एक समय जनवादी राजनीति का बोलबाला था इंदौर में…


सियासत

17 नवंबर को संपन्न मतदान में एक बार फिर यह जाहिर हुआ कि इंदौर जिले में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा. देपालपुर में जबरेश्वर सेना के राजेंद्र चौधरी और महू से कांग्रेस के पूर्व विधायक अंतर सिंह दरबार ने जरूर बागी होकर चुनाव लड़ा और इन दोनों सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणी बनाया लेकिन ये दोनों भाजपा और कांग्रेस से निकले नेता ही हैं. इंदौर में भाजपा और कांग्रेस के अलावा इन चुनावों में भी किसी अन्य दल का कोई अस्तित्व नजर नहीं आया. हालांकि इंदौर की राजनीति हमेशा से ऐसी नहीं थी.आजादी के बाद 70 के दशक तक इंदौर में लंबे समय तक जनवादी राजनीति का बोलबाला रहा है. क्षेत्र क्रमांक 2 में तो यह स्थिति थी कि 1972 तक यहां केवल श्रमिक नेता ही जीत सकते थे. इसी तरह शहर के पश्चिमी क्षेत्र जिसे व्यापारिक क्षेत्र भी कहा जा सकता है, में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने संसोपा ने तीन  विधायक निर्वाचित करवाने में सफलता प्राप्त की थी.

1977 में आपातकाल के बाद कांग्रेस विरोधी लहर की चपेट में हिंदी बेल्ट आया. नतीजे में जन संघर्ष की राजनीति भी उतार की ओर जाने लगी. 1980 के बाद से तो इंदौर शहर की राजनीति पूरी तरह से कांग्रेस और भाजपा के बीच विभाजित हो गई. 1952 में पहली बार इंटक के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु वेंकटेश द्रविड़ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर क्षेत्र क्रमांक 2 से विधायक बने. लेकिन 1957 में पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार होमी दाजी ने यहां जीत का परचम लहराया. कामरेड होमी दाजी 1975 तक श्रमिक राजनीति के महानायक के रूप में सामने आए. उनकी लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि हजारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने चले आते थे. होमी दाजी 1962 में इंदौर के सांसद भी रहे. 1967 में क्षेत्र क्रमांक 2 से गंगाराम तिवारी विधायक चुने गए जो इंटक के ही नेता थे. 1972 में भी होमी दाजी  ने फिर क्षेत्र क्रमांक 2 से विधानसभा का चुनाव जीता.

इस तरह होमी दाजी श्रमिक राजनीति के बल पर दो बार विधायक और एक बार सांसद रहे. सर हुकुम चंद सेठ और होलकर शासकों की दूर दृष्टि के कारण इंदौर के पूर्वी  क्षेत्र में 9 कॉटन मिल्स स्थापित हुई थी, जिनके कारण श्रमिक राजनीति का इस क्षेत्र में दबदबा रहा। जनवादी राजनीति का बोलबाला केवल श्रमिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था बल्कि इंदौर के व्यापारिक क्षेत्र यानी पश्चिमी क्षेत्र में भी समाजवादी आंदोलन से जुड़े अनेक नेता सक्रिय थे. इनमें से कल्याण जैन, यज्ञदत्त शर्मा और आरिफ बेग 1967 में विधायक बने. 1958 में इंदौर में नागरिक मोर्चा बना था जिसने नगर निगम का चुनाव लड़ा. इस मोर्चे के संयोजक कामरेड होमी दाजी थे. दरअसल, उस समय कांग्रेस के वर्चस्व पाली नगर परिषद ने साइकिल पर टैक्स लगा दिया था, जिसके विरोध में जनवादी दलों ने सड़कों पर संघर्ष किया.

1958 में इंदौर नगर निगम का गठन हुआ और पहला निर्वाचन हुआ. इस चुनाव में कामरेड होमी दाजी ने वादा किया कि यदि नागरिक मोर्चा सत्ता में आया तो साइकिल से टैक्स समाप्त कर दिया. 1958 के निगम चुनाव में नागरिक मोर्चे के विजयी लोगों में पुरुषोत्तम विजय, कॉमरेड हरिसिंह, सुरेंद्र नाथ गुप्ता, रणछोड़ रंजन, बालाराव इंग्ले, नारायण प्रसाद शुक्ला, वासुदेवराव लोखंडे अदि कई नेता दाजी की टीम में थे. दाजी के इस नागरिक मोर्चे ने चुनाव में महती सफलता हासिल की और 1958 से 1965 के मध्य रही मोर्चे की परिषद ने नगर को 8 लोगों को बारी-बारी से महापौर बनाया था. नागरिक मोर्चे के असर और कामरेड होमी दाजी की लोकप्रियता के कारण पश्चिमी क्षेत्र में भी जनवादी और समाजवादी आंदोलन का प्रभाव रहा है.

1977 के बाद जनवादी राजनीति कमजोर होती गई
1977 के बाद धीरे-धीरे जनवादी राजनीति का लोप होता गया. धीरे-धीरे शहर की राजनीति कांग्रेस और भाजपा के बीच विभाजित हो गई. समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलन से निकले दल हाशिए पर चले गए. 70 के दशक तक जिन नेताओं का बोलबाला था 80 के दशक आने तक उन सभी नेताओं की जमानतें जप्त होने लगी. समाजवादी आंदोलन से निकले अनेक नेता कांग्रेस या भाजपा में शामिल हो गए. 90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन के कारण इंदौर शहर की सियासत का रंग केसरिया होता गया.

अब यह स्थिति है कि श्रमिक संगठनों और आंदोलन के कारण प्रदेश में चर्चित रहा क्षेत्र क्रमांक दो अब पूरी तरह से भाजपा का गढ़ बन चुका है. शहर के अन्य क्षेत्रों की भी स्थिति यही है. कुल मिलाकर जनवादी राजनीति पूरी तरह से समाप्त हो गई है. यह ठीक है कि वर्तमान दौर में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच रह गई है लेकिन दिलचस्प तथ्य यह भी है कि राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद जो हिंदुत्व का उभार शहर के मध्यम मार्ग में देखा गया उसका असर कांग्रेस पर भी उतना ही पड़ रहा है. इंदौर में कांग्रेस के तौर तरीके पूरी तरह से हिंदुत्ववादी होते हैं. एक अर्थ में इंदौर की राजनीति भगवामय हो गई है.


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