मजबूत संगठन, योजनाएं और कुशल रणनीति से प्रो इनकंबेंसी


विशेष

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अमित शाह की रणनीति मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नीतियां और मजबूत संगठन ने मध्य प्रदेश में इतिहास रचा

लाडली बहना योजना गेम चेंजर साबित हुई, लचर संगठन और गुटबाजी का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा

मिलिंद मुजुमदार

इंदौर : मध्य प्रदेश में भाजपा ने इतिहास रच दिया। लगभग तीन चौथाई बहुमत हासिल करके भाजपा ने दिखाया कि किस तरह से मजबूत संगठन, लोकप्रिय नेतृत्व और कुशल रणनीति के बल पर एंटी इनकंबेंसी को प्रो इनकंबेंसी में बदला जा सकता है। मध्य प्रदेश की भाजपा की बंपर जीत राजनीतिक विश्लेषकों के लिए किसी विस्मय से कम नहीं है। सरकार में रहते हुए पहले की अपेक्षा अधिक मत प्राप्त करना बेहद मुश्किल काम होता है लेकिन भाजपा ने यह कर दिखाया है। निश्चित रूप से इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जनकल्याणकारी योजनाएं और भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के जबरदस्त मतदान केंद्र प्रबंधन को दिया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फरवरी 2023 में बहुचर्चित लाडली बहना योजना लाकर मंजर बदल दिया। उन्होंने इसके पहले नवंबर 2022 में प्रदेश के 89 आदिवासी विकास खंडों में पेसा एक्ट लागू किया था। पेसा एक्ट ने भी गेम चेंजर का काम किया। इस वर्ष जून तक ऐसा लग रहा था कि भाजपा को 100 सीटें भी लाना मुश्किल साबित होगा। पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षण में आधे से ज्यादा मंत्री और लगभग 80 विधायक रेड लाइन पर थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन की मध्य क्षेत्र इकाई का भी यही फीडबैक था कि मंत्रियों और विधायकों के कामकाज से जनता और कार्यकर्ताओं में जबरदस्त असंतोष है। खास तौर पर पार्टी को ज्योतिरादित्य सिंधिया के दल बदल के कारण दिक्कत आ रही थी। क्योंकि इससे भाजपा संगठन का रसायन बदल गया ।

ऐसे में पार्टी के चाणक्य माने जाने वाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मध्य प्रदेश की कमान अपने हाथों में ली। उन्होंने सबसे पहले खंड-खंड में बंटी पार्टी को एकजुट करने के लिए सभी नेताओं को एक जाजम में बिठाया और लगातार बैठकें की। अमित शाह ने भोपाल के भी लगातार दौरे किए और प्रदेश कोर समिति की लगातार बैठकें की। अमित शाह के कारण नेताओं की आपसी खींचतान लगभग समाप्त हुई। इसके बाद उन्होंने संभागवार पार्टी सम्मेलन बुलाकर मतदान केंद्र प्रबंधन पर जोर दिया। नतीजा यह रहा कि अगस्त के प्रारंभ में कार्यकर्ताओं में जोश आ गया। इसके बाद भाजपा ने खास रणनीति के तहत 17 अगस्त को 39 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी। इससे भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल गई। पार्टी ने दूसरी सूची में तीन केंद्रीय मंत्रियों सहित सात सांसदों को चुनाव में उतार दिया।

पार्टी की पहली दो सूचियां 2018 में हारी सीटों को लेकर थी। भाजपा ने पिछली बार पराजित सीटों और जीती हुई सीटों को अलग-अलग श्रेणी में विभाजित किया और उस हिसाब से रणनीति बनाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार आदिवासी और दलित सीटों पर दौरे किए गए। भाजपा ने क्रांतिकारी आदिवासी शहीद नेताओं टंट्या मामा भील, रघुनाथ और शंकर शाह तथा बिरसा मुंडा के स्मारक और जयंतियां मनाना प्रारंभ किया। दलितों के लिए संत रविदास स्मारक बनाया गया। पार्टी ने पूरा ध्यान सोशल इंजीनियरिंग पर दिया। महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को अलग-अलग टारगेट किया गया। कुल मिलाकर भाजपा ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस गुटबाजी में उलझी रही। कमलनाथ के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस का संगठन भाजपा का मुकाबला नहीं कर पाया। नतीजे में भाजपा प्रदेश में एक बार फिर सरकार बनाने में सफल हुई है।

संघ परिवार का बड़ा योगदान

भाजपा की जीत में संघ परिवार का भी बड़ा योगदान है। संघ परिवार मध्य प्रदेश में लगातार अपना नेटवर्क मजबूत कर रहा है। खासतौर पर दलित क्षेत्र में सेवा भारती और आदिवासी क्षेत्र में वनवासी कल्याण परिषद और ग्राम भारती के माध्यम से संघ ने अपना संगठन विस्तारित किया है। पहली बार विधानसभा चुनाव में संघ की मध्य क्षेत्र इकाई ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। क्षेत्र प्रचारक दीपक विस्पुते, सह क्षेत्र प्रचारक अशोक पोरवाल, क्षेत्र कार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध ने भाजपा के चुनाव अभियान को मॉनिटर किया और जहां हस्तक्षेप की जरूरत हुई वहां दखल भी दिया। खासतौर पर संघ परिवार का कोर इलेक्शन मैनेजमेंट भाजपा ने संभाला। इसी का नतीजा यह है कि मध्य प्रदेश भाजपा के मजबूत किले के रूप में सामने आया है।


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