महिलाओं के पास पेशेवर तरीके से फुटबॉल खेलने का विकल्प होना चाहिए : प्रफुल


नयी दिल्ली, (वार्ता) अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के अध्यक्ष प्रफुल पटेल ने मंगलवार को कहा कि भारत बदल गया है और महिलाओं के पास पेशेवर रूप से फुटबॉल खेलने का विकल्प होना चाहिए।
1983 ने क्रिकेट का चेहरा बदल दिया।आने वाले वर्षों में हम देखेंगे कि ऐसा ही फुटबॉल के साथ भी होगा और यह लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए होगा।

पटेल ने यहां मंगलवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में महिलाओं एवं लड़कियों के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने वाले गैर सरकारी संगठन सेक्विन इंडिया की ओर से फुटबॉल के माध्यम से लैंगिक समानता पर आयोजित सम्मेलन में कहा, “ हम में से कई लोगों के लिए यहां 15 साल पहले महिला फुटबॉल कभी न पूरा होने वाला सपना था, लेकिन जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ रही है, हम जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की अधिक भागीदारी देख रहे हैं, इसलिए फुटबॉल बहुत पीछे नहीं रह सकता।”
एआईएफएफ अध्यक्ष ने कहा, “ मैं देख सकता हूं कि हर स्तर पर हर कोई महिलाओं के खेल के प्रति उतना ही जुनूनी महसूस करता है जितना कि पुरुषों के, जो एक अच्छा और स्वस्थ संकेत है।हमने अब एक राष्ट्रीय टीम बनाने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया है और हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि लड़कियां फुटबॉल से अपना करियर बना सकें। ”
सम्मेलन में फुटबॉल के माध्यम से बालिकाओं के सशक्तिकरण पर विचार-विमर्श करने के लिए कई सत्र आयोजित किए गए और चहुंमुखी विकास के लिए एक स्थायी बुनियादी ढांचे के निर्माण की आवश्यकता पर ध्यान दिया गया।
इस दौरान यह भी घोषणा की गई कि फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप भारत में 11 से 30 अक्टूबर 2022 तक आयोजित किया जाएगा।

सम्मेलन में लिंग विशेषज्ञ, खेल विकास विशेषज्ञ, फुटबॉल प्रशासक, खिलाड़ी, कोच, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां, सरकारी अधिकारी और मीडियाकर्मी उपस्थित रहे।मुख्य वक्ताओं में एआईएफएफ के अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल, संयुक्त राष्ट्र महिला में देश की प्रतिनिधि सुसान फर्ग्यूसन, लॉरियस फॉर गुड की एलिना और सेक्विन इंडिया की चेयरपर्सन एवं एआईएफएफ की महिला समिति के चेयरपर्सन सारा पायलट मौजूद रही।

सारा ने इस मौके पर कहा, “ यह बड़े सम्मान और सौभाग्य की बात है कि भारत इस वर्ष महिला अंडर-17 फीफा विश्व कप की मेजबानी करेगा।यह एक टूर्नामेंट से कहीं ज्यादा है।यह उस प्रगति का प्रतीक है जो हमने लैंगिक समानता की दिशा में उठाया है और यह भी याद दिलाता है कि आगे और कितना कुछ किया जाना है।जब हम सब एक साथ आएंगे तब ही हम देश की सभी लड़कियों और महिलाओं के सपने को साकार कर सकते हैं, जिससे वे अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचेंगी।
महिलाओं के प्रति रूढ़िवादिता को तोड़ने के लिए खेल एक बड़ा माध्यम हो सकता है और यह बार-बार साबित हुआ है।


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