कौन है संजय और कौन है हिमांशु… ?


कौन है संजय और कौन है हिमांशु… ?
जिनके कहने पर पुलिस कैंटीन से आमजन को सामान देना किया बंद ?

झाबुआ: शहर के पुलिस लाइन स्थित पुलिस कैंटीन पर वर्तमान में पुलिसकर्मियों का अलावा अन्य लोगों को सामान देना बंद कर दिया है, लेकिन जब कैंटीग का शुभारंभ हुआ था तब खास हो या आम लोग सभी को बिना किसीह मतभेद के पुलिस कैंटीन से सामान दिया जा रहा था, लेकिन वर्तमान में पुलिस कैंटीन के जिम्मेदारों को किसी की शिकायत पर आम लोगों को सामान देना बंद कर दिया है जब इस मामले की पुलिस कैंटीन के मुखबीरों से मुलाकात में पुछा तो उन्होंने कहा कि हिमांशु और संजय की शिकायत के आधार पर कैंटीन से आम लोंगों को सामान देना बंद कर दिया है, जब पुछा गया कि शिकायत लिखित में है कि मौखिक में तो उन्होंने बात काटते हो कहा कि बहुत जल्द जिम्मेदारों द्वारा जनहित को देखते हुए निर्णय लिया जाएगा, लेकिन कैंटीन के मुखबिरों ने उनका पूरा नाम नहीं बताया। झाबुआ पुछता है आखिर यह है कौन ? जिनके कहने पर आम लोगों को रियायती दामों पर मिलने वाले सामान पर अंकुश लगाया। यह सवाल आम लोगों के मन में खटक रहा है। हर मध्यमवर्गीय परिवार को पुलिस कैंटीन से सामान लेने पर दो पैसे की बचत होती थी, वह लोग उनके नाम जानने के इच्छुक हैं, परंतु यह नहीं बताया गया कि आखिर वे है कौन ?
रियायती दरों पर सामान मिलने से दोनों को दर्द
पुलिस कैंटीन के आम लोगों को सामान देने की खबरें सुर्खियां बनी तो पुलिस ने दोनों शिकायतकर्ता के नाम बताने में कतई देर नहीं की। पुलिस कैंटीन के जिम्मेदारों ने इनके नाम आधे अधुरे बताएं क्योंकि इस नाम के शहर सहित दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग हैं। आखिर यह कैसे पता लगाया जा सकता है कि हिमांशु और संजय है कौन ? इन दो नाम के व्यक्ति मुख्यालय के हैं की जिले के अंदर के हैं, यह अभी राज ही बना हुआ है. ? जो आम लोगों को रियायती दरों पर सामान मिलने से इन दोनों को पेट दर्द हो रहा है, जो शिकायत लेकर कैंटीन के जिम्मेदार तक पहुंच गए और जिम्मेदारों ने भी इनकी बात रखते हुए आम लोगों को सामान देना बंद कर दिया है। बड़ी बात तो यह है कि पुलिस के मुखबिरों ने इन दोनों नाम के अलावा किसी के और के नाम भी नहीं बताएं यह भी बड़ा सवाल है ?
सुर्खियां बनने के बाद मामला
आम लोग जानना चाहते है कि यह हिमांशु और संजय है कौन ? जिसके आधार पर पुलिस ने जनहित में कर रहे कार्य में बाधा डालकर पुलिस कैंटीन से आम लोगों को दूर का रास्ता दिखा दिया। वर्तमान में कैंटीन से अभी पुलिस परिवार को ही सामान दिया जा रहा है। फिलहाल समाचार पत्रों की सुर्खियां बनने के बाद मामला गरमाते जा रहा है और आम लोगों ने पुलिस के ऊपर पक्षपात के आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि बिना जांच पड़ताल के पुलिस ने आम लोगों को कैंटीन के बाहर का रास्ता दिखया है। आखिर पुलिस को पहले शिकायत के बिंदुओं की जांच पड़ताल कर कदम उठाना थे, लेकिन यहां ऐसा नही किया, जैसा पुलिस थानों में पहुंचने वाली शिकायतों की विवेचना कर निर्णय लिया जाता है। आखिर बिना सोच विचार पुलिस का यह निर्णय लोगों को नागवार गुजर रहा है।
आखिर इतने हितेैषी थे, क्यों नही उठाई आवाज
शहर के निवासी विजय शर्मा, विनोद मेडा सहित आम लोगों ने एक सामान का ही जिर्क करते हुए कहा कि बाजार में 4 रुपए का बिस्कुट पैकेट लेने जाते हैं तब वही बिस्किट का पैकेट आम लोगों को 5 रूपये में मिलता है, जिससे आम लोगों को सीधा एक रूपये का नुकसान उठाना पड़ता है, वही 14 रुपए की सादी (ब्लेड) का पैकेट कई दुकानों पर 15 रूपये में बेच रहे हैं तब इन हितेैषियों ने आम लोगों के साथ हो रही लुट को लेकर आवाज क्यों नही उठाई, इन्हें मोर्चा खोलकर हो रही लुट के खिलाफ आवाज बुलंद करना थी, तब शहरवासियों का कारवां भी इनके समर्थन में जुटता, लेकिन आम लोगों को कुछ कम दाम पर मिलने वाला सामान इनकी आंखों में चुभने लगा और पुलिस के पास कैंटीन बंद करवाने के लिए पहुंच गए, पुलिस को ऐसे लोगों की जांच पड़ताल करना चाहिए कि लोगों को रियायती दरों में मिलने वाले सामान से उन्हें क्यों परेशानी है, इसके पीछे उनका कौनसा हित जुडा है। पुलिस को ऐसे लोगों के राज दुनिया के सामने उजागर करना चाहिये जिसे पता चले की वे आम लोगों के लिए काम कर रहे है कि अपने खुद का हित साध रहे है।
कैंटीन से मिलता है हर सामान का बिल
आम लोगों का कहना है कि पुलिस कैंटीन और बाहर से सामान लेने में इतना फर्क है कि पुलिस कैंटीन से लिए गए हर समान के पैसे का बिल पुलिस कैंटीन में काउंटर पर बैठे जिम्मेदार कर्मचारी प्रत्येक ग्राहक को देते हैं जबकि बाजार से लिये गये सामान का कोई भी दुकानदार ना तो बिल देता है ना जीएसटी वाले बिल आज तक किसी घर में सामान लाने पर देखे गए, जबकि बाजार के अधिकांश लोग सामान बेचते समय भी जीएसटी का बिल नहीं दे रहे हैं जिससे उन्होंने कितना माल स्टॉक में खरीद रखा है उसका बिल भी उनके पास कच्चा है मार्केट के लोग सीधे जीएसटी के क्रय-विक्रय की चोरी कर शासन को चूना लगाने से नहीं चूक रहे हैं। शासन-प्रशासन को ऐसे लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करना चाहिए और जो शासन के राजस्व को हानि दे उनके माल को राजसात करना चाहिए, जो आम लोगों को पुलिस कैंटीन से दो पैसे का फायदा दे रही उसमें भी इस प्रकार के हितेैषी को पेट दर्द हो रहा है इससे साफ जाहिर है कि ऐसे हितेैषी सिर्फ अपने स्वयं का फायदा खोज सकते हैं पर आम लोगों का भला नहीं कर सकते ?


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