खादी ग्रामोद्योग ने की बांस के चारकोल पर ‘निर्यात प्रतिबंध’ हटाने की मांग


नयी दिल्ली, (वार्ता) खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने सरकार से बांस उद्योग में कच्चे बांस का उपयोग बढ़ाने और उसे अधिक लाभप्रद बनाने के लिए बांस के चारकोल पर “निर्यात की रोक” हटाने का अनुरोध किया है।

आयोग का मानना है कि इससे बांस उद्योग के अपशिष्ट का उपयोग बढ़ेगा और इकाइयों को लाभ होगा।इस बारे में आयोग के प्रमुख ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री को पत्र लिखा है।

सूक्षम , लधु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्रालय ने रविवार को एक विज्ञप्ति में कहा, ‘ भारतीय बांस उद्योग के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में एक चुनौती बांस का अपर्याप्त उपयोग है।इसके कारण साधन-सामग्री की लागत बढ़ जाती है।
बांस के चारकोल का निर्यात खुलने से बांस उद्योग के अपशिष्ट का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा और इस तरह बांस के व्यवसाय को अधिक लाभदायक बना देगा।’
केवीआईसी के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना ने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर बांस उद्योग के वृहद लाभ के लिए बांस चारकोल पर निर्यात प्रतिबंध हटाने की मांग की है।

आयोग का कहना है कि अगरबत्ती और बांस शिल्प उद्योगों में उत्पन्न बांस अपशिष्ट का व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप, गोल बांस की छड़ियों के लिए बांस इनपुट लागत 25,000 रुपये से 40,000 रुपये प्रति टन के बीच है, जबकि बांस की औसत लागत 4,000 रुपये से 5,000 रुपये प्रति टन के बीच में है।
इसकी तुलना में, चीन में बांस की कीमत 8,000 रुपये से 10,000 रुपये प्रति टन है, लेकिन 100 प्रतिशत अपशिष्ट उपयोग के कारण उनकी इनपुट लागत 12,000 रुपये से 15,000 रुपये प्रति टन है।

बयान में कहा गया है कि भारत में बांस का उपयोग अधिकांशतः अगरबत्ती के निर्माण में किया जाता है, जिसमें अधिकतम 16 प्रतिशत, अर्थात बांस की ऊपरी परतों का उपयोग बांस की छड़ियों के निर्माण के लिए किया जाता है, जबकि शेष 84 प्रतिशत बांस पूरी तरह से बेकार हो जाता है।

श्री सक्सेना ने कहा कि “बांस का कोयला” बनाकर बांस के अपशिष्ट का सबसे अच्छा उपयोग किया जा सकता है, यद्यपि घरेलू बाजार में इसका बहुत सीमित उपयोग है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी अत्यधिक मांग है।
बहरहाल, भारतीय बांस उद्योग अपनी “निर्यात मनाही” के कारण इस अवसर का लाभ नहीं उठा पा रहा है।

उल्लेखनीय है कि बांस चारकोल की विश्व आयात मांग 1.5 से 2 अरब अमेरिकी डालर के दायरे में है और हाल के वर्षों में छह प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बारबेक्यू के लिए बांस का कोयला लगभग 21,000 रुपये से 25,000 रुपये प्रति टन के हिसाब से बिकता है।इसके अतिरिक्त, इसका उपयोग मिट्टी के पोषण के लिए और सक्रिय चारकोल के निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में भी किया जाता है।अमेरिका, जापान, कोरिया, बेल्जियम, जर्मनी, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों में आयात की बढ़ती मांग नगण्य आयात शुल्क पर रही है।

बांस उत्पादों के लिए निर्यात की नीति में एक संशोधन 2017 में किया गया था, जिसमें बांस उत्पादों के निर्यात को ओजीएल (सामान्य रूप से मुक्त) श्रेणी में रखा गया था और ये उत्पाद निर्यात के लिए “मुक्त” थे, लेकिन इसमें बांस के चारकोल, लुगदी और अनप्रोसेस्ड अंकुर के निर्यात को अभी भी प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया है।

केवीआईसी ने 2019 में, कच्ची अगरबत्ती के आयात और वियतनाम तथा चीन से भारी मात्रा में आयात किए जाने वाले गोल बांस की छड़ियों पर आयात शुल्क में नीतिगत बदलाव के लिए सरकार से अनुरोध किया था।
इसके बाद सितंबर 2019 में वाणिज्य मंत्रालय ने कच्ची अगरबत्ती के आयात पर “प्रतिबंध” लगा दिया और जून 2020 में वित्त मंत्रालय ने गोल बांस की छड़ियों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया।


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