं हो सकता है. पाकिस्तानी अधिकारी फिलहाल चीन की कुछ मांगों को भले ही खारिज कर रहे हों लेकिन जैसे-जैसे समय बीतेगा और पाकिस्तान पर चीन का कर्ज बढ़ेगा, स्थिति में भी बदलाव आ जाएगा. पाकिस्तान फिलहाल 82 अरब डॉलर के विदेशी कर्जे में डूबा हुआ है और चीन का लोन इसे बढ़ाएगा. यह भी संभव है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान के पास ग्वादर पोर्ट जैसी अपनी महत्वपूर्ण संपत्तियां चीन को सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. हालांकि, पाकिस्तानी सरकार इन आशंकाओं को खारिज करती आई है. पाक ने ठुकराई कर्ज की पेशकश, खुद बनाएगा बांध सीपीईसी चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल का अहम हिस्सा है. अव्वल, पाकिस्तान ने अपने दियामेर-बाशा बांध के लिए 14 अरब डॉलर की चीनी मदद की पेशकश को ठुकरा दिया. इतना ही नहीं इस्लामाबाद ने चीन से इस बांध को सीपीईसी परियोजना से बाहर रखने और इसे पूरी तरह पाकिस्तान को बनाने देने के लिए भी कहा. खबरों के मुताबिक चीन की सख्त शर्तों की वजह से पाकिस्तान ने यह बांध खुद बनाने का फैसला लिया है. खबर की माने तो चीन ने इस बांध का मालिकाना हक मांगा था."/> पाक की चिंताएं बढ़ी, श्रीलंका ने कर्ज ना पटा पाने के कारण चीन को दिया हंबनटोटा बंदरगाह पेइचिंग, इस महीने की शुरुआत में श्रीलंका ने कर्ज न चुका पाने की वजह से आधिकारिक तौर पर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हंबनटोटा पोर्ट चीन को 99 साल की लीज पर सौंप दिया. अब पाकिस्तान में भी चिंताएं बढ़ गई हैं कि कहीं उसके ग्वादर पोर्ट का भी यही हश्र न हो, जिसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत बनाया जा रहा है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के एक लेख के मुताबिक, पाकिस्तान में अलग-अलग प्रॉजेक्ट्स पर चीन 55 अरब डॉलर यानी 3520 अरब रुपये खर्च कर रहा है. हालांकि, अभी तक इस प्रॉजेक्ट से जुड़े समझौते की शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन एक्सपट्र्स का दावा है कि इसका राशि बड़ा हिस्सा कर्ज के तौर पर है. इससे ठीक श्रीलंका जैसी स्थिति पैदा हो सकती है और ऐसी आशंका है कि आखिरकार पाकिस्तान को अपने ग्वादर पोर्ट सहित अन्य संपत्तियां चीन को सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.ये आशंकाएं निराधार नहीं हैं. हाल ही में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सातवीं संयुक्त बैठक में इसका संकेत भी मिला है. दूसरा, चीन ने ग्वादर सिटी में अपनी करंसी यानी युआन का इस्तेमाल करने की मांग रखी, जिसे पाकिस्तान ने खारिज कर दिया. समझौते को लेकर ऐसा भी कहा जा रहा है कि चीन पाकिस्तान को अपना आर्थिक उपनिवेश बना रहा है. इन मांगों के खारिज होने के बाद चीन ने भी ऐसे कदम उठाए जो पाकिस्तान को रास नहीं आ रहे. नवंबर में हुई संयुक्त बैठक के कुछ दिन बाद ही चीन ने उत्तरी और पश्चिमी पाकिस्तान में बन रहे तीन महत्वपूर्ण हाइवे के निर्माण के लिए फंडिंग रोक दी. चीन के इन कदमों को फायदा उठाने की रणनीति के तौर पर देखा गया. ग्वादर पोर्ट के समझौते को देखें तो पता लगता है कि अगले 40 सालों तक चीन की कंपनी को इसके राजस्व का 91 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा और ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी के पास सिर्फ 9 प्रतिशत हिस्सा रह जाएगा. इसके अलावा यह 40 साल का बीओटी (बिल्ड ऑपरेट ट्रांसफर) अग्रीमेंट है, जो तकनीकी रूप पर लीज से अलग है. इससे यह स्पष्ट है कि अगले 40 साल तक ग्वादर पोर्ट पर पाकिस्तान का कब्जा नहीं हो सकता है. पाकिस्तानी अधिकारी फिलहाल चीन की कुछ मांगों को भले ही खारिज कर रहे हों लेकिन जैसे-जैसे समय बीतेगा और पाकिस्तान पर चीन का कर्ज बढ़ेगा, स्थिति में भी बदलाव आ जाएगा. पाकिस्तान फिलहाल 82 अरब डॉलर के विदेशी कर्जे में डूबा हुआ है और चीन का लोन इसे बढ़ाएगा. यह भी संभव है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान के पास ग्वादर पोर्ट जैसी अपनी महत्वपूर्ण संपत्तियां चीन को सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. हालांकि, पाकिस्तानी सरकार इन आशंकाओं को खारिज करती आई है. पाक ने ठुकराई कर्ज की पेशकश, खुद बनाएगा बांध सीपीईसी चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल का अहम हिस्सा है. अव्वल, पाकिस्तान ने अपने दियामेर-बाशा बांध के लिए 14 अरब डॉलर की चीनी मदद की पेशकश को ठुकरा दिया. इतना ही नहीं इस्लामाबाद ने चीन से इस बांध को सीपीईसी परियोजना से बाहर रखने और इसे पूरी तरह पाकिस्तान को बनाने देने के लिए भी कहा. खबरों के मुताबिक चीन की सख्त शर्तों की वजह से पाकिस्तान ने यह बांध खुद बनाने का फैसला लिया है. खबर की माने तो चीन ने इस बांध का मालिकाना हक मांगा था.">

क्या ग्वादर बनेगा दूसरा हंबनटोटा?

2017/12/30



पाक की चिंताएं बढ़ी, श्रीलंका ने कर्ज ना पटा पाने के कारण चीन को दिया हंबनटोटा बंदरगाह

  • सीपीईसी पर 55 अरब डॉलर खर्च कर रहा चीन,
  • समझौते की शर्ते नहीं हुई सार्वजनिक
पेइचिंग, इस महीने की शुरुआत में श्रीलंका ने कर्ज न चुका पाने की वजह से आधिकारिक तौर पर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हंबनटोटा पोर्ट चीन को 99 साल की लीज पर सौंप दिया. अब पाकिस्तान में भी चिंताएं बढ़ गई हैं कि कहीं उसके ग्वादर पोर्ट का भी यही हश्र न हो, जिसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत बनाया जा रहा है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के एक लेख के मुताबिक, पाकिस्तान में अलग-अलग प्रॉजेक्ट्स पर चीन 55 अरब डॉलर यानी 3520 अरब रुपये खर्च कर रहा है. हालांकि, अभी तक इस प्रॉजेक्ट से जुड़े समझौते की शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन एक्सपट्र्स का दावा है कि इसका राशि बड़ा हिस्सा कर्ज के तौर पर है. इससे ठीक श्रीलंका जैसी स्थिति पैदा हो सकती है और ऐसी आशंका है कि आखिरकार पाकिस्तान को अपने ग्वादर पोर्ट सहित अन्य संपत्तियां चीन को सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.ये आशंकाएं निराधार नहीं हैं. हाल ही में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सातवीं संयुक्त बैठक में इसका संकेत भी मिला है. दूसरा, चीन ने ग्वादर सिटी में अपनी करंसी यानी युआन का इस्तेमाल करने की मांग रखी, जिसे पाकिस्तान ने खारिज कर दिया. समझौते को लेकर ऐसा भी कहा जा रहा है कि चीन पाकिस्तान को अपना आर्थिक उपनिवेश बना रहा है. इन मांगों के खारिज होने के बाद चीन ने भी ऐसे कदम उठाए जो पाकिस्तान को रास नहीं आ रहे. नवंबर में हुई संयुक्त बैठक के कुछ दिन बाद ही चीन ने उत्तरी और पश्चिमी पाकिस्तान में बन रहे तीन महत्वपूर्ण हाइवे के निर्माण के लिए फंडिंग रोक दी. चीन के इन कदमों को फायदा उठाने की रणनीति के तौर पर देखा गया. ग्वादर पोर्ट के समझौते को देखें तो पता लगता है कि अगले 40 सालों तक चीन की कंपनी को इसके राजस्व का 91 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा और ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी के पास सिर्फ 9 प्रतिशत हिस्सा रह जाएगा. इसके अलावा यह 40 साल का बीओटी (बिल्ड ऑपरेट ट्रांसफर) अग्रीमेंट है, जो तकनीकी रूप पर लीज से अलग है. इससे यह स्पष्ट है कि अगले 40 साल तक ग्वादर पोर्ट पर पाकिस्तान का कब्जा नहीं हो सकता है. पाकिस्तानी अधिकारी फिलहाल चीन की कुछ मांगों को भले ही खारिज कर रहे हों लेकिन जैसे-जैसे समय बीतेगा और पाकिस्तान पर चीन का कर्ज बढ़ेगा, स्थिति में भी बदलाव आ जाएगा. पाकिस्तान फिलहाल 82 अरब डॉलर के विदेशी कर्जे में डूबा हुआ है और चीन का लोन इसे बढ़ाएगा. यह भी संभव है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान के पास ग्वादर पोर्ट जैसी अपनी महत्वपूर्ण संपत्तियां चीन को सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. हालांकि, पाकिस्तानी सरकार इन आशंकाओं को खारिज करती आई है. पाक ने ठुकराई कर्ज की पेशकश, खुद बनाएगा बांध सीपीईसी चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल का अहम हिस्सा है. अव्वल, पाकिस्तान ने अपने दियामेर-बाशा बांध के लिए 14 अरब डॉलर की चीनी मदद की पेशकश को ठुकरा दिया. इतना ही नहीं इस्लामाबाद ने चीन से इस बांध को सीपीईसी परियोजना से बाहर रखने और इसे पूरी तरह पाकिस्तान को बनाने देने के लिए भी कहा. खबरों के मुताबिक चीन की सख्त शर्तों की वजह से पाकिस्तान ने यह बांध खुद बनाने का फैसला लिया है. खबर की माने तो चीन ने इस बांध का मालिकाना हक मांगा था.


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