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आफत में अन्नदाता

2018/02/13



कभी अल्प वर्षा तो कभी अतिवृष्टि के संकटों से जूझ रहे किसानों पर एक बार फिर कहर टूटा है. बीते रोज प्रदेश भर में हुई बारिश एवं ओलावृष्टि ने किसानों को मुसीबत में डाल दिया है. बेमौसम की बारिश एवं ओले गिरने से कई जगह खेतों में खड़ी चना-मसूर एवं तेवड़ा की फसलें तबाह हो गई हैं. यदि कुछ दिनों पूर्व यह मावठा आता तो फसलों के लिये फायदेमंद होता. लेकिन लगता है कि इंद्रदेवता अन्नदाता से रूठे हुए हैं. फसल का तो नुकसान हुआ ही है, मवेशियों की मौत हुई है, सो अलग. भिंड, ग्वालियर, दमोह आदि स्थानों पर आकाशीय बिजली गिरने से जनहानि भी हुई है. आसमान से बरसी इस आफत ने किसानों की मेहनत और उम्मीदों पर पानी फेरा है. हालांकि भोपाल में आयोजित किसान महासम्मेलन में किसानों के हितार्थ सरकार के संकल्प दोहराए गए हैं एवं कई नई घोषणाएं भी की गई हैं. लेकिन इस ताजा संकट से उबरने के लिये किसानों ने सरकार से जो उम्मीदें लगा रखी हैं, उन्हें हर कीमत पर पूरा किया जाना चाहिए. पहली आवश्यकता इस बात की है कि किसानों के बीच जाने वाले सरकारी सर्वेक्षण दल बारिश एवं ओलावृष्टि से हुए नुकसान का आंकलन खेत के आधार पर नहीं बल्कि बर्बाद हुई कुल फसल के आधार पर करें. अभी तक होता यह है कि खेत के आधार पर नुकसान का एसेसमेंट कर दिया जाता है. नतीजा यह होता है कि यदि खेत में महंगी फसल बर्बाद हुई है तब भी किसानों को वाजिब और पर्याप्त मुआवजा हासिल नहीं हो पाता. प्रदेश में किसानों को 16 रुपये और 32 रुपये तक का मुआवजा दिये जाने की खबरें आती रही हैं. किसानों को सिर्फ सतही मुआवजा ही मिलता है, यह अन्नदाता का अपमान है. संबंधित तहसीलदार एवं पटवारियों को अविलंब प्रभावित फसलों का मुआयना कर संभावित हानि का आंकलन कर मुआवजा दिया जाना चाहिए.


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