राम जन्मभूमि आंदोलन के कारण भाजपा का गढ़ बना विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 4


सियासत

इंदौर क्षेत्र क्रमांक 4 ऐसी सीट है जिसे कांग्रेस ने इस बार भी प्रदेश की अपनी सबसे कमजोर 10 सीटों में चिन्हित किया था। यह सीट कांग्रेस के लिए हमेशा परेशानी का कारण रही है। यहां हमेशा से गैर कांग्रेसी रुझान रहा है। कांग्रेस ने अब तक यह सीट केवल 3 बार जीती है। पिछले 6 चुनाव से तो इस सीट पर गौड़ परिवार का कब्जा है। इस बार भी मालिनी गौड़ पर ही भाजपा ने विश्वास जताया। उनका मुकाबला कांग्रेस के राजा मंधवानी से हुआ। कांग्रेसियों का मानना है कि पार्टी ने इस बार स्थिति सुधारी है।

जबकि तटस्थ विश्लेषकों के अनुसार इस बार भी परिणाम पिछले चुनावों की तरह ही आने की संभावना है। लोकसभा और मेयर के चुनाव में यहां से भाजपा को हमेशा 50,000 से अधिक की बढ़त मिलती है। इस कारण से पूरे शहर के संदर्भ में कांग्रेस का समीकरण गड़बड़ा जाता है। क्षेत्र क्रमांक 4 का गड्ढा कांग्रेस किसी अन्य क्षेत्र से पाट नहीं पाती। नतीजे में कांग्रेस के मेयर और सांसद के प्रत्याशी हारते रहे हैं। मेयर के चुनाव में पिछले 5 बार से और लोकसभा के चुनाव में पिछले 9 चुनावों से कांग्रेस की हार का बड़ा कारण क्षेत्र क्रमांक 4 की भाजपा की बढ़त रही है।

अयोध्या आंदोलन ने इस सीट की पॉलीटिकल तासीर बदली

दरअसल 1987,88 में तेज हुए राम जन्मभूमि मुक्ति के आंदोलन के कारण इस सीट का चरित्र पूरी तरह से बदल गया। रामशिला पूजन के दौरान यहां के बंबई बाजार से पत्थरबाजी हुई, जिससे उपद्रव भड़क गए। शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा। ऐसे समय छात्र राजनीति में सक्रिय रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्के स्वयंसेवक लक्ष्मण सिंह गौड़ ने मोर्चा संभाला और बंबई बाजार के पत्थरबाजों को मुंहतोड़ जवाब दिया। इस दौरान हिंसा और आगजनी की कई वारदातें हुई। लक्ष्मण सिंह गौड़ इस उपद्रव के कारण हिंदू नायक के रूप में चर्चित हो गए। 1989 में राम जन्म भूमि आंदोलन के कारण हुए देशव्यापी दंगों के कारण बंबई बाजार के कुख्यात बाहुबली बाला बेग ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की। राम जन्मभूमि आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए इस चुनाव में अल्पसंख्यक मतदाताओं ने बाला बेग को एक तरफा समर्थन दिया। नतीजे में उन्हें लोकसभा चुनाव में 88,000 मत प्राप्त हुए।

सामान्य चुनाव में यह सभी मत कांग्रेस को मिलते, लेकिन विशेष परिस्थिति में हुए लोकसभा चुनाव के कारण निर्दलीय प्रत्याशी को इतने अधिक मत मिले नतीजे में कांग्रेस के प्रत्याशी पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री प्रकाश चंद्र सेठी पहली बार चुनाव लड़ रही सुमित्रा ताई महाजन से हार गए। ये लोकसभा चुनाव इंदौर की राजनीति के लिए बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। इसी चुनाव से इंदौर जिले में कांग्रेस के पतन की और भाजपा के उत्थान की शुरुआत हुई। 1989 के लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद 6 महीने के भीतर 1990 में विधानसभा चुनाव हुए। इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने क्षेत्र क्रमांक 4 में मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट करने की निर्णयाक भूल कर दी। कांग्रेस ने कलेक्टर से राज्यसभा सांसद बने अजीत जोगी की सिफारिश पर मोहम्मद इकबाल खान को चार नंबर से टिकट दे दिया। मोहम्मद इकबाल खान की उम्मीदवारी के कारण पूरे पश्चिमी इंदौर में ध्रुवीकरण हो गया। नतीजे में कैलाश विजयवर्गीय बिना प्रचार किए 27000 के लगभग मतों से विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 4 से विजई हुए। कैलाश विजयवर्गीय दरअसल प्रचार ही नहीं कर पाए क्योंकि नामांकन फॉर्म जमा करने के दूसरे दिन उनके पिता का निधन हो गया। कैलाश विजयवर्गीय के चुनाव प्रचार का सारा मोर्चा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में उनके साथ काम कर चुके  लक्ष्मण सिंह गौड़ ने संभाला। लक्ष्मण सिंह गौड़ इस चुनाव से पूरे विधानसभा क्षेत्र में स्थापित हो गए।

लक्ष्मण सिंह गौड़ के कारण अयोध्या के रूप में चर्चित हुआ यह क्षेत्र

भाजपा ने 1990 के बाद हुए 1993 के विधानसभा चुनाव में कैलाश विजयवर्गीय को क्षेत्र क्रमांक 2 में शिफ्ट किया। 1993 में यहां से लक्ष्मण सिंह गौड़ को उतारा गया जिन्हें लखन दादा के नाम से क्षेत्र में लोकप्रियता हासिल थी। लक्ष्मण सिंह गौड़ ने वह चुनाव आसानी से 30,000 से अधिक मतों से जीता। इसके बाद 1998 और 2003 में भी लक्ष्मण सिंह गौड़ ने जीत हासिल कर विधायक बनने की हैट्रिक जमाई। फरवरी 2008 में उनका एक सड़क हादसे में  दुर्भाग्यपूर्ण निधन हो गया।

2008 के विधानसभा चुनाव नवंबर में निर्धारित थे इसलिए निर्वाचन आयोग ने उपचुनाव कराना जरूरी नहीं समझा। 2008 में लक्ष्मण सिंह गौड़ की पत्नी मालिनी गौड़ को भाजपा ने टिकट दिया। लक्ष्मण सिंह गौड़ की क्षेत्र में इतनी लोकप्रियता थी कि उनकी अंतिम यात्रा में डेढ़ लाख लोग शामिल हुए। कहा जाता है कि 50 के दशक में महाराजा तुकोजीराव  होलकर की अंत्येष्टि के बाद इतनी बड़ी संख्या में किसी नेता के लिए भीड़ उमड़ी थी। जाहिर है मालिनी गौड़ को लखन दादा के निधन के कारण उपजी सहानुभूति का लाभ मिला और उन्होंने 2008 में 40000 के लगभग मतों से जीत हासिल की। 2013 और 2018 में भी मालिनी गौड़ यहां से अच्छे अंतर से जीती। इस तरह 1993 से अभी तक यह सीट गौड़ परिवार के पास है। ब्रह्मलीन लखन दादा के कारण ही इस क्षेत्र को इंदौर के अयोध्या कहा जाता है।

ये है इतिहास

1967 में गठित इस सीट को पहली बार नागरिक समिति के यज्ञदत्त शर्मा ने जीता था। नागरिक समिति गैर कांग्रेस दलों का एक समूह था जो समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा को बिलॉन्ग करते थे। एकीकरण समिति के नेता कामरेड होमी दाजी थे इसमें कल्याण जैन, यज्ञदत्त शर्मा, जैसे अनेक नेता शामिल थे। नागरिक समिति की तरफ से 1967 में चुनाव लड़े यज्ञदत्त शर्मा इस विधानसभा क्षेत्र से पहला चुनाव लड़े और जीते। 1972 में यहां से कांग्रेस के नारायण प्रसाद शुक्ला जीते। 1977 में इस सीट पर जनता पार्टी के जनसंघ घटक के उम्मीदवार श्री वल्लभ शर्मा ने जीत दर्ज की। 1980 में यह सीट फिर से कांग्रेस के कब्जे आ गई। इस बार फिर यज्ञदत्त शर्मा ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। 1985 में यहां से कांग्रेस के नंदलाल माटा जीते।

वे इंदौर के राजनीतिक इतिहास के इकलौते सिंधी विधायक थे। कांग्रेस ने उनके बाद गोविंद मंघानी को भी टिकट दिया लेकिन वो जीत हासिल नहीं कर सके। 1990 में नंदा नगर के निवासी कैलाश विजयवर्गीय को क्षेत्र क्रमांक 4 में उतारा गया। उस समय कैलाश विजयवर्गीय क्षेत्र क्रमांक 2 में चुनाव की तैयारी कर रहे थे लेकिन 1985 में कन्हैया लाल यादव से इसी क्षेत्र में मात खाए विष्णु प्रसाद शुक्ला ने 1990 में भी यहीं से चुनाव लड़ने की जिद पकड़ ली। नतीजे में विष्णु प्रसाद शुक्ला बड़े भैया को क्षेत्र क्रमांक 2 से लड़ाया गया। जबकि युवा कैलाश विजयवर्गीय को क्षेत्र क्रमांक 4 में शिफ्ट किया गया। 90 में कैलाश विजयवर्गीय आसानी से जीते इसके बाद के 6 चुनाव से इस सीट पर तीन बार स्वर्गीय लक्ष्मण सिंह गौड़ और तीन बार से उनकी पत्नी मालिनी गौड़ विधायक हैं।


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