विधानसभा क्षेत्र 2 में बढ़त कायम रख पाएंगे मेंदोला!


सियासत

विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 2 को कांग्रेस क्षेत्र क्रमांक 4 की तरह ही भाजपा का किला मानती है. भाजपा यहां से लगातार 1993 से जीत रही है, 2013 में रमेश मेंदोला ने 91000 मतों से जीत प्राप्त कर एक नया कीर्तिमान बनाया था. पिछली बार जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी और माहौल कांग्रेस के पक्ष में था तब भी रमेश मेंदोला यहां से लगभग 62 हजार मतों से जीते थे.कांग्रेस ने इस बार मैदानी कार्यकर्ता और नेता चिंटू चौकसे यानी चिंतामणि चौकसे को उम्मीदवार बनाया था. उन्होंने इस बार रमेश मेंदोला का अच्छा मुकाबला किया. चिंटू चौकसे यहां से तीन बार पार्षद निर्वाचित हो चुके हैं तथा वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष हैं. चिंटू चौकसे जुझारू नेता हैं जिन्होंने जनता के लिए अनेक आंदोलन किए हैं. दूसरी तरफ रमेश मेंदोला बेहद सक्रिय जनप्रतिनिधि हैं. उनके यहां के अधिकांश परिवारों में चौके चूल्हे तक संपर्क है.

ऐसे में देखना दिलचस्प होगा की चिंटू चौकसे रमेश मेंदोला की पिछली बढ़त (लगभग 62 हजार मतों की) को किस तरह से पार करके आगे बढ़ते हैं. इंदौर जिले की क्षेत्र क्रमांक 2 विधानसभा सीट एक समय देश और प्रदेश की श्रमिक राजनीति में चर्चित रही है. यहां एक से बढ़कर एक संघर्षशील और जुझारू नेता हुए हैं. इन नेताओं ने प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर इंदौर का नाम रोशन किया है. ऐसे नेताओं में सबसे बड़ा नाम कामरेड होमी दाजी का था. जिन्होंने मुंबई से इंदौर आकर श्रमिक राजनीति की. पारसी समुदाय के होमी दाजी आरसी जाल के कहने पर इंदौर आए. आरसी जाल सर हुकुमचंद सेठ के यहां मुख्य लेखाकार के पद पर थे. वे भी पारसी समुदाय से थे. बाद में आर सी जाल को जवाहरलाल नेहरू कहने पर महू से चार बार विधानसभा का टिकट मिला और वे वहां से जीते भी.

श्रमिक राजनीति का बड़ा केंद्र रहा
दरअसल, आजादी के बाद 70 के दशक तक इंदौर में लंबे समय तक जनवादी राजनीति का बोलबाला रहा है। क्षेत्र क्रमांक 2 में तो यह स्थिति थी कि 1972 तक यहां केवल श्रमिक नेता ही जीत सकते थे. 1952 में पहली बार इंटक के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु वेंकटेश द्रविड़ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर क्षेत्र क्रमांक 2 से विधायक बने. लेकिन 1957 में पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार होमी दाजी ने यहां जीत का परचम लहराया. कामरेड होमी दाजी 1975 तक श्रमिक राजनीति के महानायक के रूप में सामने आए. उनकी लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि हजारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने चले आते थे. होमी दाजी 1962 में इंदौर के सांसद भी रहे. 1962 और 67 में क्षेत्र क्रमांक 2 से गंगाराम तिवारी विधायक चुने गए जो इंटक के ही नेता थे. 1972 में फिर होमी दाजी ने फिर क्षेत्र क्रमांक 2 से विधानसभा का चुनाव जीता. इस तरह होमी दाजी श्रमिक राजनीति के बल पर दो बार विधायक और एक बार सांसद रहे.

 विजयवर्गीय ने भाजपा का गढ़ बनाया
1993 में पहली बार कैलाश विजयवर्गीय को भाजपा ने टिकट दिया. उन्होंने कांग्रेस के कृपाशंकर शुक्ला को 28 हजार के लगभग मतों से मात दी. उसके बाद कैलाश विजयवर्गीय ने इस क्षेत्र को अपने जोरदार जनसंपर्क, जुझारू राजनीति, संगठन क्षमता और विकास कार्यों के बल पर भाजपा के गढ़ के रूप में परिवर्तित कर दिया. 1998 और 2003 में भी कैलाश विजयवर्गीय यहां से चुनाव जीते. सन् 2000 में क्षेत्र क्रमांक दो के विधायक रहते हुए उन्हें इंदौर का महापौर चुना गया. सन् 2000 में पहली बार महापौर का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया गया. कैलाश विजयवर्गीय ने कांग्रेस के सुरेश सेठ को एक लाख से भी अधिक मतों से पराजित किया.

कैलाश विजयवर्गीय भाजपा की राजनीति में इतनी तेजी से ऊपर आए कि वे विधायक और महापौर तो थे ही 2003 में जब उमा भारती की सरकार मध्यप्रदेश में बनी तो कैलाश विजवर्गीय लोक निर्माण मंत्री के रूप में प्रदेश मंत्रिमंडल में भी शामिल हुए. इस तरह उन्होंने एक साथ महापौर और मंत्री रहने का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया. 2008 में कैलाश विजयवर्गीय ने अपनी सीट अपने मित्र रमेश मेंदोला को दे दी और खुद महू से चुनाव लड़ने चले गए. हालांकि कैलाश विजयवर्गीय का निवास नंदा नगर में ही था (अभी भी है) रमेश मेंदोला ने 2008 का चुनाव करीब 39000 मतों से जीता. 2013 में उन्होंने 91000 से अधिक मतों से जीत दर्ज कर पूरे प्रदेश में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया. 2018 में रमेश मेंदोला ने जीत की हैट्रिक लगाई.


नव भारत न्यूज

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