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   नवभारत न्यूज खंडवा, अंचल का प्रमुख आदिवासी लोकपर्व भगोरिया इस वर्ष 22 फ रवरी से आरंभ होकर 2 मार्च तक चलेगा।वर्ष में एक बार मनाए जाने वाले इस पर्व के कारण हफ्तेभर तक क्षेत्र में उल्लास छाया रहता है। पर्व मनाने के लिए पलायन स्थलों से भी ग्रामीण आदिवासी बड़ी संख्या में अपने गांव लौटेंगे। जिले के गुड़ी, भीलखेड़ी, पंधाना, बड़ा बोरगांव, खालवा, खारकला, सिंगोट, दिवाल, डोंगरगांव, बड़ोदाअहीर गांव में शुरुआत हो चुकी है। समाजसेवी सुनील जैन बताया कि इस दिन का आदिवासी संस्कृति से जुड़े प्रेमी बेसब्री से इंतजार करते है,वह पर्व अब निकट आ चुका है और इसकी शुरुआत आज से भीलखेड़ी से शुरू हो चुकी है। भगोरिया की धूम आरंभ हो होते ही आदिवासियों में अपने संस्कृति के प्रति इतना प्रेम होता है कि इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। इसमें मस्ती व उल्लास होता है। आदिवासी संस्कृति की झलक भी नजर आती है। पेट की आग बुझाने के लिए क्षेत्र की 60 प्रतिशत जनता पलायन करती है। रोजगार की तलाश में दूर.दूर तक जाने वाले ग्रामीण जहां कहीं भी होंगे,भगोरिया की महक उन्हें अपने गांव लौटने के लिए वापस मजबूर करती है। समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि वार्षिक मेले भगोरिया की प्रमुख विशेषता यह है कि 7 दिनों तक लगातार यह चलता है। हर दिन कहीं न कहीं भगोरिया मेला रहता है। इन मेलों में गांव के गांव उमड़ पड़ते है। छोटे बच्चे से लेकर वृद्घ तक अनिवार्य रूप से इसमें सहभागिता करते है। ढोल, मांदल, बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों की मीठी ध्वनि और लोक संगीत के बीच जब सामूहिक नृत्य का दौर भगोरिया मेले में चलता है तो चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखर जाता है। साथ ही होती है झूला.चकरी की मस्ती व पान तथा अन्य व्यंजनों की भरमार। चाहे जितने जीवन में संघर्ष हो लेकिन सब कुछ भूलकर हर ग्रामीण भगोरिया की मस्ती में डूबा दिखाई पड़ता है। धुलेंडी के सात दिन पहले से यह पर्व आरंभ हो जाता है। रियासत काल से ही यह पारंपारिक त्योहार यहां चल रहा है। पर्व को लेकर अलग.अलग इतिहास भी बताए जाते है। कुछ इतिहासकार कहते है कि ग्राम भगोर से यह पर्व आरंभ हुआ, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया। कुछ लोगों का मानना है कि होली के पूर्व लगने वाले हाटों को गुलालिया हाट कहा जाता था। इसमें खूब गुलाल उड़ती थी। बाद में होली के पूर्व मनाए जाने वाले इन साप्ताहिक हाटों को भगोरिया कहा जाने लगा। मान्यता चाहे जो हो,लेकिन मैदानी हकीकत यह है कि यह वार्षिक पर्व अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा से चारो ओर बिखेर रहा है।"/>    नवभारत न्यूज खंडवा, अंचल का प्रमुख आदिवासी लोकपर्व भगोरिया इस वर्ष 22 फ रवरी से आरंभ होकर 2 मार्च तक चलेगा।वर्ष में एक बार मनाए जाने वाले इस पर्व के कारण हफ्तेभर तक क्षेत्र में उल्लास छाया रहता है। पर्व मनाने के लिए पलायन स्थलों से भी ग्रामीण आदिवासी बड़ी संख्या में अपने गांव लौटेंगे। जिले के गुड़ी, भीलखेड़ी, पंधाना, बड़ा बोरगांव, खालवा, खारकला, सिंगोट, दिवाल, डोंगरगांव, बड़ोदाअहीर गांव में शुरुआत हो चुकी है। समाजसेवी सुनील जैन बताया कि इस दिन का आदिवासी संस्कृति से जुड़े प्रेमी बेसब्री से इंतजार करते है,वह पर्व अब निकट आ चुका है और इसकी शुरुआत आज से भीलखेड़ी से शुरू हो चुकी है। भगोरिया की धूम आरंभ हो होते ही आदिवासियों में अपने संस्कृति के प्रति इतना प्रेम होता है कि इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। इसमें मस्ती व उल्लास होता है। आदिवासी संस्कृति की झलक भी नजर आती है। पेट की आग बुझाने के लिए क्षेत्र की 60 प्रतिशत जनता पलायन करती है। रोजगार की तलाश में दूर.दूर तक जाने वाले ग्रामीण जहां कहीं भी होंगे,भगोरिया की महक उन्हें अपने गांव लौटने के लिए वापस मजबूर करती है। समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि वार्षिक मेले भगोरिया की प्रमुख विशेषता यह है कि 7 दिनों तक लगातार यह चलता है। हर दिन कहीं न कहीं भगोरिया मेला रहता है। इन मेलों में गांव के गांव उमड़ पड़ते है। छोटे बच्चे से लेकर वृद्घ तक अनिवार्य रूप से इसमें सहभागिता करते है। ढोल, मांदल, बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों की मीठी ध्वनि और लोक संगीत के बीच जब सामूहिक नृत्य का दौर भगोरिया मेले में चलता है तो चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखर जाता है। साथ ही होती है झूला.चकरी की मस्ती व पान तथा अन्य व्यंजनों की भरमार। चाहे जितने जीवन में संघर्ष हो लेकिन सब कुछ भूलकर हर ग्रामीण भगोरिया की मस्ती में डूबा दिखाई पड़ता है। धुलेंडी के सात दिन पहले से यह पर्व आरंभ हो जाता है। रियासत काल से ही यह पारंपारिक त्योहार यहां चल रहा है। पर्व को लेकर अलग.अलग इतिहास भी बताए जाते है। कुछ इतिहासकार कहते है कि ग्राम भगोर से यह पर्व आरंभ हुआ, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया। कुछ लोगों का मानना है कि होली के पूर्व लगने वाले हाटों को गुलालिया हाट कहा जाता था। इसमें खूब गुलाल उड़ती थी। बाद में होली के पूर्व मनाए जाने वाले इन साप्ताहिक हाटों को भगोरिया कहा जाने लगा। मान्यता चाहे जो हो,लेकिन मैदानी हकीकत यह है कि यह वार्षिक पर्व अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा से चारो ओर बिखेर रहा है।"/>    नवभारत न्यूज खंडवा, अंचल का प्रमुख आदिवासी लोकपर्व भगोरिया इस वर्ष 22 फ रवरी से आरंभ होकर 2 मार्च तक चलेगा।वर्ष में एक बार मनाए जाने वाले इस पर्व के कारण हफ्तेभर तक क्षेत्र में उल्लास छाया रहता है। पर्व मनाने के लिए पलायन स्थलों से भी ग्रामीण आदिवासी बड़ी संख्या में अपने गांव लौटेंगे। जिले के गुड़ी, भीलखेड़ी, पंधाना, बड़ा बोरगांव, खालवा, खारकला, सिंगोट, दिवाल, डोंगरगांव, बड़ोदाअहीर गांव में शुरुआत हो चुकी है। समाजसेवी सुनील जैन बताया कि इस दिन का आदिवासी संस्कृति से जुड़े प्रेमी बेसब्री से इंतजार करते है,वह पर्व अब निकट आ चुका है और इसकी शुरुआत आज से भीलखेड़ी से शुरू हो चुकी है। भगोरिया की धूम आरंभ हो होते ही आदिवासियों में अपने संस्कृति के प्रति इतना प्रेम होता है कि इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। इसमें मस्ती व उल्लास होता है। आदिवासी संस्कृति की झलक भी नजर आती है। पेट की आग बुझाने के लिए क्षेत्र की 60 प्रतिशत जनता पलायन करती है। रोजगार की तलाश में दूर.दूर तक जाने वाले ग्रामीण जहां कहीं भी होंगे,भगोरिया की महक उन्हें अपने गांव लौटने के लिए वापस मजबूर करती है। समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि वार्षिक मेले भगोरिया की प्रमुख विशेषता यह है कि 7 दिनों तक लगातार यह चलता है। हर दिन कहीं न कहीं भगोरिया मेला रहता है। इन मेलों में गांव के गांव उमड़ पड़ते है। छोटे बच्चे से लेकर वृद्घ तक अनिवार्य रूप से इसमें सहभागिता करते है। ढोल, मांदल, बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों की मीठी ध्वनि और लोक संगीत के बीच जब सामूहिक नृत्य का दौर भगोरिया मेले में चलता है तो चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखर जाता है। साथ ही होती है झूला.चकरी की मस्ती व पान तथा अन्य व्यंजनों की भरमार। चाहे जितने जीवन में संघर्ष हो लेकिन सब कुछ भूलकर हर ग्रामीण भगोरिया की मस्ती में डूबा दिखाई पड़ता है। धुलेंडी के सात दिन पहले से यह पर्व आरंभ हो जाता है। रियासत काल से ही यह पारंपारिक त्योहार यहां चल रहा है। पर्व को लेकर अलग.अलग इतिहास भी बताए जाते है। कुछ इतिहासकार कहते है कि ग्राम भगोर से यह पर्व आरंभ हुआ, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया। कुछ लोगों का मानना है कि होली के पूर्व लगने वाले हाटों को गुलालिया हाट कहा जाता था। इसमें खूब गुलाल उड़ती थी। बाद में होली के पूर्व मनाए जाने वाले इन साप्ताहिक हाटों को भगोरिया कहा जाने लगा। मान्यता चाहे जो हो,लेकिन मैदानी हकीकत यह है कि यह वार्षिक पर्व अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा से चारो ओर बिखेर रहा है।">

आदिवासी लोकपर्व भगोरिया की हाट बाजारों में धूम

2018/02/24



   नवभारत न्यूज खंडवा, अंचल का प्रमुख आदिवासी लोकपर्व भगोरिया इस वर्ष 22 फ रवरी से आरंभ होकर 2 मार्च तक चलेगा।वर्ष में एक बार मनाए जाने वाले इस पर्व के कारण हफ्तेभर तक क्षेत्र में उल्लास छाया रहता है। पर्व मनाने के लिए पलायन स्थलों से भी ग्रामीण आदिवासी बड़ी संख्या में अपने गांव लौटेंगे। जिले के गुड़ी, भीलखेड़ी, पंधाना, बड़ा बोरगांव, खालवा, खारकला, सिंगोट, दिवाल, डोंगरगांव, बड़ोदाअहीर गांव में शुरुआत हो चुकी है। समाजसेवी सुनील जैन बताया कि इस दिन का आदिवासी संस्कृति से जुड़े प्रेमी बेसब्री से इंतजार करते है,वह पर्व अब निकट आ चुका है और इसकी शुरुआत आज से भीलखेड़ी से शुरू हो चुकी है। भगोरिया की धूम आरंभ हो होते ही आदिवासियों में अपने संस्कृति के प्रति इतना प्रेम होता है कि इस त्यौहार को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। इसमें मस्ती व उल्लास होता है। आदिवासी संस्कृति की झलक भी नजर आती है। पेट की आग बुझाने के लिए क्षेत्र की 60 प्रतिशत जनता पलायन करती है। रोजगार की तलाश में दूर.दूर तक जाने वाले ग्रामीण जहां कहीं भी होंगे,भगोरिया की महक उन्हें अपने गांव लौटने के लिए वापस मजबूर करती है। समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि वार्षिक मेले भगोरिया की प्रमुख विशेषता यह है कि 7 दिनों तक लगातार यह चलता है। हर दिन कहीं न कहीं भगोरिया मेला रहता है। इन मेलों में गांव के गांव उमड़ पड़ते है। छोटे बच्चे से लेकर वृद्घ तक अनिवार्य रूप से इसमें सहभागिता करते है। ढोल, मांदल, बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों की मीठी ध्वनि और लोक संगीत के बीच जब सामूहिक नृत्य का दौर भगोरिया मेले में चलता है तो चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखर जाता है। साथ ही होती है झूला.चकरी की मस्ती व पान तथा अन्य व्यंजनों की भरमार। चाहे जितने जीवन में संघर्ष हो लेकिन सब कुछ भूलकर हर ग्रामीण भगोरिया की मस्ती में डूबा दिखाई पड़ता है। धुलेंडी के सात दिन पहले से यह पर्व आरंभ हो जाता है। रियासत काल से ही यह पारंपारिक त्योहार यहां चल रहा है। पर्व को लेकर अलग.अलग इतिहास भी बताए जाते है। कुछ इतिहासकार कहते है कि ग्राम भगोर से यह पर्व आरंभ हुआ, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया। कुछ लोगों का मानना है कि होली के पूर्व लगने वाले हाटों को गुलालिया हाट कहा जाता था। इसमें खूब गुलाल उड़ती थी। बाद में होली के पूर्व मनाए जाने वाले इन साप्ताहिक हाटों को भगोरिया कहा जाने लगा। मान्यता चाहे जो हो,लेकिन मैदानी हकीकत यह है कि यह वार्षिक पर्व अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा से चारो ओर बिखेर रहा है।


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