कोरोना से निपटने तैयार अस्पताल,बस डॉक्टरों की गुटबाजी खत्म हो जाए?


खंडवा: कोरोना की पड़ोसी देश में आहट से जिला और अस्पताल प्रशासन भी सतर्क हो गया है। आम लोगों में भले ही अवेयरनेस नहीं दिख रही हो,लेकिन जिले का प्रशासन हर उस इस स्थिति से निपटने को तैयार है। जो पिछले 2 कोरोना काल में लोगों ने परेशानियां झेली हैं और अपनों को खोया है।मंगलवार को जनसुनवाई के बाद कलेक्टर और प्रशासन के अधिकारी ने कोरोना से संबंधित सारी गतिविधियां परखी। इसमें पेशेंट को घर से लाने अस्पताल के कोरोना वार्ड में भर्ती करने, उसे ऑक्सीजन लगाने,दवाएं देने व प्रिसक्रिप्शन लिखने ताकि रिहर्सल हुई।इसके अलावा कलेक्टर ने दवाइयों की उपलब्धता,ऑक्सीजन प्लांट का संचालन और जांचों संबंधित सभी इंतजाम देखे। डॉक्टर पीपीई किट पहनकर खड़े थे। मरीज बनाकर एक व्यक्ति को लाया गया। जिस पर सारी प्रक्रियाएं वही अपनाई गई, जो कोरोना के मरीज के लिए अपनाई जाती हैं।

कुल मिलाकर यह सब माक ड्रिल के तहत आता है, जिसमें तैयारियों के पूर्व का जायजा लिया जाता है। सब कुछ ठीक-ठाक निकला। हालाकि कोरोना की सेकंड वेव में जिस कोविड वार्ड में मौतों का तांता लगा था। वैसी संभावनाएं अब नजर नहीं आती। ऑक्सीजन की भी भरपूर उपलब्धता बताई गई है। इन सबके बावजूद इतना जरूर है कि इस तैयारी की प्रशंसा लोग कर रहे हैं।हालांकि जिले में अरबों का मेडिकल कालेज भवन और मशीनें होने के साथ करोड़ों के वेतन वाले डॉक्टर हैं। इसके बावजूद यहां खंडवा टू इंदौर रेफर करने का सिलसिला थम नहीं पा रहा है। कलेक्टर को इस संबंध में जरूर देखना चाहिए कि मामूली उपचार भी मेडिकल कालेज होने के बावजूद यहां नहीं हो पाती। डॉक्टरों की राजनीति ही अस्पताल में अव्यवस्थाएं फैला रही हैं?कई डॉक्टर तो सेवानिवृत्त भी यहीं से होना चाहते हैं।

ड्यूटी लगाने से लेकर आर एम ओ तक के मसले पर बिना मतलब हस्तक्षेप आम बात हो गई है। दो तीन डाक्टरों को छोड़कर कोई भी ढंग से काम नहीं कर पा रहा है। प्राइवेट प्रैक्टिस में ज्यादा समय दिया जा रहा है। इतना ही नहीं दवा वाले डिपार्टमेंट को धनगंगा बताया जा रहा है। मरीजों की लंबी कतारें लग रही हैं। ऑपरेशन के लिए मरीज दो महीने इंतजार करते हैं। कई कर्मचारी तो अस्पताल के वार्डों में मरीजों के आसपास एजेंट की तरह घूमते नजर आते हैं। यह अस्पताल भी जिला पंजीयन कार्यालय और आरटीओ वाली शक्ल मुहैया न कर ले। इससे पहले कलेक्टर को सब कुछ जानना जरूरी है। जिला चिकित्सालय सिविल सर्जन कार्यालय और मेडिकल कॉलेज तीनों गुटों में समन्वय भी जरूरी है। खून,पेशाब से लेकर एक्सरे,सोनोग्राफी की जांच तक में मरीजों को जद्दोजहद करना पड़ती है। ऐसे में थोड़ा बहुत पैसा भी जिसके पास होता है। वह बाहर जांच करा लेता है। इन व्यवस्थाओं पर प्रशासन कोरोना की भावी संभावना के पहले सतर्क हो जाए तो शहर और जिले के हित में रहेगा।


नव भारत न्यूज

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