शाजापुर विधानसभा में भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है गुटबाजी

कांग्रेस के मैनेजमेंट के आगे भाजपा होती रही है धराशायी, तीन दशकों में केवल एक बार जीती है भाजपा

शाजापुर: देश-प्रदेश में भले ही भाजपा का वर्चस्व हो, लेकिन शाजापुर विधानसभा की बात करें, तो यहां भाजपा को जीत के लिए उसी तरह संघर्ष करना पड़ता है, जिस तरह कांग्रेस अन्य क्षेत्रों में करती है. या यूं कहें कि शाजापुर विधानसभा कांग्रेस का ऐसा किला है, जिसे भाजपा ने भेदने के लिए राजनीति के सभी शस्त्रों का उपयोग कर लिया है. जातिगत समीकरण भी भाजपा का फैल रहा और शाजापुर विधानसभा पर कांग्रेस के हुकुमसिंह की हुकुमत भाजपा के लिए चुनौती बनी हुई है. तो वहीं शुजालपुर में कांग्रेस की गुटबाजी कांग्रेस के लिए हर चुनाव में अभिषाप बनकर उभरती है. गुटबाजी शाजापुर विधानसभा में भी है, लेकिन यहां कांग्रेस का मैनेजमेंट कहें कि यहां गुटबाजी कांग्रेस को हार में परिवर्तित नहीं कर पाती है. बीते तीन दशकों में भाजपा यहां केवल एक बार चुनाव जीती है. अब 2023 के लिए भाजपा के पास ऐसा कोई जिताऊ उम्मीदवार नजर नहीं आ रहा है, जो शाजापुर विधानसभा में कांग्रेस को चुनौती दे सके.

शाजापुर विधानसभा में भाजपा ने जीत के लिए अभी तक हर प्रयोग किए हैं. जातिगत समीकरण की बात करें, तो गुर्जर समाज, राजपूत समाज, पाटीदार समाज को भी भाजपा ने विधानसभा में मौका दिया है. केवल 2013 में अरुण भीमावद ही एकमात्र ऐसे भाजपा के उम्मीदवार थे, जो हुकुमसिंह कराड़ा को परास्त करने में कामयाब रहे. 2013 के चुनाव की यदि बात करें, तो इस चुनाव में कांग्रेस की गुटबाजी और कांग्रेस नेताओं का भाजपा को साथ मिला. तब कहीं जाकर बाउंड्री पर भाजपा चुनाव जीत सकी थी. लेकिन अब परिस्थिति इसके उलट है. भाजपा में इन दिनों जितनी गुटबाजी है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि भले ही प्रदेश में फिर भाजपा सरकार बन जाए, लेकिन शाजापुर विधानसभा भाजपा को जीतने के लिए आसान नहीं है.

इसके उलट शुजालपुर विधानसभा की बात करें, तो 2008, 2013 और 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी के कारण कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. 2008 में महेंद्र जोशी से कांग्रेस को जीत की उम्मीद थी, लेकिन कांग्रेस की गुटबाजी के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इसी प्रकार 2013 में फिर महेंद्र जोशी को कांग्रेस की बगावत के कारण हार का सामना करना पड़ा. 2018 में भी रामवीरसिंह सिकरवार को कांग्रेस का उन क्षेत्रों में साथ नहीं मिला, जो कांग्रेस के गढ़ कहे जाते हैं और वे भी चुनाव हार गए. कालापीपल की बात करें, तो इस बार भाजपा के पास जातिगत समीकरण सटीक नहीं था, जिस कारण कांग्रेस के कुणाल चौधरी विधायक बनें. क्योंकि कालापीपल एक ऐसी विधानसभा है, जहां जातिगत फैक्टर निर्णायक होता है. खाती समाज भाजपा का वोट बैंक माना जाता है और कांग्रेस ने इस वोट बैंक में सेंध लगाई थी और कुणाल चौधरी को यहां से मौका दिया था. वे खाती समाज से आते हैं. इस कारण कांग्रेस कालापीपल विधानसभा के अस्तित्व में आने के बाद पहली बार जीती.
भाजपा के पास नहीं है टक्कर लेने वाला उम्मीदवार…
शाजापुर विधानसभा में भाजपा के दावेदारों की बात करें, तो पूर्व जिलाध्यक्ष अम्बाराम कराड़ा भी दावेदार हैं. कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए क्षितिज भट्ट दावेदार हैं. पूर्व विधायक अरुण भीमावद भी दावेदारों की सूची में शामिल हैं. लेकिन एक नाम और चौंकाने वाला चर्चा में है, वो है डॉ. राजकुमार पाटीदार का. अब बात करें अम्बाराम कराड़ा की. यदि भाजपा उन्हें मौका देती है, तो गुर्जर समाज में धु्रवीकरण हो सकता है, लेकिन उनके कार्यकाल में असंतुष्ट भाजपाई नेता उनके चुनाव में उनके लिए घातक साबित हो सकते हैं. वहीं महाराज भाजपा के क्षितिज भट्ट भाजपा की राजनीति में भले ही रम गए हों, लेकिन विधानसभा चुनाव को लेकर उनकी पकड़ क्षेत्र में अभी कमजोर है. क्योंकि उनके पास ऐसे समर्थकों का अभाव है, जो विधानसभा में अपना प्रभाव गांव में रखते हों.

साथ ही बीते कुछ दिनों से क्षितिज भट्ट प्रदेश मंत्री बनने के बाद उन्होंने भी कई वरिष्ठ भाजपाईयों को नाराज किया है, तो उनके लिए भी कई भाजपा नेताओं का साथ आना मुश्किल लगता है. पूर्व विधायक अरुण भीमावद की बात करें, तो वे पिछला चुनाव काफी लंबे अंतर से हारे थे, लेकिन फिर भी शाजापुर विधानसभा में वे लगातार सक्रिय हैं और उनकी विधानसभा में लोगों पर पकड़ है, लेकिन भाजपा के अन्य गुट उनके लिए भी घातक साबित हो सकते हैं. वहीं बात करें डॉ. राजकुमार पाटीदार की, तो ये पाटीदार समाज के प्रतिष्ठित समाजसेवी हैं. ये नाम इसलिए चर्चा में है कि वे संघ से जुड़े हैं और शाजापुर विधानसभा में पाटीदार समाज पर भाजपा का विश्वास बीते दो दशकों से रहा है, लेकिन वे राजनीति के सांचे में फिट नहीं हैं.
ट्रिपल पी वाला ही दे सकता है टक्कर…
2023 के विधानसभा चुनाव में जिसके पास ट्रिपल पी है, याने कि पार्टी का पूरा साथ, पैसा और क्षेत्र में पकड़. वो ही शाजपुर विधानसभा में कांग्रेस को टक्कर दे सकता है. प्रदेश मंत्री क्षितिज भट्ट की बात करें, तो उनके पास एक पी है याने कि पैसा. पार्टी में प्रदेश मंत्री हैं, लेकिन उन्हें भाजपा के कई नेता अभी भी पोर्ट नेता मान रहे हैं. साथ ही क्षेत्र में उनकी पकड़ ना के बराबर है. क्योंकि वरिष्ठ भाजपाई उनके साथ तो हैं, लेकिन उनकी स्थिति रेल की पटरी के समान हैं.

जो साथ चल रहे हैं, लेकिन मिलते कभी नहीं हैं. अम्बाराम कराड़ा की बात करें, तो इनके पास दो पी हैं. पार्टी है और सामाजिक समीकरण के तहत उनकी क्षेत्र में पकड़ है, लेकिन उनके पास वर्तमान राजनीति में सबसे बड़ा हथियार तीसरे पी याने पैसे का अभाव है. एक और दावेदार संतोष जोशी की बात करें, तो इनके पास दो पी की कमी है. पार्टी का समर्थन नहीं है और पैसा भी नहीं है. लेकिन क्षेत्र में ये पकड़ और पहचान के मोहताज नहीं है. क्योंकि हर गांव में उनके कांवड़ यात्री संघ के कार्यकर्ता मौजूद हैं. साथ ही ब्राह्मण चेहरा होने के कारण संतोष जोशी कांग्रेस को टक्कर देने की स्थिति में हैं, क्योंकि हिंदुत्व भी उनके साथ है. अरुण भीमावद के पास तीनों पी हैं. पार्टी में पकड़ है, पैसा भी है और क्षेत्र में जनाधार भी है. लेकिन पिछली बार उनकी हार का कारण भाजपा की बगावत था. यदि इस बात पर संगठन विचार करता है, तो उन्हें इस बार दोबारा मौका मिल सकता है. हालांकि उनकी हार का अंतर निर्दलीय प्रत्याशी के कारण काफी बड़ा है. बस यही एक कारण उनके लिए नकारात्मक है.
आका टिकट दिला सकते हैं, लेकिन जीत नहीं…
मिशन 2023 के लिए मात्र 11 महीने बचे हैं. ऐसे में दावेदार अपने-अपने राजनीतिक आकाओं के यहां आए दिन साष्टांग प्रणाम करते नजर आ रहे हैं. क्षितिज भट्ट को ज्योतिरादित्य सिंधिया से उम्मीद है कि वे उन्हें टिकट दिला सकते हैं. तो अम्बाराम कराड़ा को संगठन से उम्मीद है. लेकिन क्षेत्र में पकड़ आका नहीं दिला सकते हैं. क्योंकि भाजपा में टिकट मिलना आसान है, लेकिन जीत की राह उतनी आसान नहीं है. साथ ही विधानसभा चुनाव में यदि महाराज भाजपा से क्षितिज भट्ट को टिकट मिलता है, तो प्री पेड भाजपाई पोर्ट नेता को पचा नहीं पाएंगे. यह चर्चा इन दिनों राजनीतिक हलकों में जोरों पर है. कई भाजपा नेताओं का कहना है कि यदि दो-तीन साल पहले भाजपा में आए लोगों को पार्टी टिकट देती है, तो उन कार्यकर्ताओं का क्या होगा, जो बरसों से भाजपा का काम कर रहे हैं और यही भाजपा के लिए चुनाव में चुनौती बन सकती है.

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