इस बार भी महेंद्र हार्डिया और सत्यनारायण पटेल के बीच कड़ा मुकाबला रहा !


सियासत

मतदान समाप्त होने के एक सप्ताह बाद भी इंदौर जिले की विधानसभा सीटों के रुझान के बारे में विश्लेषण और अटकलों का दौर चल रहा है। प्रदेश की सबसे बड़ी विधानसभा सीटों में से एक क्षेत्र क्रमांक 5 में इस बार भी महेंद्र हार्डिया और सत्यनारायण पटेल के बीच कड़ा मुकाबला रहा। इस सीट पर सबसे अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। करीब 90,000 मुस्लिम मतदाताओं वाली सीट को भाजपा के महेंद्र हार्डिया पिछले 4 बार से लगातार जीत रहे हैं। यह विधानसभा क्षेत्र अपने जातीय समीकरणों के कारण हमेशा चर्चित रहता है। विधानसभा चुनाव में हमेशा यहां खड़ा संघर्ष होता है जबकि नगर निगम मेयर और लोकसभा चुनाव में यहां के मतदाता अलग-अलग पैटर्न पर मतदान करते हैं।

इंदौर-5 विधानसभा सीट वो क्षेत्र है जहां से न केवल इंदौर की जनता बल्कि इंदौर के नेता भी अपने शुभ काम की शुरुआत करते हैं। दरअसल विश्व प्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर इसी विधानसभा सीट में आता है। इंदौर-5 विधानसभा क्षेत्र पूर्वी इंदौर का वो इलाका है जो सबसे आधुनिक है। इसे आप पब और मॉल का शहर भी कह सकते हैं। खाने-पीने के लिए फेमस छप्पन दुकान भी इंदौर-5 का हिस्सा है। सबसे ज्यादा ब्रिज कहीं हैं तो वो इसी इलाके में हैं। इंदौर-5 विधानसभा सीट 1977 में अस्तित्व में आई। इससे पहले ये इंदौर पूर्व और इंदौर सीट का हिस्सा थी। उस समय इंदौर की आबादी उतनी नहीं थी जितनी आज है। जैसे-जैसे इंदौर का विस्तार हुआ विधानसभा सीटें भी बढ़ती चली गईं। 1977 में यहां से सुरेश सेठ ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। 1980 में भी वे कांग्रेस के टिकट पर यहां से जीते हैं लेकिन 1985 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की।सुरेश सेठ के निर्दलीय चुनाव लड़ने का किस्सा दिलचस्प है।

1985 के चुनाव के समय अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे जिनकी सुरेश सेठ से बिल्कुल भी नहीं बनती थी। अर्जुन सिंह ने राजीव गांधी के जरिए उनका टिकट कटवा दिया। उनके स्थान पर सहकारिता क्षेत्र में सक्रिय रामचंद्र वर्मा को टिकट दिया गया। ऐसे में सुरेश सेठ में निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया और शेर के चुनाव चिन्ह पर निर्दलीय चुनाव लड़े। उन्होंने निर्दलीय लड़कर भाजपा और कांग्रेस दोनों को हराया। सुरेश सेठ दबंग और तेजतर्रार नेता माने जाते थे। उन्होंने तीन चुनाव क्षेत्र क्रमांक 5 और  एक चुनाव क्षेत्र क्रमांक 2 से जीता। 1990 में उन्होंने क्षेत्र क्रमांक 2 से बहुचर्चित चुनाव में विष्णु प्रसाद शुक्ला बड़े भैया को हराया था।

हालांकि उस समय भाजपा लहर थी‌।1990 के चुनाव में फिर कांग्रेस के आलोक शुक्ला जीते लेकिन 1993 में पहली बार बीजेपी के भंवर सिंह शेखावत ने यहां से जीत दर्ज की। 1998 में कांग्रेस के सत्यनारायण पटेल ने फिर से ये सीट छीन ली लेकिन 2003 के चुनाव में महेंद्र हार्डिया ने यहां से पहली बार चुनाव जीतकर बीजेपी की जीत का जो सिलसिला शुरू किया वो 2018 तक जारी रहा। भाजपा भले ही 20 साल से चुनाव जीत रही है लेकिन जीत का अंतर सांसें अटकाने वाला होता है उसकी वजह है जातिगत समीकरण। इस सीट पर लगभग 90 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। जो कहीं न कहीं कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं। बाकी समुदाय जिसमें  ब्राह्मण करीब 30 हजार, जैन करीब 20 हजार, 25000 मतदाता मुरई समाज के हैं। महेंद्र हार्डिया इसी समाज से आते हैं। जबकि 70,000 मतदाता दलित हैं। मुस्लिम और दलित मतदाताओं के कारण इस सीट पर कांग्रेस हमेशा कड़ा संघर्ष करती है। हार-जीत का अंतर मामूली वोटों से होता है। खास बात ये है कि पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा करीब 4 लाख मतदाता इंदौर-5 से है।

चुनाव के दौरान ये मुद्दे हावी रहे

इंदौर-5 विधानसभा सीट को आधुनिक इंदौर कहा जाता है लेकिन आधुनिकता के साथ साथ अवैध कॉलोनियों की भी यहां भरमार है। सहकारी सोसाइटियों के फर्जीवाड़े की जितनी कहानियां हैं वो सब इंदौर-5 में ही समाई हुई हैं। इनके अलावा पानी और ड्रेनेज की समस्या है। कुछ निचली बस्तियों में सड़कें भी खराब हैं। खासतौर पर मुस्लिम बस्ती में पिछड़ापन दिखता है। स्वच्छता के मामले में इंदौर भले ही अव्वल हो लेकिन क्षेत्र क्रमांक 5 की कुछ बस्तियों में स्वच्छता का वैसा माहौल और जागरूकता नहीं दिखती। नशे के कारोबार के मामले में भी क्षेत्र क्रमांक 5 के कुछ क्षेत्र बदनाम हैं। इन सब मुद्दों के आधार पर चुनाव लड़ा गया। अनेक स्थानों पर मतदाताओं ने प्रत्याशियों से जवाब मांगे। कुल मिलाकर यहां के भावी विधायक को इन समस्याओं की तरफ ध्यान देना ही होगा

दोनों मंत्री पद के दावेदार रहेंगे

इस विधानसभा सीट से कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़े सत्यनारायण पटेल और भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे महेंद्र हार्डिया अपनी अपनी पार्टियों के वरिष्ठ और महत्वपूर्ण नेता हैं। यदि भाजपा की सरकार बनती है तो महेंद्र हार्डिया को मंत्री बनाना पड़ेगा। उनकी यह पांचवीं टर्म होगी। इसी तरह सत्यनारायण पटेल तीसरी बार विधायक बनेंगे। वे देपालपुर और क्षेत्र क्रमांक 5 से एक एक बार विधायक निर्वाचित हो चुके हैं। सत्यनारायण पटेल सीधे प्रियंका गांधी से जुड़े हुए हैं। प्रियंका गांधी ने उनके क्षेत्र में सभा भी की थी। कांग्रेस की यदि सरकार बनती है तो सत्यनारायण पटेल मंत्रिमंडल में सदस्य बनने के लिए प्रबल दावेदार होंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों ही ओबीसी वर्ग से आते हैं। इस वजह से भी इनको मंत्री बनने में अड़चन नहीं आएगी, क्योंकि जातीय समीकरणों का दबाव रहेगा।


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