उम्रदराज नेताओं को मिलेगा प्रमोशन या होगी आखिरी पारी…


महाकौशल की डायरी
अविनाश दीक्षित

इस बार का विधानसभा चुनाव महाकौशल की राजनीति के कुछ माहिर खिलाड़ियों के लिए प्रमोशन वाला साबित होगा या फिर आखिरी पारी वाली होगा.. ? यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो भारतीय जनता पार्टी के उम्रदराज नेताओं का पॉलिटिकल रिटायरमेंट हो जाएगा और यदि भाजपा पुनः वापिसी करती है तो कांग्रेस के अनेक धुरंधरों की सियासी सेवानिवृत्ति हो जाएगी। कमलनाथ, प्रहलाद सिंह पटेल, राकेश सिंह, फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे नेता जिनकी शोहरत प्रदेश से लेकर देश तक में हैं, जबकि प्रादेशिक स्तर पर पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया, अजय विश्नोई, गौरीशंकर बिसेन, लखन घनघोरिया, भाजपा के पूर्व सांसद बोधसिंह भगत जो इस बार बालाघाट की कंटगी विधानसभा से कांग्रेसी खेमे से चुनाव मैदान में रहे।

यह सभी नेता 60-70 वर्ष पूर्ण कर चुके हैं, हालांकि यह नेता खुद को बूढ़ा नहीं मानते। उम्र के तकाजे के चलते भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को टिकट नहीं दिया था और उसी भाजपा ने महाकौशल सहित पूरे मध्यप्रदेश में कांग्रेस से ज्यादा उम्रदराज नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा। अब जबकि मतदान हो चुका है, बूथवार वोटिंग विश्लेषण किया जाने लगा है तब उम्रदराज नेता सियासी जीत की कामना करने के साथ-साथ इस बात की भी चिंता करने मजबूर हैं कि यह विधानसभा चुनाव उन्हें प्रमोशन दिलवाएगा या रिटायरमेंट।

दिग्गज नेताओं की अटकी सांसे, भितरघात की आशंका से चिंतित

भाजपाई अपेक्षाओं के विपरीत 2018 के विधानसभा चुनाव चौकाने वाले रहे। तब भगवा दल को तगड़ा झटका महाकौशल से लगा था। यहां की 38 सीटों में से महज 13 सीट ही वह जीत पाई थी, जबकि कांग्रेस ने 24 सीट पर विजय पताका लहराई थी। जोड़तोड़ उपरांत भाजपा कमलनाथ सरकार को गच्चा देकर सत्ता में काबिज हो गई थी। अपेक्षा की जा रही थी कि मतदाताओं की रूष्टता के मद्देनजर भाजपा महाकौशल को तबज्जों देगी, लेकिन शिवराज सरकार में केवल बालाघाट के रामकिशोर कांवरे को शामिल कर आंचलिक राजनीति के केन्द्र जबलपुर को हाशिये पर डाल दिया गया। इसको लेकर कांग्रेस नेताओं ने तो भाजपा पर जमकर आरोप लगाये ही, बल्कि भाजपा के भी अनेक नेताओं ने सरकार और संगठन के फैसलों पर कड़े प्रहार किये। महापौर चुनाव में हार के बाद भाजपा के रणनीतिकारों की आंखे खुलीं, लेकिन तब तक स्थानीय भाजपा कई गुटों में बंट चुकी थी।

नेता अपनी-अपनी राजनीति कर रहे थे, और दरी-फट्टा उठाने वाले समर्पित कार्यकर्त्ता असंतोष के चलते घर बैठ गये थे। विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुये शिवराज सिंह, अमित शाह सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने ताबड़तोड़ दौरे कर हालात नियंत्रित करने का प्रयास किया, लेकिन टिकट घोषित होते ही असंतोष का लावा अपनी हद तोड़कर बहने लगा। अमित शाह के समझाने पर सतही तौर पर तो बागियों के तेवर ठंडे पड़ गये, और जनसंपर्क के दौरान भी प्रत्याशी के साथ वह बने रहे, किन्तु चर्चा है कि असंतोष की आग अंदर ही अंदर प्रत्याशियों की हसरतों को जलाती रहीं।

भितरघात की आंच में कौन-कौन झुलसेगा, इसका पता 3 दिसम्बर को चलेगा, परन्तु केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल, फग्गन सिंह कुलस्ते, राज्यसभा सांसद सम्पतिया उइके, सांसद राव उदय प्रताप सिंह जैसे धुरंधर नेताओं की सांसे तब तक अटकी रहेंगी। हर हाल में जीत की अपेक्षा के साथ केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल को नरसिंहपुर विधानसभा से चुनाव लड़ाया गया है। कांग्रेस ने लाखन सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस को उम्मीद है कि लाखन और उनकी टीम की मेहनत का सुफल मिलेगा। भाजपा समर्थक बहुल इस क्षेत्र में प्रहलाद की उम्मीदवारी को लेकर स्थानीय कार्यकर्त्ताओं में अंदरूनी विरोध नजर आता रहा। एक असंतुष्ट पदाधिकारी ने दबे स्वर में बताया कि यदि भाजपा क्षत्रपों को विधानसभा जैसे चुनाव में उतारेगी तो बाकी दावेदारों का क्या होगा ? कहने का आशय यह कि भले ही माहौल प्रहलाद के अनुकूल नजर आता रहा, लेकिन इसके साथ ही भितरघाती भी सक्रिय रहे। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक प्रहलाद की लीड का अनुमान लगाने में व्यस्त हैं।

कुलस्ते छीन पाएंगे सीट..?

कांग्रेस के प्रभाव वाली मंडला जिले की निवास विधानसभा में भी मुकाबला रोचक है। केन्द्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते के खिलाफ कांग्रेस के चैन सिंह चुनौती दे रहे हैं। 2018 के पूर्व भाजपा तीन पंचवर्षीय काबिज रही, कुलस्ते के भाई रामप्यारे कुलस्ते को कांग्रेस के डॉ0 अशोक मर्सकोले ने 30 हजार के भारी अंतर से हरा दिया था। अनुमान लगाया जा सकता है कि आदिवासियों के बड़े नेता माने जाने वाले फग्गन सिंह किस सियासी उलझन में फंसे हुये हैं। कुछ ऐसे ही हालात गाडरवारा विधानसभा के हैं, जहां सांसद उदय प्रताप सिंह कांग्रेस की सिटिंग एमएलए सुनीता पटेल को चुनौती दे रहे हैं। यहां पूर्व विधायक गोविंद पटेल भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में गये थे, लेकिन टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस प्रत्याशी का सर्मथन कर दिया, इससे कमजोर पड़ रहीं सुनीता पटेल की स्थिति पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गई। बहरहाल, 3 दिसम्बर को अन्य प्रत्याशियों के साथ इन दिग्गज नेताओं की सियासी किस्मत का फैसला हो जाएगा। यह देखना दिलचस्प रहेगा कि भाजपा ने जिस सोच और समीकरणों को साधने के लिये दिग्गज सांसदों को मैदान में उतारा था अन्ततः वैसे परिणाम वह दे भी पाते हैं या नहीं ।


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