मोदी सरकार ने लगायी सार्वजनिक उपक्रमों की ‘मेगा डिस्काउंट सेल’: माकन

लखनऊ 07 सितम्बर (वार्ता) केन्द्र की नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन योजना पर सवालिया निशान लगाते हुये कांग्रेस महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार जनता की कमाई से पिछले 60 साल में बनाए गए सार्वजनिक उपक्रमों को किराए के भाव पर बेचने पर आमादा है।
श्री माकन ने मंगलवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा कि सबसे चौंकाने वाली और संदेह में डालने वाली बात यह है कि यह सभी कुछ ‘गुपचुप तरीके से’ तय किया गया। इसके बाद इस निर्णय की घोषणा भी अचानक की गई जिससे सरकार की नीयत पर शक गहराता है।
उन्होने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई भाषणों का केन्द्र बिन्दु इंफ्रास्ट्रक्चर यानी ढांचा-गत आधार रहा है। इस मामले में एनडीए का रिकार्ड कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की तुलना में खराब रहा है। वर्ष 2012 से 2017 के बीच 12वीं योजना काल के दौरान ढांचागत आधार में निवेश को 36 लाख करोड़ रुपए समग्रित पर आंका गया, यह जीडीपी का 5.8 प्रतिशत औसत है। वित्तीय वर्ष 2018 और 2019 में यह अनुमान 10 लाख करोड़ रूपये पर आ गया। उस दौरान औसतन 7.20 लाख करोड़ सालाना ढांचागत आधार पर निवेश किया जा रहा था। यह एनडीए के शासन काल में 5 लाख करोड़ रुपए पर आ गया है। इससे उस शंका को बल मिलता है कि सरकार का मकसद इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करना नहीं बल्कि कुछ चुनिंदा उद्योगपति दोस्तों को उनके कारोबार और व्यापार में एकाधिकार का अवसर प्रदान करना है।
श्री माकन ने कहा कि इस योजना से बाजार में चुनिंदा कंपनियों की मनमर्जी कायम हो जाएगी, सरकार भले कहती रहेगी की निगरानी के सौ तरह के उपाय हैं, उसके लिए नियामक संस्थाएं हैं, लेकिन सच इसके विपरीत है। यह सीमेंट के क्षेत्र में देख सकते हैं, जहां पर दो तीन कंपनियों का एकाधिकार है, वही बाजार में भाव को तय करते है, सरकार के तमाम नियामक प्राधिकरण और मंत्रालय उनके सामने असहाय नजर आते हैं, इससे विभिन्न क्षेत्रों में मूल्य निर्धारण और गठजोड़ बढ़ेगा।
इस तरह की स्थिति इंग्लैंड बैंकिंग क्षेत्र में देख चुका है, इस मामले में हम अमेरिका से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं, जो फेसबुक, गूगल और अमेजन जैसी संस्थाओं पर नियंत्रण के लिए विभिन्न तरह के नियम और कानून बना रहा है। इसमें उनकी संसद और सभी नेता एक साथ नजर आते हैं, इसकी वजह यह है कि इन कंपनियों का बाजार पर वहां एकाधिकार है। इसी तरह की स्थिति चीन में भी है, वहां पर कुछ टेक कंपनियों पर शिकंजा कसने के लिए चीन की सरकार कई तरह के कदम उठा रही है। दक्षिण कोरिया भी अपने यहां पर इसी तरह से एकाधिकार के खिलाफ कार्य कर रहा है, लेकिन भारत में स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है।
यहां पर मोदी सरकार कुछ चुनिंदा कंपनियों को एकाधिकार का रास्ता स्वयं बनाकर दे रही है, अगर सरकार की बात मानी भी जाए कि किसी क्षेत्र में दो या तीन कंपनियां होंगी, उसके बाद भी उनके बीच गठजोड़ को कैसे सरकार रोक पाएगी, जब चुनिंदा कंपनियां बाजार में रहेंगी तो गठजोड़ और मूल्य वृद्धि होना तय है।

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