अखिलेश को निमाड़ लाना ही वजूद सुरक्षित रखना है?


खंडवा:निमाड़ में कांग्रेस की राजनीति चालीस साल से यादव परिवार पर केंद्रित रही है। अरूण यादव की जरा सी पालिसी से स्थिति बदल गई थी। इसी डेमेज कंट्रोल के लिए उन्हें पावर पालिटिक्स का सहारा लेना पड़ा। खंडवा लोकसभा उपचुनाव न लडऩे व खरगोन कांग्रेस में ऊंची हाइट वाले राजनीतिक विरोधी धड़े की प्रदेश में ज्यादा चलने से ऐसा हुआ है। अखिलेश यादव को बोरावां लाने का मतलब राजनीति में वजूद सुरक्षित रखना भी माना जा रहा है?हो सकता है कि अरूण यादव लोकसभा 2024 का चुनाव खंडवा से न लड़ें। उनके छोटे भाई सचिन यादव ने कसरावद सीट पर मजबूत पैठ बनाई है। ऐसे में अरूण यदि विधानसभा 2023 का चुनाव लडऩा भी चाहें,तो बाहरी व सुरक्षित सीट खोजना मुश्किल होगा।
दबाव की राजनीति?
अखिलेश यादव के साथ होने का मतलब देश में पिछड़े वर्ग का नया समीकरण बनाना है। पिछड़े वर्ग में यादवों का प्रतिशत काफी अधिक है। निमाड़ की राजनीति में खरगोन जिले में कुछ बड़े नेता उभरे हैं। खंडवा और बुरहानपुर ही अरूण यादव के हाथ में बचे थे। बुरहानपुर जिले के दोनों अध्यक्ष उनकी पसंद के खिलाफ बताए जा रहे हैं। वहीं, खंडवा जिले में उनकी पसंद के बनाए गए जिलाध्यक्ष की नियुक्तियाँ होल्ड पर हैं।
शीतयुद्ध रोकना जरूरी
नगर निगम और पंचायत के चुनावों में भी कांग्रेस की स्थिति खराब होती गई। मौजूदा स्थिति में विधानसभा चुनाव सामने होने के बावजूद खंडवा जिले में संगठन के मुखिया का फैसला न हो पाने से अनुशासनहीनता की कार्रवाई लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों गांधीभवन में जिला प्रभारी कैलाश कुंडल के साथ हुई घटना के बाद जिस तरह कांग्रेस के दो नेताओं को छह साल लिए प्रतिबंधित किया गया,और 12 नेताओं को कारण बताओ नोटिस दिए जाने के बाद से अरूण यादव व कमलनाथ के बीच शीतयुद्ध लंबा खिंचते जा रहा है।
गुटबाजी ही घातक
सीधा नुकसान कांग्रेस को निमाड़ से आने वाले चुनाव में होगा। सामान्य तौर पर खंडवा जिले कि चार में से तीन सीटों पर कांग्रेस की स्थिति भाजपा से बेहतर मानी जा रही है। बावजूद इसके यहां होने वाले पार्टी के कार्यक्रम साफ तौर पर दो गुटों में बंट गए हैं। कांग्रेस के एक गुट ने ग्रामीण जिलाध्यक्ष बनाए गए मनोज भरतकर को भाजपाई साबित करने में सफलता पाई है, वहीं शहर अध्यक्ष बनाए मोहन ढाकसे का ग्रामीण निवासी होने का प्रमाण भी कांग्रेसियों ने ही दे दिया है। इसी के चलते दोनों को होल्ड कर दिया गया है। यादव विरोधी खेमा लंबे समय बाद अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति पाने की चाहत में है।प्रदेश के प्रभारी जेपी अग्रवाल और प्रदेश संगठन के बीच खींचतान से खंडवा जिले की कांग्रेस असामंजस्य बना हुआ है।
अखिलेश से दोस्ती
उनका नया दबाव यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव का गृहग्राम बोरावां आना रहा। स्व. सुभाष यादव की प्रतिमा के अनावरण अवसर पर कई दिग्गज कांग्रेस नेताओं को एक मंच पर लाकर ताकत दिखाई थी। उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सजातीय होने के कारण अपने गृहग्राम बोरावां में बुलाना पार्टी को दबाव में लाना है,ताकि अपनी ताकत व वजूद दिखा सकें। पिछड़े वर्ग का बड़ा आयोजन भी जल्द हो सकता है।
निमाड़ में कांग्रेस कमजोर
खंडवा बुरहानपुर की छह विस सीटों में से दो पर कांग्रेस व एक पर निर्दलीय की जीत ने जिस तरह भाजपा को चौंका दिया था। उससे भी बड़ा झटका नेपानगर व मांधाता के कांग्रेस विधायकों ने दे दिया। निमाड़ की राजनीति में एक और बड़ा झटका लोकसभा चुनाव में लगा जब अरूण यादव उपचुनाव लडऩे से इंकार कर आए। इतना ही नहीं इसी चुनाव क्षेत्र बड़वाह विधानसभा से कांग्रेस विधायक सचिन बिरला ने भी कांग्रेस का दामन छोड़ दिया।


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